उल्लू बैठा शाख पर..

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-विष्णु नागर।।

सिर्फ कहते ही नहीं हैं कि हर शाख पे उल्लू बैठा है। यह साफ दीख भी रहा है क्योंकि मैं भी एक शाख पर बैठा हूँ, जिस पर मेरे अलावा कई और उल्लू भी मजे से बैठे हैं। हममें से कोई वहाँ से उठने के मूड में नहीं है क्योंकि उठा तो इस शाख पर बैठने के लिए जो ताक लगाकर बैठे हैं, उनमें से कोई आकर फौरन इस डाल पर बैठ जाएगा और वापिस आने पर दूसरी शाख पर भी जगह नहीं मिलेगी, लड़-झगड़ कर मिल सकेगी, इसका भी कोई भरोसा नहीं है क्योंकि पेड़ तेजी से कट रहे हैं, नये उग नहीं रहे हैं, जबकि उल्लुओं की पापुलेशन बढ़ती जा रही है। यहाँ से मुझे दूसरी शाखाओं पर और आसपास के दूसरे पेड़ों की शाखाओं पर बैठे उल्लू भी दिखाई दे रहे हैं, इसलिए मैं मान लेता हूँ कि हर शाख पे उल्लू ही बैठा है,कोई दूसरा नहीं और कोई उल्लू उठने-उड़ने के मूड में कतई नहीं है। और अगर मूड है भी तो नहीं उठ रहा है, बोर हो रहा है तो भी नहीं उठ रहा है क्योंकि शाख छिनी यानी समझो सिंहासन ही छिना।

समस्या यह है कि इन उल्लुओं का क्या किया जाए,उनसे शाखाओं को कैसे बचाया जाए, इन्हें उल्लुओं से खाली करवाकर दूसरे पक्षी वहाँ बैठ सकें,रात में बसेरा डाल सकें,इसे कैसे सुनिश्चित किया जाए? यह एक मुश्किल सवाल है क्योंकि शाखाओं को उल्लुओं से बचाने की जिम्मेदारी भी उल्लुओं पर आन पड़ी है यानी अपने हितों के खिलाफ स्वयं उन्हें ही जाना है ऐसी गलती कोई उल्लू भला क्यों करेगा? उल्लू, उल्लू जरूर होता है मगर इतना भी उल्लू नहीं होता कि कोई उसे उल्लू बना दे और वह बन जाए,जिस शाख पे बैठा है, किसी की मीठी-मीठी बातों में आकर अपनी वह जगह दूसरों को दे दे या पेड़ कटवाने को ही राजी हो जाए, ताकि न डाल रहे, न उस पर वह बैठ सके, न दूसरे कोई। यह काम जब मनुष्य जैसा समझदार प्राणी नहीं करता तो भला उल्लू क्यों करे? आखिर उल्लुओं की भी अपनी बिरादरी में एक प्रतिष्ठा होती है,जो कई उल्लुओं की आसमान से भी ऊँची होती है। उनकी डाल गयी यानी उनकी प्रतिष्ठा गई और संस्कृत में कहा गया है कि खोया हुआ धन तो एक बार वापिस मिल भी सकता है मगर खोई हुई प्रतिष्ठा कभी वापिस नहीं मिल सकती। उल्लू इस बात को मनुष्यों से ज्यादा नहीं तो कम से कम उतना तो समझते ही हैं। संस्कृत का यह श्लोक पढ़ने के बावजूद आदमी गलती कर सकता है मगर उल्लू नहीं क्योंकि उल्लू उतना उल्लू नहीं होता,जितना कि आदमी उसे समझता है ,जिसकी समझ आजकल खुद ही कटघरे में है।

दरअसल आदमी अपनी इमेज अपने आईने में न देखकर उल्लूरूपी आईने में देखता है,इसलिए उसे अपनी असली शक्ल कभी दिखाई नहीं देती और वह उल्लू को अपने से ज्यादा उल्लू समझने का भ्रम पाल लेता है। वास्तव में इनसानों ने अपना उल्लूपन छुपाने के लिए ही उल्लुओं की इमेज बहुत खराब कर रखी है,जबकि इससे आदमियों की इमेज ही ज्यादा बिगड़ी है, जबकि उल्लुओं की इस बीच सुधरी है। किसी को उल्लू बनाना और बात होती है और खुद उल्लू होना अलग बात होती है। किसी आदमी को उल्लू बनानेवाले समझते हैं कि उन्होंने बड़ा तीर मार लिया, जबकि उल्लू इतने उल्लू नहीं होते कि किसी के बनाने से उल्लू बन जाएँ, वे ओरिजिनल उल्लू होते हैं। यहीं आदमी उनसे मात खा जाते हैं। वैसे लक्ष्मीजी के वाहन उल्लू को बेवकूफ समझने की गलती जो आदमी करता है,उसके बारे मे कह सकते हैं कि वह बना -बनाया,रेडीमेड उल्लू है क्योंकि जिसे धन की देवी ने स्वयं अपना वाहन चुना हो, वह उल्लू होकर भी उस तरह का उल्लू तो नहीं हो सकता, जिस तरह का उल्लू आदमी उसे समझता है। वैसे यह उल्लू का कम, धन की उस देवी का ज्यादा अपमान है,जिसकी पूजा करना लोग कभी नहीं भूलते। जो समझते हैं कि हम सिर्फ दीपावली के दिन लक्ष्मीपूजन करते हैं, वे स्वयं क्या हैं, इसे अब वे ही बताएँ तो अच्छा।

उल्लू को रात में भी दिखता है, जबकि आदमी को सिर्फ दिन में दीखता है, उसे रात में देखने के लिए रोशनी का इंतजाम करना पड़ता है। दिन में तो वैसे भी सभी देख लेते हैं,विशेषता तो रात में देख लेने में है जो उल्लुओं में होती है। इतिहास देख लीजिए कि आदमी तो दिन में भी कई बार देख नही पाता, चूक जाता है जबकि उल्लुओं ने शायद ही कभी रात में देखने में चूक की हो। इसके बावजूद जो उल्लू को उल्लू और खुद को आदमी मानते हैं,वे खुद को उल्लू बन रहे है, जबकि उल्लू बनाने का रिवाज है,उल्लू बनने का नहीं।

और जहाँ तक अंजामे गुलिस्तां का सवाल है, वह आप अपने सामने देख ही रहे हैं। अब यह बहसतलब है कि गुलिस्तां को इस अंजाम तक किसने पहुँचाया है, ओरिजिनल उल्लुओं ने या उल्लू बनानेवालों ने?

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