-सुनील कुमार।।


हिंदुस्तान के अलग-अलग हिस्सों से अलग-अलग दर्जे की खबरें आ रही हैं। कहीं कोरोना से बहुत मौतें हो रही हैं, तो कहीं कम, कोई राज्य सरकार अच्छा काम कर रही है तो कोई बहुत अच्छा। कहीं पर संदिग्ध मरीजों को तेजी से शिनाख्त किया जा रहा है तो कहीं धीमे-धीमे। कई राज्यों में राज्य-सरकार की लापरवाही से मामले बढ़ गए दिख रहे हैं। और अभी जब हम राज्यों की बात कर रहे हैं, तो केंद्र सरकार की बात नहीं करना चाहते कि उसे कब क्या कर लेना था जो उसने नहीं किया, और कब क्या नहीं करना था जो उसने किया। वह बात आई-गई हो गई, लेकिन आने वाला वक्त अब तक के मुकाबले अधिक बड़ी चुनौती का हो सकता है, शायद होगा ही। और ऐसे में छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्य अपनी अब तक की कामयाबी पर आत्ममुग्ध होकर, जूते उतारकर बैठ सकते हैं। अभी बहुत लंबा वक्त ऐसा आने वाला है जो कि बहुत बड़ी चुनौती, बहुत बड़े खतरे को लेकर आते दिख रहा है।

दुनिया भर के विशेषज्ञों, विश्व स्वास्थ्य संगठन की चेतावनियों के खिलाफ हिंदुस्तान ने अधिक लोगों की जांच से इंकार कर दिया और उन्हीं लोगों की कोरोना-जांच की जिनमें कुछ लक्षण दिख रहे थे। दुनिया का तजुर्बा इसके खिलाफ रहा है। हम उन विशेषज्ञों से अधिक बड़े जानकार नहीं हैं, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों को याद दिलाना चाहते हैं कि कम जांच की वजह से भी कोरोना पॉजिटिव केस कम दिख रहे हो सकते हैं। आज तो दिल्ली की तब्लीगी जमात की मरकज में शामिल लोगों की बिना लक्षणों के भी तेजी से हो रही जाँच की वजह से उनमें कोरोना पॉजिटिव निकल रहे हैं, लेकिन बाकी लोगों के साथ तो ऐसी जांच नहीं हो रही। हिंदुस्तान की हालत आज बुझे हुए ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठे हुए देश सरीखी है, बारूद के बिनपरखे ढेर पर बैठे देश सरीखी है, जो कोरोनावली के दिए जला रहा है, जीत के फटाके फोड़ रहा है। परंपरागत सामाजिक समझदारी तो यह होती है कि जब तक नवजात शिशु अस्पताल से सही-सलामत घर नहीं आ जाते, किन्नर भी ताली बजाकर बख्शीश माँगने नहीं आते। बीती रात देश ने जिस तरह रौशन जुलूसों के साथ कोरोना पर जीत मनाई है, क्या सचमुच वह जीत हासिल हो चुकी है? अब तक तो यह देश अपने डॉक्टरों-नर्सों को मास्क और दस्ताने भी नहीं दे पाया है, जिसकी वजह से वे कोरोनाग्रास्त हो रहे हैं! यह किस किस्म की जीत है? अपने पर आत्ममुग्ध यह देश अपने लोगों की मौत का सामान बनते जा रहा है, और जश्न के तरीके ईजाद किये जा रहे हैं।

यह देश, और इसके प्रदेश अब तक कोरोना के खतरों से अपने को ऊपर मान रहे हैं, हिन्दुस्तानियों का एक तबका यूनेस्को के हवाले से अपने को एक अलग नस्ल साबित करके खुश है कि कोरोना उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मूर्खों को यूनेस्को का काम का दायरा भी नहीं मालूम है। बीती रात से नासा और इसरो के हवाले से हिंदुस्तान का जगमग-जगमग नक्शा फैलाया जा रहा है।

छत्तीसगढ़ में सरकार दारू दुकानें खोलने का सोच रही है। जिस प्रदेश में बिना पिए लापरवाह मटरगश्ती करते लोगों को लाठी मारकर घर भेजना पड़ रहा है, वहां दारू के नशे में लोगों का क्या हाल होगा? आज की कड़वी हकीकत यह है कि छत्तीसगढ़ में कोरोना के हर मरीज का इलाज या तो केंद्र सरकार के एम्स में हुआ है, या एक निजी बड़े अस्पताल अपोलो में हुआ है। राज्य सरकार का अपना इलाज का ढांचा अब तक किसी मरीज से जूझने की कसौटी पर चढ़ाया भी नहीं गया है। इसलिए किसी बड़ी चुनौती के आने पर छत्तीसगढ़ कितना तैयार है, यह परखना अभी बाकी है।

जापान सहित बहुत से देशों ने यह देखा है कि कोरोना की घरबंदी से थके हुए, लेकिन उससे बचे हुए लोग, लापरवाह होने लगते हैं। साफ-सफाई की लादी गई नई आदत भी लोगों को फिजूल लगने लगती है, और लोग सावधानी छोडऩे लगते हैं। न सिर्फ छत्तीसगढ़, बल्कि बहुत से प्रदेशों में अब तक बचे रहने को कामयाबी मान लिया गया है, जबकि अब तक बचे रहना महज संयोग भी हो सकता है। एक तब्लीगी जमात ने आकर कोरोना के आंकड़ों को पहाड़ा पढ़ाना शुरू कर दिया है। अभी हो सकता है कि ऐसे कोई और हादसे आ जाएँ। कल ही महाराष्ट्र में कोई बड़ा हिन्दू जलसा भारी भीड़ के साथ हुआ, कल ही वहां पर एक विधायक के जन्मदिन पर सैकड़ों लोगों की भीड़ टूटी पड़ी थी। अभी पूरे हिंदुस्तान में बड़े पैमाने पर जांच बाकी ही है।

यह वक्त कामयाबी पर खुश होने, दीया जलाने, दावे करने का नहीं है। यह वक्त आगे के खतरों का अंदाज लगाने का है। अभी तक तो एक बड़ी आबादी घरों में है, बिना जांच के है, काम-धंधे बंद हैं, लेकिन लॉकडाउन खत्म होने के बाद अगर काम शुरू होता है, तो उसके बाद संक्रमण बढऩे के खतरों को देखना होगा और वे असली चुनौती होंगे। आज तो धरती पर प्रदूषण भी कम हो गया है, लेकिन वह हकीकत में कम नहीं हुआ है, महज थम गया है। जब जिंदगी रोज के ढर्रे पर आएगी, वह पल भर में लौट आएगा। आज छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रधानमंत्री को चि_ी लिखकर कहा है कि जब भी ट्रेन-प्लेन, सफर, शुरू किए जाएँ, सबसे विचार-विमर्श करके ही किया जाये। मतलब यही है कि उस वक्त और उसके बाद एक बड़ा खतरनाक दौर फिर शुरू होगा, और उसके बाद कुछ हफ्ते ठीक निकल जाने पर ही चैन की सांस लेना ठीक होगा। फिलहाल तो देश की तैयारी का हाल यह है कि इसने अपने डॉक्टरों, नर्सों, और बाकी स्वास्थ्य कर्मचारियों को बिना सुरक्षा-उपकरणों के जानलेवा खतरे में झोंक दिया है। एक सरकारी डॉक्टर की पोस्ट को दस दिन हो गए हैं, कि अब मास्क और दस्ताने उसकी कब्र पर भेज दिए जाएँ। कल रात एक मोदी-प्रशंसक परिवार ने दिए जलाने के साथ एक अपील भी लिखकर तस्वीर पोस्ट की है कि परिवार का डॉक्टर अस्पताल में क्वारंटाइन में रखा गया है क्योंकि वह एक मरीज का इलाज करते हुए खुद भी पॉजिटिव पाया गया, उसके बच्चे ने अपील की है कि उसके डॉक्टर पिता को सुरक्षा उपकरण दिए जाएँ। यह अपील दिया जलाने वाले डॉक्टर-परिवार से आई है!

जो लोग मोर्चा फतह मान रहे हैं, वे जान लें कि देश के बड़े दिग्गज विशेषज्ञों के मुताबिक अभी कोरोना का बढऩा पहाड़ की चोटी पर पहुँचने से कई हफ्ते दूर है। वह वक्त उसके इम्तिहान का होगा, और उसी के लिए देश की तमाम सरकारों को रात-दिन तैयारी करनी चाहिए।

रॉबर्ट फ्रॉस्ट की लिखी और बच्चन की हिंदी में अनूदित की गई, नेहरू की पसंदीदा पंक्तियाँ याद रखना चाहिए,
अभी कहाँ आराम बदा यह मूक निमंत्रण छलना है,
अरे अभी तो मीलों मुझको, मीलों मुझको चलना है।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 6 अप्रैल 2020)

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