जबरा मारे भी और रोने भी ना दे..!

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-सुनील कुमार।।
कल मुंबई में कुछ तो अफवाह उड़ी, और कुछ एक टीवी समाचार चैनल ने खबर प्रसारित कर दी कि वहां के एक स्टेशन से उत्तर भारत जाने के लिए ट्रेन जाने वाली हैं। नतीजा यह हुआ कि कई हजार लोग वहां पहुँच गए। इसे लेकर केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार के बीच बयानबाजी चल रही है। कुछ समाचार चैनलों को अपनी भूख का सामान मिल गया कि मजदूरों के पीछे मस्जिद दिख रही है। अब अगर मुंबई के इस स्टेशन के पास पहले से मस्जिद है, तो पूरे महानगर से वहां पहुँचने वाले हजारों मजदूर क्या पहले उसे हटाएँ, और फिर ट्रेन की तरफ जाएँ ? इसीलिए कहा गया था कि जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। कुछ को भूखे मजदूर दिखे कि उनके पास अगले 3 हफ्ते और जिंदा रहने का इंतजाम नहीं है, कुछ को मजदूरों के पीछे खड़ी मस्जिद दिखी। आज भी हिंदुस्तान का मीडिया इस पर बंटा हुआ है कि आखिर यह किसकी साजिश थी कि इतने हजार मजदूर स्टेशन पहुँच गए। आज उत्तरप्रदेश में भी यह मांग उठ रही है कि जो भारत सरकार दूसरे देशों तक प्लेन भेजकर लोगों को मुफ्त में लेकर आई है, वह सरकार ट्रेन चलाकर भूखे गरीबों को उनके इलाकों तक क्यों नहीं पहुंचा रही?

चूँकि यह मामला मुंबई का था इसलिए खबरों में खूब आया, मीडिया के हजारों कैमरे मुंबई में हैं, और वहां की हर बात, दिल्ली की हर बात की तरह, बड़ी खबर बनती है। लेकिन देश भर में जगह-जगह गरीब फंसे हुए हैं, क्योंकि लॉकडाउन-1 जब हुआ, तो प्रधानमंत्री की मुनादी के बाद कुल 3 -4 घंटे ही देश खुला हुआ था। देश ऐसी सच्ची कहानियों से भरा हुआ है कि किस तरह लोग सैकड़ों, हजार-हजार किलोमीटर चलकर अपने गाँव पहुँच रहे हैं, रास्तों में फंसे हुए हैं। रोज कमाने-खाने वाले लोग महीनों तक मुंबई में किस तरह बिना काम जिंदा रहेंगे? कौन उन्हें उधार देंगे? लेकिन लॉकडाउन-1 में इसका कोई ख्याल नहीं था, और लॉकडाउन-2 में भी इसका कोई जिक्र नहीं है। मामला महज इनके खाने का नहीं है, मामला कोरोना का भी है, इनको हिफाजत से रहने की जगह नहीं मिलेगी तो दहशत में भीड़ की शक्ल में ये कैसे रहेंगे? क्या खाएंगे?

कोरोना के बीच मीडिया के एक हिस्से को हिंदुस्तान की भूख के पीछे मस्जिद दिख रही है, इसलिए कि कई मीडिया के ऐसे लोगों के पेट अब तक तो भरे हुए हैं। जिस दिन इनके पेट खाली होंगे, उस दिन इन्हें मंदिर-मस्जिद की बजाय रोटी दिखने लगेगी। आज देश के बड़े मीडिया से गरीब, बेघर, भूखे मजदूरों की तकलीफ गायब है, आज ताली-थाली, और दिया जलाओ बज रहा है। तीन हफ्ते गुजरने की बाद भी जिनकी रोटी का इंतजाम नहीं हुआ है, जो करोड़ों लोग आज खैरात में पहुँचने वाले फूड पैकेट पर जिंदा हैं, वे सुर्खियों से गायब हैं। देश के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा कोरोना के खिलाफ युद्धोन्माद से भर गया है कि जीतेगा तो मोदी ही। यह नौबत शर्मनाक है, अमानवीय है, हैवानियत से भरी हुई है। इस देश की सरकार को कोरोना से जीतने के अलावा अपने लोगों की भूख से भी जीतना है। महीने भर से ज्यादा पहले से जिस कोरोना का ख़तरा राहुल गाँधी को दिख रहा था, उस वक्त, वक्त रहते लोगों को गांव पहुँचाने, या शहर में ठीक से ठहरने के इंतजाम से किसने रोका था? जिस देश में आईआईटी और आईआईएम से निकले लोगों को आज अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने वहां की अर्थव्यवस्था जिंदा करने की जिम्मेदारी दी है, उन्हीं संस्थानों के लोगों को हिंदुस्तान के लॉकडाउन की योजना में नहीं लगाना था?

आज हम कोरोना की मुसीबत के बीच भी इस बात को उठाना जरूरी इसलिए समझ रहे हैं कि जब मोदी का दोस्त ट्रम्प अपने देश को जिंदा रखने हिन्दुस्तानी प्रतिभा को योजना बनाने में शामिल कर चुका है, भारत सरकार में कोई सरकार के भीतर भी ढंग की योजना बनाते नहीं दिख रहे, बाहर की प्रतिभाओं को शामिल करने की बात तो दूर रही। ऐसी नौबत में मुंबई के बेबस मजदूरों पर तोहमत लगाने वाली मीडिया को चार दिन पहले गुजरात में मजदूरनों के जुलूस के बारे में याद रखना था, वहां तो शिवसेना का मुख्यमंत्री नहीं है, वहां तो पीछे मस्जिद नहीं थी, फिर कैसे हजारों मजदूरों ने घर लौटने के लिए सड़क पर जुलूस निकाला? गुजरात सरकार ने 1300 पर तो मुकदमा ही दर्ज किया है। अब मोदी के लॉकडाउन-2 में जब इन मजदूरों के गाँव लौटने के बारे में कुछ नहीं है, तो वे टीवी चैनल की खबर पर भरोसा करके स्टेशन पहुँच गए तो कौन सा गुनाह कर दिया? भारत सरकार को अब रेलवे स्टेशन उन्हीं जगहों पर बनाना चाहिए जहां आसपास तोहमत के लायक कोई मस्जिद ना हो।

यह यह देश आज दो किस्म के तबकों में बाँट गया है, एक वह जिसके हाथ में फैसले लेना है, और दूसरा वह जिसे उन फैसलों की मार खाना है। इतिहास इसे भी दर्ज कर रहा है, और मीडिया को भी। जबरा मारे भी और रोने भी ना दे..!

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय 15 अप्रैल 2020)

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