Home देश वैज्ञानिक मुसीबत और धर्म के खतरे..

वैज्ञानिक मुसीबत और धर्म के खतरे..

-सुनील कुमार।।
आज हिंदुस्तान में कोई है जिसकी जुबान पर तब्लीगी जमातियों का नाम कोरोना के नाम के साथ-साथ ही ना आ जाता हो? और ऐसा क्यों ना हो, जब हिंदुस्तान के कोरोनाग्रास्त मरीजों में से अधिकतर का किसी एक जगह से रिश्ता निकल रहा है तो वह तब्लीगी जमात ही है। दूसरी जिस बात से रिश्ता निकल रहा है वह विदेश से लौटने वालों से है। मुस्लिमों और तब्लीगियों को पल भर के लिए अलग रखकर देखें तो जमात के बीच कोरोना की घुसपैठ भी मोटे तौर पर, जाहिर तौर पर विदेश से आये तब्लीगी जमातियों से हुई दिखती है। विदेशों से लौटे हिन्दुस्तानी सैलानियों, कामगारों और पढऩे वाले बच्चों को देखें तो हिंदुस्तान के आम मजदूरों के मुकाबले वे सम्पन्नता के मामले में पूंजीवाले हैं। यही हाल हिंदुस्तान में बाहर से आये धर्मप्रचारकों का है, जो कि उनको सुनने-मानने वाले आम मुस्लिमों के मुकाबले पूंजीवाले हैं। इन लोगों को पूंजीवादी लिखने से हम बच रहे हैं, क्योंकि ये किसी वाद की तरह कमाई में नहीं लगे हैं, ये अधिक संपन्न देशों में मजदूरी कर रहे हैं, या वहां के पैसों से यहाँ धर्म प्रचार करने आए हैं। इस तरह हिंदुस्तान में कोरोना जिस रथ पर सवार होकर आया, धर्म और पूंजी उसके दो चक्के थे।

गैलीलियो धर्मविरोधी करार दिया गया था, मुकदमे का सामना करते हुए।


अब हिंदुस्तान में कोरोना के खतरे के बीच जिस तरह तब्लीगी गुरुओं ने उनको मानने वालों को गुमराह करके रखा, जुटाकर, इक_ा करके रखा, वह धर्म की एक आम ताकत है, जो सभी धर्मों में कम या अधिक रहती ही है। मुस्लिमों की बीच इसकी ताकत अधिक रहने की एक वजह अशिक्षा और गरीबी लग सकती है, लेकिन यह मानना अतिसरलीकरण होगा। इटली में जिस चर्च से सैकड़ों लोगों को कोरोना आशीर्वाद के रूप में मिला, वहां न तो शिक्षा थी, ना ही गरीबी थी। इजराइल के जिस शहर को कोरोना ने अपनी जकड़ में ले लिया है, वह बहुत पढ़ी-लिखे और सम्पन्न लोगों का शहर है। अमरीका में ना तो पढ़ाई की कमी है, न ही सम्पन्नता की, यही हाल ब्रिटेन का है। इसलिए, हिंदुस्तान में तब्लीगियों से मुस्लिमों में अधिक फैले कोरोना की वजह अशिक्षा और गरीबी को मानना गलत होगा। यह धर्म का असर है कि वह लोगों को कानून से हिकारत सिखाता है, वह दूसरे धर्म के लोगों से हिकारत सिखाता है, और लोगों को खासकर विज्ञान से नफरत सिखाता है। इन्हीं सबके चलते तब्लीगियों के मन में कानून के लिए हिकारत रही, समाज के दूसरे लोगों के लिए मन में हिकारत रही।
लेकिन ऐसा सिर्फ इसी धर्म के लोगों के बीच नहीं हुआ। कोरोना के बीच ही हिन्दुओं के मंदिरों में जुटने वाले भक्तों को पुलिस किस तरह लाठियों से मारकर भगा रही है, उसके वीडियो भी तैर रहे हैं, कल पंजाब में निहंग सिखों ने कफ्र्यूू पास मांगने पर एक पुलिस अफसर का हाथ ही काटकर अलग कर दिया। निहंग तो सिख धर्म में पूरे वक्त के धार्मिक काम करने वाले होते हैं। कल ही छत्तीसगढ़ के रायपुर में पुलिस को जाकर एक चर्च में इतवार की प्रार्थना सभा में जुटी भीड़ को भगाना पड़ा। दुनिया भर में धर्म अक्ल से, कानून से, सामाजिक समझदारी से टक्कर ले ही रहा है। इसलिए भी ले रहा है कि कोरोना एक वैज्ञानिक खतरा है, जिस विज्ञान के अस्तित्व को ही मानने से धर्म इंकार कर देता है। धर्म का बस चले तो वह कोरोना के पहले विज्ञान को मारे, क्योंकि कोरोना तो आगे-पीछे खत्म हो सकता है, विज्ञान तो हमेशा ही धर्म के सर पर तलवार की तरह टंगा ही रहेगा। इस बात के खिलाफ आसान तर्क एक यह दिया जा सकता है कि बहुत से वैज्ञानिक भी आस्थावान रहे। यहां पर धर्म को ईश्वर से अलग करके ही समझा जा सकता है। ईश्वर एक धारणा है, इसलिए उससे किसी को कोई खतरा नहीं है। लेकिन अमूर्त ईश्वर से परे धर्म का एक मूर्त रूप है, संगठित रूप है, उसका किसी भी अपराधी से अधिक बाहुबल है, इसलिए वह लोकतंत्र, अक्ल, विज्ञान, और इंसान, सबके लिए बहुत बड़ा खतरा है। धर्म अनिवार्य रूप से कट्टर, हिंसक, बेइंसाफी होता है, और मुसीबत के वक्त वह बर्बादी और सबसे बड़ा सामान हो सकता है।
यह तो आज कोरोना के बीच तब्लीगी जमात आ गयी है, लेकिन हिन्दुस्तान में पारसियों को छोड़कर किस धर्म के लोग ऐसे किसी संकट के बीच विज्ञान और कानून की बात सुनते? कल्पना करें कि कुंभ के बीच कोरोना आया होता, नागपुर में बौद्ध लोगों के सालाना जैसे कि दस लाख लोगों के बीच कोरोना आया होता, तो क्या अधिक लोग कानून को मान लेते? हिन्दू धर्म तो लोकतंत्र, इंसानियत, इनके खिलाफ इतना नहीं हुआ होता, तो हिंदुस्तान में लोग बौद्ध बने ही क्यों होते? इसलिए आज तब्लीगी जमात, और उसके मरकज में शामिल मुस्लिमों के जुर्म को अलग रखें, तो हिन्दुस्तान में अधिकतर, या सभी धर्मों के लोग, किसी भी वैज्ञानिक मुसीबत के वक्त खुद भी मुसीबत ही रहेंगे। जिन पारसियों को ऊपर हमने रियायत दी है, उनकी नस्ल उसके भीतर की गिरती आबादी की वजह से खत्म होती दिख रही है, लेकिन इस धर्म में रक्तशुद्धता का हाल यह है कि किसी और धर्म के लोगों के लिए इसमें शामिल होने की कोई जगह नहीं है। विज्ञान के गिनाए गए, साबित हो चुके रक्तशुद्धता-खतरों के लिए इस धर्म के लोगों में भारी, और पूरी तरह हिकारत है।
लोग आज भूल रहे हैं, कि जब तब्लीगी जमात का दिल्ली का मरकज चल रहा था, उसी वक्त उत्तरप्रदेश में योगी सरकार रामनवमीं पर अयोध्या में दस लाख लोगों को जुटाने की मुनादी कर चुकी थी। उस वक्त भी हमने उसके खतरों के बारे में लिखा था, बाद में वह जलसा रद्द किया गया। आज हिंदुस्तान में मुस्लिमों को कोसना ठीक है, लेकिन बाकी धर्मों के लोग भी विज्ञान, कानून, लोकतंत्र और इंसानियत के सामने वे किस तरह हथियार लेकर तैनात हैं। किसी भी मुसीबत में धर्म इंसान और इंसानियत पर, लोकतंत्र और विज्ञान पर सबसे बड़ा खतरा बनकर रहेंगे, आज भी हैं। दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि किस तरह धर्म ने विज्ञान की बुनियादी बातों को स्थापित करने वालों को सजा दी है। जिस गैलीलियो ने यह कहा था कि धरती सूरज का चक्कर लगाती है, उसके लिखे हुए को प्रतिबंधित करके उसे जिंदगी भर घर पर नजरबंद रखा गया था। गणित में जिस विख्यात गणितज्ञ और दार्शनिक पाईथेगोरस का सिद्धांत एक सबसे विख्यात काम माना जाता है, उसे भी धार्मिक सोच की वजह से सजा दी गई थी। चिकित्सा विज्ञान में तो जाने कितने ही लोगों को धार्मिक सरकारों ने सजा दी थी। और वह आज भी जारी है, धर्म के रहने तक जारी रहेगी।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय 13 अप्रैल 2020)

Facebook Comments
(Visited 4 times, 1 visits today)

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.