कोरोना के मारे, नाई बेचारे..

-चंद्र प्रकाश झा।।

कोरोना से निपटने में हुक्मरानों के जोर पर लागू तथाकथित सामाजिक दूरस्थता ने भारत में ग्रामीण क्षेत्रों के नाइयों की जान ले लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में गांवों की कुल संख्या 649,481 है . सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इनमें से 93,615 में 2017 तक कोई आबादी नहीं थी .आबादी वाले शेष पांच लाख से अधिक गावों में प्रत्येक गांव में कम से कम एक नाई होने के हिसाब से करीब पांच लाख नाइयों को लॉक डाउन शुरू होने के बाद से रोजी रोटी नसीब नहीं हुई है.
भारत में 22 मार्च को परीक्षण के तौर पर 14 घंटेका स्वैक्छिक लॉक डा उ न ( कर्फ्यू ) रहा था .इसे पहले चरण में 25 मार्च की आधी रात
से 21 दिन के लिए अनिवार्य रूप से लागू किया गया.पहले चरण की अवधि खत्म होने से पहले ही उसे तीन मई तक बढ़ा दिया गया. स्पष्ट
हैं कि भारत के ग्रामीण नाई 25 मार्च से ही बेकार बैठा दिए गए
. उनकी जो भी सीमित रोजी रोटी थी वो अगले सरकारी आदेश
तक छिन गई है.

भारत के ग्रामीण भागों में नाई लोगों की हजामत ही नहीं करते बल्कि उनके जन्म और विवाह से लेकर मृत्य तक के धार्मिक कृत्यों में हाथ बंटाते हैं. यही उनकी रोजी रोटी का जरिया है. इस मुख्यत जातिगत व्यवसाय के नाइयों की ब्याहता ( चमाईन / मिड वाईफ ) कुछ दशक पहले तक शिशु जन्म में प्रसव प्रबंधन से लेकर प्रसव उपरांत नाभिनाल ( अंब लि कल कौर्ड ) को काटने में बड़ी भूमिका निभाती थी . उनका वो
रोजगार पहले से ही लुप्त प्राय है.

डेविड मेंडलबौम की पुस्तक सोसायटी इन इंडिया में यह
रेखांकित किया गया है कि पंजाब के सिख बहुल गावों तक में
नाई की विवाह आदि के वक़्त सामाजिक कृत्यों में नाई की
दरकार होती है .इसलिए वे वहां भी बसे होते हैं जहां हजामत
का प्रचलन नहीं है.

लॉक डाउन में शहरी क्षेत्रों के नाइयों की स्थिति भी उतनी ही खराब
है. एक फौरी अनुमान के अनुसार शहरी क्षेत्र के नाइयों की
तादाद ग्रामीण क्षेत्रों के नाइयों से कम से कम तीन गुनी अधिक
है. नाइयों में हिन्दू ही नहीं मुस्लिम भी शामिल हैं

  • प्रख्यात पत्र कार पी साईनाथ की संस्था पी ए आर आई ने लॉक
    डाउन में नाइयों की दुर्दशा पर एक अध्ययन किया है . इसकी
    प्रामाणिक प्रति मिल जाने पर हम उसे अपने विश्लेषण के साथ
    पेश कर सकेंगे .
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