राष्ट्रनिर्माण में अप्रवासी श्रमिकों की भूमिका और उपेक्षा

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-ललित सुरजन।।

कोविड-19 अर्थात नॉवल कोरोना वायरस जनित वैश्विक महामारी के भारत में बढ़ते प्रकोप को ध्यान में रख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 मार्च की मध्यरात्रि से सारे देश को लॉकडाउन करने का ऐलान किया। मात्र चार घंटे के नोटिस पर जारी इस अभूतपूर्व लेकिन अपरिहार्य निर्णय के चौतरफा प्रभाव आने वाले दिनों में देखने मिले। उनमें से हरेक पर विस्तृत चर्चा होना वांछित है।

लेकिन इसी लॉकडाउन से हमारे सार्वजनिक जीवन की एक ऐसी सच्चाई भी उभरकर सामने आई, जिसकी देखकर भी अनदेखी दशकों से होती रही है और इस वक्त भी हो रही है। मैं फिलहाल उसी ओर पाठकों को ले जाना चाहता हूं। आपने टीवी चैनलों पर पहले दिल्ली से अपने घरों की ओर पैदल लौटते लाचार, बेबस, भूखे-प्यासे, थके अप्रवासी मजदूरों को देखा। फिर दिल्ली के आनंद विहार अन्तरराज्यीय बस अड्डे पर उमड़ी भीड़ और लंबी कतारों को भी देखा।

दिल्ली के अलावा मुंबई, चैन्नई, पुणे जैसे महानगरों में ही नहीं, बल्कि दूर-दराज के गांवों-कस्बों से घर लौटने को बेचैन मजदूरों की व्यथा-कथा भी देखी और सुनी। इनके बारे में सरकारी तौर पर चिंताएं व्यक्त की गईं। राहत के प्रबंध किए गए। संवेदी समाज और गैर-सरकारी संगठनों ने भी उनकी मदद करने के लिए हाथ आगे बढ़ाए। यह सब तो अच्छा हुआ, लेकिन बेहतर हो कि अब हम इस बिन-बुलाई विपदा के दौर में बनी लाचारी की तस्वीर के पीछे छुपी एक कठोर वास्तविकता  को न सिर्फ पहचान लें, बल्कि उसे स्वीकार भी कर लें।

मेरा मकसद कोई पहेली बुझाना नहीं है। तस्वीर के पीछे का सच दिन के उजाले की तरह सामने है। मैं सिर्फ संकेत कर रहा हूं। एक अरब तीस करोड़ की आबादी वाला भारत विश्व के नक्शे पर सार्वभौम सत्तासंपन्न एक राजनैतिक इकाई के रूप में कायम है, तो यह इस मुल्क के हरेक नागरिक की बदौलत है जिसने हर तरह की संकीर्णता की बाड़ लांघकर 1947 से लेकर आज तक देश के पुनर्निर्माण और विकास के लिए जी-जान लगाकर काम किया है। छत्तीसगढ़ का खेतिहर मजदूर सीमा सड़क संगठन के अन्तर्गत जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग का संधारण करता है, तो झारखंड के गिरिडीह का कृषकपुत्र ऋषिकेश से बद्रीनाथ के राष्ट्रीय राजमार्ग पर तैनात होता है।

मध्यप्रदेश के झाबुआ के आदिवासी सौराष्ट्र के जामनगर और राजकोट के खेतों और कारखानों में काम करने जाते हैं तो प. बंगाल और ओडिशा के कारीगरों के बल पर सूरत के हीरा व्यापार में चमक आती है। बिहार के गांवों से निकलकर मेहनतकश इंसान देश के कोने-कोने में जाते हैं। पूर्वोत्तर के युवाओं को भी आप सुदूर स्थानों में काम करते पाए जा सकते हैं। राजस्थान के रसोईए जिन पाकशालाओं में अपना हुनर बिखेरते हैं, वहीं विदर्भ के ग्रामीण अंचल से चलकर आए युवजन वेटर की सेवाएं देते देखे जाते हैं। कहां तक गिनाऊं? आपने भी तो इन सबको देखा ही होगा। यही सब लोग तो हैं जिनमें से कुछ किसी न किसी तरह घर पहुंच गए हैं परंतु अधिकांश जन रास्ते में कहीं उदास रुके पड़े हैं।

एक दिन लॉकडाउन समाप्त होगा और ये सब गांव का रुख करेंगे। घर पहुंच जाएंगे लेकिन कब तक वहां रुक पाएंगे? जो रोजी-रोटी की तलाश इन्हें पहले देश के कोने-कोने तक ले गई थी, वहीं इन्हें फिर घर से बाहर एक नई यात्रा पर निकलने पर मजबूर करेगी। प्रश्न उठता है कि स्थानीय समाज का जो बर्ताव इन मेहनतकश मेहमानों के साथ कोरेना वायरस के आक्रमण के समय तक रहा है, क्या उसी व्यवहार को झेलने के लिए ये पुन: अभिशप्त होंगे या एक नई रौशनी में इनको देखेंगे? क्या वहां इनके लिए पहले से बेहतर वातावरण का निर्माण हो सकेगा? इन्हें दोयम दर्जे का नागरिक मानने के बजाय क्या इनके साथ बराबरी का बर्ताव हो सकेगा? क्या स्थानीय और बाहरी के द्वैत से उठकर इनके बारे में सोचना संभव होगा?

जो जहां पीढ़ियों से बसा है, क्या सिर्फ वही भूमिपुत्र कहलाने का अधिकारी है, या अपना गांव-जवार छोड़कर आए इन भूमिपुत्रों के प्रति भी हमारी सहानुभूति जाग पाएगी? हमें पता है कि दिल्ली से ऐसे हजारों मजदूरों को इसलिए घरों से बेदखल कर दिया गया कि काम-धंधा बंद हो गया तो मकान किराया कैसे पटाओगे। कितने ही स्थानों पर इनकी सेवाएं एक सिरे से समाप्त कर दी गईं और यह नहीं सोचा गया कि इनका जीवनयापन कैसे होगा। मालूम नहीं क्यों, मेरे मन में एक हल्की उम्मीद जागी है कि कोरोना वायरस ने जिस तरह समस्त मानव समाज को आक्रांत किया है, उसने हमारे भीतर की कोमल भावनाओं को, हमारी अन्तर्निहित मनुष्यता को एक अंश तक प्रस्फुटित किया है। यदि मेरा सोचना सही है तो निश्चय ही इन सवालों का सकारात्मक उत्तर मिलेगा।

अप्रवासी श्रमिकों की राष्ट्रनिर्माण में महती यद्यपि अलक्षित भूमिका का संज्ञान लेते हुए सबसे पहले केंद्र और राज्य सरकारों को इसके लिए वैधानिक और प्रशासनिक उपाय लागू करने की आवश्यकता होगी। मैं इस तर्क से असहमत नहीं हूं कि हर व्यक्ति को अपने घर के आसपास ही रोजगार के अवसर प्राप्त हों, किंतु इसे संभव करने के लिए नीतिगत स्तर पर अनेक फैसले करना होंगे जैसे मशीन के बजाय श्रम आधारित रोजगार अवसरों का निर्माण, कुटीर व लघु उद्योगों को पारदर्शिता के साथ बढ़ावा, स्थानीय युवाओं को सुमचित तकनीकी प्रशिक्षण इत्यादि। फिर  अर्थशास्त्र के अपने तर्क हैं, उन्हें भी एकदम से काट पाने में अनेक कठिनाइयां हैं।

इंग्लैंड (यू.के.) ने मुख्यत: अप्रवासी मजदूरों को ही दोषी ठहराते हुए यूरोपियन यूनियन से अलग होने का फैसला लिया, वहीं एक बड़ा वर्ग आज बै्रक्जिट के फैसले पर पछता रहा है। हम ही देखें कि भारत से कितनी बड़ी संख्या में हर श्रेणी के व्यक्ति विदेशों में जाकर सेवाएं दे रहे हैं और अनेक तो स्थायी रूप से वहां बस गए हैं। भारतवासी जब विदेशों में जन्मे या वहीं जाकर बस गए भारतवंशियों की उपलब्धियों पर गर्व से भर उठते हैं तब तो देश में जो आंतरिक अप्रवासी हैं, उनको उचित अवसर मिले, वे भी जहां निवासरत हैं वहां उनकी प्रतिभा को निखार मिले, यह उदार सोच विकसित करना श्रेयस्कर होगा। आशय यह है कि इस दिशा में जब सरकार उचित पहल करे तो उसे जनता का अनुमोदन भी प्राप्त हो।

मेरा पहला सुझाव है कि जिस तरह से राज्य सरकारें दूसरे राज्यों में पर्यटन दफ्तर खोलती हैं, उसी तरह वे श्रमिककल्याण दफ्तर भी उन राज्यों में खोलें, जहां बड़ी संख्या में उस प्रदेश के श्रमिक गए हों।  दूसरा सुझाव है कि दिल्ली में हर राज्य के आवासीय आयुक्त के कार्यालय में एक ऐसा अधिकारी हो जो अपने प्रदेश के श्रमिकों की आवाजाही व उनके कल्याण के लिए उत्तरदायी हो।  तीसरे, पूरे देश में सभी श्रमिकों के लिए, खासकर अप्रवासी श्रमिकों के  लिए, कार्यस्थल के निकट आवास व विश्राम के लिए आवश्यक सुविधाओं का स्थायी निर्माण किया जाए। मुझे ज्ञात है कि छत्तीसगढ़ में सन् 60 के दशक में दुर्ग के तत्कालीन जिलाधीश ऋषि कुमार पांडे ने कुमरधा (डोंगरगाव के आगे) गांव में सड़क निर्माण में लगे मजदूरों के लिए पक्का श्रमिक आवास गृह बनवाया था।

दिल्ली में सेंट्रल विस्टा के निर्माण पर बीस हजार करोड़ की फिजूलखर्ची रोक कर ऐसे काम करना सर्वजन हिताय होगा। चौथा, इनके बच्चों के लिए पढ़ाई की समुचित व्यवस्था की जाए। अगर ये शिशु उस प्रदेश की भाषा भी सीख सकें तो यह उनके भविष्य के लिए अच्छा होगा। इन सबके अलावा यह स्थानीय समाज की जिम्मेदारी भी बनती है कि एक देश: एक मन की भावना विकसित करने में सहयोग करे। एक देश: एक चुनाव, एक देश: एक टैक्स जैसे राजनैतिक अभियान बहुत हो चुके हैं। देश को एक सूत्र में पिरोने के लिए भी कुछ सार्थक पहल होना है तो उसके लिए अवसर आज है।

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