सरकारों पर दोहरी चुनौती, कोरोना से बचाना फिर भूखों मरने से भी…

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-सुनील कुमार।।
हिंदुस्तान कोरोना नाम की मुसीबत के बीच अभी कहाँ तक पहुंचा है यह तो पता नहीं, लेकिन लोगों की रोजी-रोटी चलने के लिए अब केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों तक यह सोच भी चल रही है कि लॉकडाउन को जब भी खत्म किया जाये, कैसे किया जाये? अलग-अलग मुख्यमंत्रियों की सोच अलग-अलग है, ऐसा इसलिए भी होना ही था कि हर राज्य की आज की मुसीबत अलग-अलग किस्म की है, और कल को लेकर उन पर खतरे भी अपने-अपने किस्म के हैं। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रधानमंत्री को कल ही लिखा है कि जब भी देश में आवाजाही शुरू हो, सबसे चर्चा करके ही की जाये। तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने लॉकडाउन को कुछ या कई हफ्ते बढऩे का सुझाव केंद्र को दिया है, उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने भी कहा है कि 14 अप्रैल के बाद भी लोकडाउन बढ़ाया जा सकता है। केंद्र सरकार ने आज कुछ पेज का एक कागज जारी किया है जिसमें देश के प्रमुख अखबारों के लिखे गए सुझावों के हिस्से दिए गए हैं। हर समझदार सरकार को सरकार के बाहर के लोगों से भी सुझाव लेने चाहिए जो कि कुछ नई सोच भी लेकर आ सकते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 8 तारीख को देश के तकरीबन सभी विपक्षी दलों से बात करने जा रहे हैं, उन्होंने भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों से बात की भी है। कई लोग हैरान भी हैं, कि कोरोना पर देश के नाम अपने पहले संदेश के 20 दिन बाद अब मोदी यह काम क्यों कर रहे हैं? इसके पहले के हर बड़े फैसले तो उन्होंने बिना राज्यों से चर्चा भी किए कर लिए, विपक्ष तो दूर की बात थी। अब लॉकडाउन ख़त्म होने की तारीख के एक हफ्ता पहले की यह बैठक सभी पार्टियों को कोई बहुत बड़ा मौका तो नहीं देने वाली, लेकिन किसी भी नौबत में उनको जिम्मेदारी में भागीदार जरूर बना देगी। खैर, लोकतंत्र में यह सब तो चलते ही रहता है। यह वक्त कुछ ठोस राय देने का है। बहुत से लोगों से बात करके हालात का अंदाज लगाकर हमें भी कुछ बातें सूझ रही हैं।

आज देश में कई करोड़ मजदूर अपने काम के शहर छोड़कर किसी तरह अपने गावों तक पहुँच गए हैं, या अभी भी दसियों लाख लोग रास्तों में फंसे हुए हैं। इन सबका उनके गांव लौट जाना ही ठीक है, क्योंकि शहरों में अगले कई महीने उनके लिए अधिक काम नहीं रहने वाले। बाद में जिस मजदूर को रोजगार देने की जरूरत कारखानेदार, कारोबारी को लगेगी, वे खुद ही उनको बुला लेंगे। लेकिन अब अगले कम से कम एक साल न तो सरकार के कोई काम जमीन पर अधिक होंगे, न निजी क्षेत्र के। बहुत सीमित संभावनाएं रहेंगीं, और अपने गांव में तो लोग फिर भी किसी तरह जी लेंगे। इसलिए जब तक शहरी जरूरत खड़ी ना हो जाये, मजदूरों के लिए गांव ही ठीक रहेगा।
दूसरी बात स्कूल-कॉलेज की है। आज 130 करोड़ आबादी में से 30 करोड़ से अधिक पढऩे वाले हैं। इनमें से अधिकतर एक-एक कमरे में दर्जनों सटकर बैठने वाले बच्चे हैं। 27 करोड़ से अधिक स्कूली बच्चे हैं, जिनमें से अधिकतर दोपहर को स्कूल में सरकारी या निजी खाना खाते हैं। इन स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाने, काम करने वालों को भी जोड़ लें तो देश की करीब एक चौथाई आबादी पढ़ाई से जुड़ी हुई है, और यह पूरा काम भीड़ भरा है। इसलिए स्कूल-कॉलेज जल्द शुरू करने की बात सोचनी भी नहीं चाहिए। ऐसे खतरे में ना पढ़ाई जरूरी है, न इम्तिहान। बच्चों को सामाजिक जिम्मेदारी और सावधानी सिखाने-सीखने का यह सही मौका है।

मजदूरों और छात्र-छात्राओं को अलग रख लें तो राज्य सरकारों पर से कोरोना को फैलने से रोकने का एक बड़ा खतरा कम हो जायेगा। यह एक अलग बात है कि पढ़ाई तो बाद में हो जाएगी, लेकिन मजदूरों के पेट बिना काम नहीं चलेंगे, इसलिए उनके लिए उनके गृहराज्यों में ही उनके गावों में ही इंतजाम करना होगा, जो कि छोटी चुनौती नहीं होंगे।
कल दिल्ली के मजदूरों के बीच किए गए एक सर्वे पर बनी खबर छपी है कि उनके एक बड़े हिस्से के पास तो अगले वक्त के खाने का इंतजाम भी नहीं है। यह नौबत पूरे देश में रहेगी। देश को, प्रदेश को सारी फिजूलखर्ची रोककर सबसे गरीब लोगों को जिंदा रखने पर ही खर्च करना चाहिए। दिल्ली में राजपथ के इर्द-गिर्द की इमारतों की साज-सज्जा, उस इलाके की खूबसूरती के लिए 20 हजार करोड़ देने का गजट नोटिफिकेशन अभी कोरोना के बीच छपा है, मोदी सरकार को इस निहायत ही गैरजरूरी काम को तुरंत ही खारिज कर देना चाहिए। भूख से जलते पेटों वाले देश में 20 हज़ार करोड़ की बांसुरी बजाना हैवानियत होगी। केंद्र और राज्य सरकारों को तय करना होगा कि कौन-कौन से काम टाले जा सकते हैं, क्योंकि अभी देश में करोड़ों रोजगार और भी जाने वाले हैं।

सभी सरकारों के सामने आज दोहरी चुनौती है, कोरोना से बचने की भी, और फिर भूख से बचने की भी। कुछ और सलाहें आगे फिर।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 7 अप्रैल 2020)

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