दोहरे मोर्चे पर जूझने की चुनौती..

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कोरोना के लक्षणों का असर इंसान के शरीर पर भले 14 दिनों में दिखलाई दे, लेकिन रोजमर्रा के जीवन पर उसका असर पूरी तरह से दिखने लगा है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं इस वक्त कोरोना के आगे घुटने टेक चुकी हैं। भारत अभी सेहत के मामले में बहुत कुछ संभला हुआ है, क्योंकि कोरोना का तीसरा स्टेज अभी नहीं आया है। हालांकि विशेषज्ञ बार-बार इस ओर सावधान रहने की चेतावनी दे रहे हैं। लेकिन कोरोना से भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह संक्रमित हो चुकी है, यह एकदम नजर आ रहा है। खासकर संपूर्णबंदी के बाद हालात कैसे होंगे, इसे लेकर विशेषज्ञ चिंता जतला रहे हैं।

आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के शब्दों में कहें तो ‘यह आर्थिक लिहाज से संभवत: आजादी के बाद की सबसे बड़ी आपात स्थिति है। 2008-09 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान मांग में भारी कमी आई थी, लेकिन तब हमारे कामगार काम पर जा रहे थे, हमारी कंपनियां सालों की ठोस वृद्धि के कारण मजबूत थीं, हमारी वित्तीय प्रणाली बेहतर स्थिति में थी और सरकार के वित्तीय संसाधन भी अच्छे हालात में थे। अभी जब हम कोरोना वायरस महामारी से जूझ रहे हैं, इनमें से कुछ भी सही नहीं हैं।’ हालांकि वे यह मानते हैं कि यदि उचित तरीके तथा प्राथमिकता के साथ काम किया जाये तो भारत के पास ताकत के इतने स्रोत हैं कि वह महामारी से न सिर्फ उबर सकता है बल्कि भविष्य के लिये ठोस बुनियाद भी तैयार कर सकता है।

रघुराम राजन का सुझाव है कि सारे काम प्रधानमंत्री कार्यालय से नियंत्रित होने से ज्यादा फायदा नहीं होगा क्योंकि वहां लोगों पर पहले से काम का बोझ ज्यादा है। उनके मुताबिक सरकार को उन लोगों को बुलाना चाहिये जिनके पास साबित अनुभव और क्षमता है। वे कहते हैं कि सरकार राजनीतिक विभाजन की रेखा को लांघ कर विपक्ष से भी मदद ले सकती है, जिसके पास पिछले वैश्विक वित्तीय संकट से देश को निकालने का अनुभव है।’ रघुराम राजन ने पहले भी मोदी सरकार को सही सुझाव दिए हैं, लेकिन मोदीजी ने उन्हें अनसुना कर दिया। पहले के अनुभवों के आधार पर यही माना जाएगा कि मोदीजी दूसरों के मन की बातें नहीं सुनेंगे। लेकिन उन्हें अब हकीकत से आंख मिलाना ही होगा। और हकीकत ये है कि देश में इस वक्त 52 प्रतिशत नौकरियों के जाने का खतरा है। 
भारतीय उद्योग परिसंघ यानि सीआईआई ने अभी एक सर्वे करवाया जिसके मुताबिक चालू तिमाही (अप्रैल-जून) और पिछली तिमाही (जनवरी-मार्च) के दौरान अधिकांश कंपनियों की आय में 10 प्रतिशत से अधिक की कमी आने की आशंका है, घरेलू कंपनियों की आय और लाभ दोनों में इस तेज गिरावट का असर देश की आर्थिक वृद्धि दर पर भी पड़ेगा। और इसका सीधा असर नौकरियों पर पड़ेगा।

संपूर्णबंदी के बाद जिस तरह लाखों मजदूरों ने घरवापसी की, उसका असर भी आर्थिक मोर्चे पर जल्द ही नजर आएगा। आर्थिक सर्वे 2016-17 के मुताबिक हर साल देश में करीब 90 लाख लोग एक जगह से दूसरे जगह पलायन करते हैं। इनमें से अधिकतर ऐसा काम की तलाश में करते हैं।

लेकिन अभी जिस तरह उन्हें रातोंरात सैकड़ों किमी की दूरी तय कर अपने घर लौटना पड़ा, उसके बाद मुमिकन है कि बहुत से लोग शहरों में लौटे ही नहीं। वे अपने छोटे खेतों में या नजदीक के शहर में काम ढूंढना पसंद कर सकते हैं। 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट में लोगों को यह सबक मिला था ‘नौकरी मायने रखती है’। और इस बार उन्हें सीख मिली है कि दूरी मायने रखती है। अगर प्रवासी मजदूर नहीं लौटे तो पहले ही मंदी से जूझ रही छोटी और मझोली साइज की कंपनियों पर इसका बुरा असर पड़ेगा।

बड़े शहरों में मल्टीप्लेक्स और सुपर मार्केट चेन चलाने वाली बड़ी कंपनियां भी इस वक्त अपना किराया माफ करवाने की जुगत में लगी हैं। हाल ही में कुछ रेस्तरां और मल्टीप्लेक्स मालिकों ने फोर्स मेज्योर का हवाला देते हुए मार्च से लेकर मई तक शापिंग मॉल्स  में किराए से छूट की मांग की है। गौरतलब है कि फोर्स मेज्योर तब लागू होता है जब संबंधित पक्ष किसी अभूतपूर्व और मानवीय वश से परे की घटना के कारण अनुबंध का पालन नहीं कर पाते हैं। फिल्म ओ माय गाड में इसी तरह का एक दृश्य होता है जब भगवान को भूकंप का जिम्मेदार बताया जाता है।

अब असल जिंदगी में इसी तरह के हालात बन गए हैं, तो इसका निपटारा कैसे होगा, ये देखना होगा। फिलहाल यह साफ नजर आ रहा है कि बड़े कारोबारी हों या छोटे दुकानदार, सबको मंदी का डर एक जैसा सता रहा है। ऐसे में मोदी सरकार को दोहरे मोर्चे पर जूझना होगा। कोरोना को स्टेज 3 पर पहुंचने से रोकना ताकि संपूर्णबंदी की मियाद बढ़ानी न पड़े और साथ ही अर्थव्यवस्था की गाड़ी पटरी पर आए, इसके लिए सोच-समझकर कदम उठाना होगा। उथले विचारों से केवल उथल-पुथल ही मचेगी।

(देशबन्धु)

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