इस खबर को सच मान लूं क्योंकि अखबार में छपी है?

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-संजय कुमार सिंह।।


दैनिक भास्कर की यह खबर फर्जी खबरों के खिलाफ एक फेसबुक पोस्ट पर सबूत के तौर पर पेश की गई है। आइए, इस खबर को देखें और समझें कि कैसे यह भी फर्जी खबर की ही श्रेणी में है। आज जब फर्जी वीडियो लगाकर तबलीगी जमात के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है तो ऐसी खबरों का कोई मतलब नहीं है जिसमें फर्जी सबूत भी नहीं है। और यह यकीन करने लायक बिल्कुल नहीं है। कुछ लोगों के आरोप पर आधारित है और यह आरोप लगाने का कारण कुछ भी हो सकता है। इसमें तबलीगी जमात को बदनाम करना शामिल है। हालांकि, इस खबर को छापने से पहले रिपोर्टर / संपादक को संतुष्ट होना चाहिए कि आरोप लगाने का कारण कुछ और तो नहीं है। वह खबर में दिखना भी चाहिए। रांची संस्करण में यह खबर पहले पन्ने पर है। लिंक नीचे।
इस खबर का अंतिम वाक्य गौरतलब है, देर रात तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। आज के समय में प्रशासन के पास इससे महत्वपूर्ण काम और क्या हो सकता है। जिन लोगों पर थूका गया, जो काम करने को तैयार नहीं हैं उन्हें संतुष्ट करने और उनका साथ देने के लिए न्यूनतम आवश्यकता है कि दोषियों को पकड़ने की कार्रवाई की जाए। वह क्यों नहीं हुआ? और शिकायत उससे क्यों नहीं? खबर इस मामले में शांत क्यों है? क्या शिकायतकर्ता, नगर आयुक्त और एसपी से नहीं पूछा जाना चाहिए कि शिकायत की क्या स्थिति है और एफआईआर क्यों नहीं है। थूकने वालों को पकड़ने के लिए क्या कार्रवाई की गई है। उसके बिना आपको यह खबर अधूरी नहीं लगती है।


दूसरी बात, क्या ऐसे मामले में कार्रवाई करने में देरी उचित है? जो निगम कर्मी काम नहीं कर रहे, उनसे वहां नहीं तो दूसरी जगह काम नहीं करवाना चाहिए। इसी खबर के साथ बॉक्स में दूसरी खबर है कि सफाई कर्मी, पार्षद पति (जी हां यह भी एक गैर सरकार पर शक्तिशाली पद है) द्वारा मारपीट करने से नाराज थे। क्या यह संभावना बिल्कुल नहीं है कि इसी से नाराज कर्मचारियों ने यह आरोप लगाया हो। या आरोप का संबंध इस मार-पीट से भी हो। आमतौर पर ऐसी खबरें छपती रहती हैं पर इन दिनों क्या ऐसे मामले में रिपोर्टर और संपादक को ज्यादा सतर्क नहीं होना चाहिए।
मैं नहीं कहता कि खबर गलत है या ऐसा हुआ ही नहीं होगा। मैं यह कह रहा हूं कि कार्रवाई शुरू ही नहीं हुई और खबर बन गई। खबर यह क्यों नहीं कि कार्रवाई नहीं हुई? वैसे भी, खबर एफआईआर के बाद ही छापना चाहिए। या कोई सबूत लगाना चाहिए। इस मामले में फोटो हो सकती थी। हो सकता है अखबार कल सबूत, एफआईआर की खबर छापे या चुप्पी मार जाए – एक स्थिति में खबर सही होगी, दूसरी में गलत। चूंकि फर्जी खबरें छप रही हैं इसलिए इसे सही मानने का कोई आधार नहीं है। इन दिनों, इस मामले में।

https://epaper.bhaskar.com/detail/427161/59301438894/jharkhand/10042020/109/image/

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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