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पुष्पा तिग्गा को सलाम!

-सुनील कुमार।।
आज जब शहरी हिंदुस्तान अपनी इमारतों और अपनी कॉलोनियों में रहने वाले डॉक्टरों को भी मार-मारकर निकाल रहा है, कि अस्पताल से लौटते उनके साथ कहीं कॉलोनी में कोरोना ना आ जाये, तब छत्तीसगढ़ के बस्तर के धुर नक्सल इलाके में एक ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यकर्ता चल बसी। पुष्पा तिग्गा कैंसर की शिकार थी, और इलाज के साथ-साथ भी वह बस्तर के सुकमा इलाके में गांव-जंगल में साइकिल पर चलते हुए काम करती थी। वह बस्तर की रहने वाली भी नहीं थी, दक्षिण छत्तीसगढ़ का बस्तर, और सैकड़ों किलोमीटर दूर उत्तर छत्तीसगढ़ के सरगुजा की रहने वाली थी पुष्पा तिग्गा। स्वास्थ्य विभाग के सबसे छोटे ओहदों में से एक, उसकी तनख्वाह भी जरा सी रही होगी, और साइकिल पर उन इलाकों में काम जहां नक्सलियों की बिछाई जमीनी सुरंगें बहुत सी मौतों को लिए इंतजार करती हैं।

पुष्पा सरगुजा के जशपुर जिले के गरीब परिवार की थीं, माँ-बाप मर गए, बर्तन मांजकर पढ़ाई पूरी की, स्वास्थ्य विभाग में नौकरी लगी तो पहली पोस्टिंग बस्तर के सुकमा में हुई, और तब से वे वहीं की होकर रह गईं। इस इलाके में नक्सली भी मारते हैं, और कुदरत भी कई किस्म की बीमारियों से मारती है। कैंसर के बाद भी उन्होंने काम बंद नहीं किया। ऐसे में इलाके के लोग उन्हें ईश्वर मानते थे। कुछ महीने पहले जब राज्य सरकार ने उसकी सेहत के चलते भी उसके किए जा रहे समर्पण के लिए उसका सम्मान किया था, तब भी इस अखबार में हमने उसके बारे में लिखा था, कि जिस बस्तर में ना जाने के लिए, जिस बस्तर से निकलने के लिए सरकारी अधिकारी-कर्मचारी रिश्वत देते हैं, पुष्पा तिग्गा उसी बस्तर के सबसे खतरनाक नक्सल-इलाके में काम करते रहना चाहती थी। सुकमा जिले की एक ग्राम पंचायत के अधीन वे 12 बरस से काम कर रही थीं, उसी दौरान उन्हें कैंसर निकला। हर महीने कई सौ किलोमीटर दूर राजधानी आकर वे कैंसर का इलाज करवाती रहीं, लेकिन सुकमा के जंगलों में अपना काम जारी रखा। सरकारी अफसर खुद होकर उनका तबादला करने को तैयार थे, लेकिन उन्हें इस इलाके के लोगों से मोह था, और वे यहीं की होकर बंधी रह गईं। रोज 17 किलोमीटर साइकिल पर जाना, उतना ही आना, और काम करना।

आज सुबह उनकी मौत की खबर के साथ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ठीक ही ट्वीट किया कि छत्तीसगढ़ की फ्लोरेंस नाइटेंगल चल बसी। पुष्पा के जाने पर याद आता है कि इसी बस्तर से बाहर तबादला करवाने के बारे में पिछली रमन सरकार के सुरक्षा सलाहकार के पी एस गिल ने सरकार को लिखा था कि पुलिस के लोग बस्तर से बाहर निकलने के लिए बड़े अफसरों को रिश्वत देते हैं। उस बात को याद करते हुए, बस्तर के सबसे बेबस लोगों की सेवा में 12 बरस लगातार लगी रहने वाली पुष्पा तिग्गा को सलाम!

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 9 अप्रैल 2020)

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