जनता को लेकर बनाये जा रहे प्रहसन : संदर्भ बांद्रा स्टेशन

Desk

-राजीव मित्तल।।

हमारी पिछली सरकारें, हमारी वर्तमान सरकार-हम सब सबसे ज़्यादा मज़ाक इसी वर्ग से करते आ रहे हैं..लॉक डाउन करते समय सरकार या मोदी जी ने इन्हीं की कोई चिंता नहीं की..

पंजाब के आतंकवाद के दिनों में बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश के खेतिहर मज़दूरों की चंडीगढ़ में रोजाना मंडी लगती थी..और ठेकेदार इन्हें ट्रैक्टरों में ढो ढो कर इन्हें सिख ज़मीदारों के खेतों तक पहुंचाते थे..लेकिन इनकी सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं होता था और इनसे इतने असुरक्षित वातावरण में काम कराया जाता था कि ये आयेदिन आतंकवादियों की गोलियों का निशाना बनते थे..

मुम्बई हो या असम, सरकार के खिलाफ या अन्य किसी सामाजिक समस्या को लेकर हुए किसी आंदोलन में सारा गुस्सा इन्ही पर उतारा गया है..ठाकरे परिवार के निशाने पे तो हमेशा ही यह तबका रहा..कुछ सालों से गुजरात में ये लोग आसान शिकार साबित हो रहे हैं..और ताजा हालात में सूरत शहर की भी यही तस्वीर है..

और इस बार तो जो मज़दूर तबका लाखों की संख्या में गुजरात, महाराष्ट्र, असम, कर्नाटक और हरियाणा तक फैला हुआ है.. लॉकडाउन की सबसे भीषण मार उसी पर पड़ी..सबसे पहले तो इनके श्रम की जेब काट रहे इनके मालिकों ने इन्हें सड़क पर ला दिया, उसके बाद स्थानीय निवासियों ने इनके साथ कोई सदाशयता नहीं बरती.. फिर लॉकडाउन के एलान के चार घंटे के भीतर ही इनकी वापसी के सारे रास्ते बंद कर दिए गए..

जब इनको लौटने ही नहीं देना था, तो सरकार ने इनको अपनी जगह बने रहने के क्या इंतज़ाम किये सिवाय गाल बजाने के…इनकी स्थिति तो हवाई बमबारी में खुले में पड़े शरणार्थियों की सी हो गयी..ऊपर से चैनलों का भीषणतम अमानवीय मज़ाक कि इनके लिए हमारी मीठी सरकार क्या क्या नहीं कर रही..

20 दिन पहले ही मुम्बई के रेलवे स्टेशनों पर ये मौत के साये में डिब्बों में एक पर एक लदे पड़े थे..शायद वो ट्रेन संचालन का अंतिम दिन था..उसके बाद पांच लाख मज़दूर और उनके बीवी बच्चे पांच सौ से लेकर हज़ार किलोमीटर की यात्रा पर पैदल या साइकिल से निकल लिए और यह कोई तीर्थ यात्रा नहीं थी..यह दिलों में समाया मौत का भय था, जिसे हमारी सरकार ने कतई दूर नहीं किया.. बल्कि कुछ दिन तक कोरोना से कम मरे, रास्ते में भूख और थकान से मरने वालों की संख्या कहीं ज़्यादा थी…और अब तो जगह जगह इन के लिए शेल्टर होम खुल गए हैं.. जी हाँ, दिल्ली में यमुना के किनारे कूड़े करकट के ढेर की तरह पड़े हैं कैमरा जूम करके देखने की ज़रूरत है बस..

गुजरात सरकार ने एक और मज़ाक किया कि उत्तराखंड से गुजरातियों को निकालने के लिए उत्तराखंड की 25-50 बसों का इंतज़ाम कर लिया और जब उन्हें गुजरात पहुंचाने के बाद लौटते में उनमें इधर का मज़दूर सवार हुआ तो उससे अनापशनाप पैसा वसूल उसे बीच रास्ते में ही उतार दिया गया.. अगर गुजरात सरकार चाहती तो उनके लौटने का समुचित इंतज़ाम कर सकती थी..

और अब बांद्रा रेलवे स्टेशन का यह दृश्य बता रहा है कि इस देश की 70 फीसदी जनता केवल प्रहसन के ही लायक रह गयी है…मुंबई में बांद्रा रेलवे स्टेशन के बाहर हजारों की संख्या में मजदूरों की भीड़ जुटाने वाला शख्स कोई विनय दुबे बताया गया है जो उत्तर भारतीय महासभा का संयोजक है… इस व्यक्ति ने 40 बसों का झांसा देकर स्टेशन के पास मस्जिद पर बुलाया.. अब केस दर्ज कर पुलिस ने इसे गिरफ्तार किया है…

इधर, दिल्ली के चैनल मस्जिद पर फोकस कर भीड़ का इस्लामीकरण कर अपनी छातियाँ पीट रहे थे, तो उधर एबीपी का मराठा चैनल मुम्बई के बांद्रा स्टेशन से ट्रेन चलने का समाचार दिखा रहा था..और उसका समय भी दे रहा था…

फोटो, कोलाज: राहुल देव प्रताप सिंह और मौसमी अरोरा

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