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सांप्रदायिकता की महामारी में बीमार देश..

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पूरी दुनिया में इस वक्त कोरोना की महामारी से बच निकलने की छटपटाहट देखी जा सकती है। सभी को बस इस बात का इंतजार है कि कब कोरोना की कोई दवा या वैक्सीन बने और जिंदगी फिर पटरी पर लौटे। लेकिन जब कोरोना का इलाज मिल जाएगा तो क्या वाकई सबका जीवन पटरी पर लौटेगा, या आबादी के एक बड़े तबके के लिए जिंदगी पहले जैसी ही, बल्कि उससे कहीं कठिन हो जाएगी? क्या भारत भेदभाव, सांप्रदायिकता, छुआछूत और सामंती मानसिकता की महामारी से कभी निजात पाएगा? ये बीमारियां तो सदियों से भारतीय समाज को रुग्ण बनाए हुए हैं और इस कोरोनाकाल में यह पहले से कहीं अधिक कुरूपता के साथ अपना असर दिखा रही हैं।

कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए जब सोशल डिस्टेंसिंग की बात की गई तो मनुवाद के पैरोकारों ने इसे अस्पृश्यता को सही साबित करने के लिए इस्तेमाल किया। जबकि मौजूदा संदर्भ में सोशल डिस्टेंसिंग से अभिप्राय सभी से शारीरिक तौर पर दूरी बनाए रखने से है, समाज के एक तबके से नहीं। इसी सड़ी-गली मानसिकता का एक नमूना मार्च के अंतिम सप्ताह से देखने को मिला, जब तब्लीगी जमात के दिल्ली स्थित केंद्र में विदेश से बड़ी संख्या में आए लोगों के कारण कोरोना के मामले तेजी से बढ़े। इस एक घटना ने महामारी में धार्मिक कोण तलाशने वालों को बड़ा मौका दे दिया।

लॉक डाउन केवल भौतिक आवाजाही पर रोक लगा रहा है, कुत्सित और झूठी बातों पर नहीं।  इसलिए तब्लीगी जमात का कोरोना कनेक्शन साबित करने के लिए सोशल मीडिया पर फर्जी खबरों का अंबार लग गया। कहीं पुलिस वालों पर थूकने का झूठा वीडियो वायरल हुआ, जिसमें इल्जाम तब्लीगी जमात से जुड़े लोगों पर लगाया गया, तो कहीं यह खबर फैलाई गई कि कोरोना फैलाने के इरादे से कोई मुस्लिम युवक गांव में पहुंच गया। उत्तराखंड में एक मुस्लिम फल विक्रेता को कुछ लोगों ने धमका कर ठेला लगाने से रोका, जबकि वहां मौजूद हिंदू फल विक्रेता से कहा कि आप लगा सकते हैं। कर्नाटक में मुसलमान मछुआरों को कृष्णा नदी में मछली पकड़ने से रोका गया। 

इस तरह की तमाम खबरें इस वक्त देश के अलग-अलग राज्यों से आ रही हैं। कुछ राज्यों में सरकारों ने बाकायदा चेतावनी जारी की है कि तब्लीगी जमात से जुड़े लोग बाहर आकर अपनी जानकारी दें। यह सही है कि तब्लीगी जमात में लोगों के जमा होने और फिर देश के अलग-अलग हिस्सों में चले जाने से कोरोना का प्रसार बढ़ा। उनकी इस लापरवाही को किसी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन ठीक ऐसी ही लापरवाही थाली पीटने के लिए जुलूस निकालने वालों,  तेरहवीं का भोज कराने वालों, जन्मदिन पर लोगों को इक_ा कर राशन बंटवाने वालों और डेरों, आश्रमों में छिपे या फंसे लोगों से भी तो हुई है।

 इनमें से तो किसी के लिए इस तरह सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार नहीं किया जा रहा। खास बात ये है कि हर मुसलमान नागरिक तब्लीगी जमात का सदस्य नहीं होता, फिर भी जनता को तब्लीगी जमात के नाम पर मुसलमानों के खिलाफ भड़काने के लिए गुमराह किया जा रहा है। इन लोगों को ये नजर नहीं आ रहा कि मुस्लिम कहीं किसी हिंदू की अर्थी को कंधा दे रहे हैं क्योंकि रिश्तेदारों ने कोरोना के डर से पैर पीछे खींच लिए, कहीं गरीबों में राशन बांटने का काम कर रहे हैं। वैसे भारत में कोरोना को धर्म से जोड़ने का ये सिलसिला अचानक शुरू नहीं हुआ है।

बल्कि बड़े ही सुनियोजित तरीके से फेक जानकारियां, वीडियो फैलाए गए, और आम लोगों तक ये धारणा पहुंचाई गई कि मुसलमान कोरोना से ना सिर्फ पीड़ित हैं बल्कि इसे जान-बूझकर फैला रहे हैं। ऑल्ट न्यूज के संस्थापक प्रतीक सिन्हा मानते हैं कि 30 मार्च के बाद से सांप्रदायिक वैमनस्य भड़काने वाले फेक वीडियो और मैसेज तेजी से सामने आए। वो कहते हैं, ‘कई पुराने मैसेज वायरल किए जाते हैं, ये एक्सीडेंटल नहीं होते इन्हें खोजकर कोई तो लाता ही है। एक पूरा नेटवर्क है जो ऐसे मैसेज फैलाता है। आम आदमी को जब एक ही तरह के मैसेज मिलते हैं तो उसके लिए भी इन पर यकीन करना आसान हो जाता है।

हम सब अपनी विचारधारा से मेल खाते वीडियो पर यकीन जल्दी कर लेते हैं’। अब ये समझना कठिन नहीं है कि मुसलमानों को एक महामारी के लिए जिम्मेदार ठहराने वाले किस राजनैतिक विचारधारा के पोषक और समर्थक हैं। अगर ये काम केवल समाज में जहर घोलने के लिए गठित आईटी सेल द्वारा ही होता तो, उन्हें चिन्हित करना आसान होता। लेकिन अभी तो समाज का एक प्रभावशाली तबका और मुख्यधारा के मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी इसी काम में जुटा है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने तो बाकायदा तब्लीगी जमात मामले की मीडिया रिपोर्टिंग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। देवबंदी मुस्लिम उलेमाओं के संगठन ने कहा है कि मीडिया गैर-जिम्मेदारी से काम कर रहा है और कोरोना वायरस की आड़ में मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाई जा रही है। 

देखना है कि अदालत इस पर क्या निर्देश देती है। फिलहाल उदार, प्रगतिशील और तार्किकता में यकीन रखने वाले समाज के लिए चुनौती पहले से कहीं अधिक बड़ी है। इस दुष्प्रचार का सबसे ज़्यादा असर मुस्लिम समुदाय के उन लोगों पर पड़ रहा है जो निम्न आर्थिक वर्ग से आते हैं। वे इसकी क़ीमत अपनी रोजी-रोटी खोकर चुका रहे हैं, और डर में जीने को मजबूर है। अमेरिकी चिंतक, लेखक  नोम चॉम्स्की ने हाल ही में एक साक्षात्कार में कहा कि कोरोनो वायरस के भयानक परिणाम हो सकते हैं।

लेकिन आगे जाकर हम इससे बच निकलेंगे। पर न्यूक्लियर वार का बढ़ता खतरा,  ग्लोबल वार्मिंग और जर्जर होता लोकतंत्र मानव इतिहास के यह तीन ऐसे बड़े खतरे हैं जिनसे निपटा नहीं गया तो यह हमें बर्बाद कर देंगे। फिलहाल हिंदुस्तान उग्र राष्ट्रवाद के नारे लगाता हुआ इसी बर्बादी की ओर कदम उठा रहा है।

(देशबन्धु)

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