लॉकडाउन में आधी आबादी की मुश्किल..

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भारत में कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए 21 दिन का लॉकडाउन किया गया है। जिसके खत्म होने में अब एक सप्ताह ही शेष है। सरकार फिलहाल विचार कर रही है कि लॉकडाउन आगे बढ़ाया जाए या खत्म किया जाए। अगर खत्म करना है तो एक झटके में इसे खत्म करें या थोड़ी-थोड़ी छूट देकर धीरे-धीरे खत्म किया जाए। लॉकडाउन में रोजाना करोड़ों रुपयों का नुकसान हो रहा है, क्योंकि उद्योग, कारोबार सब बंद है।

अर्थव्यवस्था की मांग है कि तालाबंदी खत्म हो, जबकि स्वास्थ्य हालात कहते हैं कि कारखानों, दुकानों, या सड़कों पर भीड़ का उमड़ना खतरनाक है। केंद्र सरकार, राज्य सरकारों से इसी बात पर मंथन कर रही है।  इधर घरों में बैठे बहुत से लोग भी अब ऊबने लगे हैं कि सब कुछ पहले जैसा सामान्य कब होगा। नौकरीपेशा लोग जल्द से जल्द दफ्तर जाना चाह रहे हैं, उन्हें नौकरी जाने का डर सता रहा है। कामगार तबका अपनी रोजी-रोटी को लेकर फिक्रमंद है, विद्यार्थी अपने स्कूल-कॉलेज जाने, दोस्तों से मिलने को उतावले हो रहे हैं।

 व्यापारी अपने कारोबार को फिर चालू हालत में देखना चाहते हैं। गरज ये कि अब अधिकतर लोग इस आकस्मिक छुट्टी से तंग आ चुके हैं। घरों में बंद हो चुकी दुनिया के बीच एक दुनिया उस आधी आबादी की भी है, जिसके बिना दुनिया का काम नहीं चलता, लॉकडाउन ने इस आधी आबादी के जीवन की मुश्किलें, उलझनें और बढ़ा दी हैं। भारत समेत दुनिया के कई देशों में इस वक्त घरेलू हिंसा के मामलों में अचानक बढ़ोतरी देखी गई है। चीन की पुलिस के मुताबिक कोरोना लॉकडाउन के दौरान महिलाओं के खिलाफ घरेलू मारपीट के मामले लगभग तिगुने हो गए हैं।  जबकि स्पेन में खबरें आईं कि कुछ महिलाओं ने यातना से बचने के लिए खुद को कमरे या बाथरूम में बंद करना शुरू कर दिया, लिहाजा सरकार को उन्हें बाहर निकलने की छूट देनी पड़ी। इटली में इस मुद्दे पर काम करने वाले एनजीओ और कार्यकर्ताओं की फौज 24 घंटे की हेल्पलाइन पर उपलब्ध है। 

फ्रांस में महिलाओं को सुझाव दिया गया है कि अगर किसी महिला में खुद पुलिस को फोन करने की हिम्मत नहीं है तो वो पास में मौजूद दवा की दुकान पर जाकर एक कोड वर्ड बोल दे- मास्क-19। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक कोविड-19 महामारी के शुरू होने के बाद से लेबनान और मलयेशिया में ‘हेल्पलाइन’ पर आने वाली फोन कॉल की संख्या दोगुनी हो गई है। ऑस्ट्रेलिया में गूगल जैसे सर्च इंजनों पर घरेलू हिंसा संबंधी मदद के लिए पिछले पांच वर्षों में सबसे ज्यादा जानकारी इन दिनों खोजी जा रही है।  इन हालात पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने चिंता जताते हुए सरकारों से ठोस कार्रवाई का आह्वान किया है। इधर भारत में भी स्थिति खराब ही है।  राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) का कहना है कि इन दिनों घरेलू हिंसा की शिकायतों में वृद्धि हुई है।  मार्च के पहले सप्ताह में एनसीडब्ल्यू को देशभर में महिलाओं के खिलाफ अपराध की 116 शिकायतें मिली थीं।

लॉकडाउन के दौरान 23 से 31 मार्च के दौरान घरेलू हिंसा की शिकायतें बढ़कर 257 हो गईं। घरेलू हिंसा और प्रताड़ना की सर्वाधिक 90 शिकायतें उत्तर प्रदेश से आई हैं, जबकि  दिल्ली से 37, बिहार से 18, मध्य प्रदेश से 11 और महाराष्ट्र से 18 शिकायतें आई हैं। लॉकडाउन से पहले उत्तर प्रदेश से समान अवधि में 36, दिल्ली से 16, बिहार से आठ, मध्य प्रदेश से चार और महाराष्ट्र से पांच शिकायतें दर्ज हुई थीं।  इनमें से अधिकतर शिकायतें ईमेल के जरिए आयोग को मिली हैं।  इसका अर्थ ये है कि पीड़ित महिलाएं पढ़े-लिखे तबके की हैं।  लेकिन देश में महिलाओं का एक बड़ा तबका मोबाइल फोन या कंप्यूटर से दूर है। जिसे न संचार के इन आधुनिक तौर-तरीकों का सही इल्म है, न अपने अधिकारों का।  इन महिलाओं के साथ इस वक्त किस तरह का व्यवहार हो रहा है, इसकी खबर बाहर आ ही नहीं रही है।

घरेलू हिंसा के अलावा बहुत सी महिलाओं की दिक्कतें इसलिए भी बढ़ गई हैं क्योंकि पति-बच्चों या अन्य सदस्यों के दिन भर घर पर रहने से उन पर काम का बोझ पहले से अधिक बढ़ गया है। अब तक घरेलू सहायिकाओं के कारण इनका काम थोड़ा आसान हो जाता था, लेकिन अब लैंगिक भेदभाव नए सिरे से अपना रंग दिखाने लगा है। हिंदुस्तान में आम तौर पर पुरुष घर के कामकाज में बिल्कुल मदद नहीं करते हैं।  देशों के आर्थिक विकास का लेखा-जोखा रखने वाली वैश्विक संस्था ऑर्गनाइजेशन ऑफ इकानॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट ने साल 2015 में एक सर्वे किया था, जिस के मुताबिक एक आम भारतीय महिला रोजाना लगभग छह घंटे वो काम करती है, जिसका उसे कोई आर्थिक भुगतान नहीं किया जाता।

जबकि भारतीय पुरुष दिन भर में एक घंटे से भी कम ऐसा काम करते हैं जिसका कोई आर्थिक फायदा न हो। इसका एक मतलब यह भी है कि भारतीय पुरुष घर का काम न के बराबर ही करते हैं। वरिष्ठ पत्रकार समर हलर्नकर ने साल 2014 में अपने एक आलेख में जिक्र किया था कि  ‘भारत में इससे रिग्रेसिव आपको कुछ और देखने को नहीं मिलेगा कि लड़के घरों में सिर्फ खाते और मस्ती करते हैं और उन्हें यह कहा जाता है कि उनकी दुनिया घर से बाहर है।’  अब जबकि पुरुषों की दुनिया भी घर की चारदीवारी में कैद हो गई है, महिलाओं का जीवन पहले से कठिन हो गया है। सरकार और तमाम राजनैतिक दल लॉकडाउन के दौरान महिलाओं के सामने पेश आ रही दिक्कतों का भी संज्ञान लें और इसका समाधान करने की कोशिश करें।

(देशबन्धु)

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