9 मिनट का मूर्खता महोत्सव, वीडियो देखिये..

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-विष्णु नागर।।

भावुक होकर सोचता हूँ तो आजकल एक बात बहुत अच्छी लग रही है कि प्रदूषण नहीं होने के कारण आकाश इतना उजला, इतना नीला है कि देख कर कोई मंत्रमुग्ध हो जा सकता है। रात में चाँद और कुछ तारे भी इतने उजले, इतने साफ नजर आते हैं कि जैसे हम किसी पहाड़ी जगह पर हों। इससे मुझे करीब तीन दशक पुरानी वह रात याद आती है, जब मैं किसी सिलसिले में मुंबई गया था और मेरा दोस्त अशोक ओझा मुझे माथेरान घुमाने ले गया था। शायद हम किसी सरकारी गेस्ट हाउस में ठहरे थे और रात के समय तारों भरा जैसा आकाश मैंने उस समय देखा, वैसा फिर कभी नहीं देख पाया। वह पागल कर देनेवाला दृश्य था। दिल्ली के आकाश की तुलना, माथेरान की उस रात के आकाश से करना सरासर ज्यादती होगी मगर हाँ दिल्ली में ऐसा आकाश और ऐसे दुर्लभ दृश्य देखने की कल्पना करना भी असंभव रहा है। इस कारण माथेरान की याद आ जाए,कम से कम मेरे लिए, यह स्वाभाविक है।

अच्छा यह भी लगता है कि आप पहले से ज्यादा घर के काम में रोज हाथ बाँट रहे हैं। और भी अच्छा है कि इन दिनों सुबह चार -सवा चार बजे से ही पक्षी चहचहाना शुरू कर देते हैं। न जाने किन- किन पक्षियों की चहचहाहट दिनभर सुनाई पड़ती है। कुछ को पहचानता नहीं, कुछ पेड़ों में इस तरह छुपे रहते हैं कि दिखते नहीं। बस जल्दी सुबह होने का एक ही नुकसान है कि न चाहो तो भी रोशनी का चौतरफा फैलाव जल्दी जागने को मजबूर कर देता है।

कोरोना के इन दिनों में याद जर्मनी के उन दो सालों की भी आती है, जब मैं वहाँ था मगर यह याद का बहुत सुखद पक्ष नहीं है। वहाँ सड़कें अक्सर निर्जन रहती थीं, रहने की जगह का आसपास का इलाका भी निर्जन जैसा था। आप जंगल में नहीं हैं, आसपास बिल्डिंगें हैं, उनमें रोशनी है मगर घंटों कोई चलता- फिरता नहीं दीखता था। सब सुव्यवस्थित, सब हराभरा मगर सब जैसे मनुष्यविहीन। भारत जैसी जगह से जाकर दो साल ऐसे निर्जन में रहना घुटन से भर देता था।

फिलहाल यही दृश्य दिल्ली और अन्यत्र है। अपनी बालकनी से झाँकता हूँ तो मुश्किल से कोई दीखता है। शाम को पड़ोस की और हमारी हाउसिंग सोसायटियों में बच्चे-बच्ची खूब खेलते थे, खूब चीखते- चिल्लाते थे खुशी से या खेल के दौरान थोड़ा विवाद पैदा होने पर। उन्हें देखना,उनका शोर मचाना अच्छा लगता था, अब वह दृश्य भी गायब है।रात को आठ बजे के आसपास परिसर में टहलता हूँ तो घरों के पास से गुजरते हुए अंदर से कुछ आवाजें सुनाई देती हैं। परिसर में भी कभी- कभी कोई कुछ देर के लिए नजर आता है।

एक महिला दिये से कोविड 19 यानी कोरोना भगाते हुए..


आना -जाना,मिलना -जुलना बिल्कुल बंद है।नपड़ोस में कोई किसी से कहता भी नहीं कि आओ और कोई जाना भी पसंद नहीं करता। उन्हें आपसे या आपको उनसे खुदा न खास्ता कोरोना न लग जाए, इसका डर है। हमें भी है। यह डर ज्यादा है कि कहीं दूसरों को यह कहने का मौका न मिल जाए कि इनकी वजह से हमें कोरोना हो गया। हम स्वस्थ हैं, फिर भी किसी को यह मौका गलती से भी क्यों दें?

इतना फर्क जरूर पड़ा है कि (सभी नहीं) कुछ मित्रों-परिचितों से कभी- कभी ही, किसी खास कारण से ही संवाद होता था, अब अकारण और अधिक नियमित रूप से होने लगा है- हाल चाल लेने के लिए। यह संवाद दोतरफ़ा है। घर बैठ -बैठ कर ऊब चुके लोगों के लिए वैसे भी टेलीफोन- मोबाइल ही एकमात्र सहारा है-संवाद का। टीवी, सोशल मीडिया का भी खूब सहारा है। जीवन में पहली बार ऊब की हद तक लोगों के पास अवकाश है और एकदूसरे के पास रहने, बात करने, झगड़ने, गढ़े मुर्दे उखाड़ने की पर्याप्त फुर्सत भी।

दुख इस बात का है कि भारतीय-खासकर हिंदीभाषी समाज में सोशल मीडिया के अलावा लिखने-पढ़ने का कोई शौक नहीं। सोशल मीडिया में भी अधिकतर फारवर्ड-फारवर्ड का खेल खूब चलता है। व्हाट्सएप तो अज्ञान- अंधविश्वास और नफरत फैलाने का मजबूत किला है। मैंने अपने आप को इससे बचा कर रखा है, हालांकि जो देखो, वही कहता है, अभी व्हाट्सएप पर फलां भेजता हूँ या आप भेज दो।

कल रात नौ बजे घर की लाइट बंद करके बाहर दिए या टार्च या मोबाइल से नौ मिनट रोशनी करने के आह्वान को भक्तों ने मूर्खता के महोत्सव में बदल दिया। ‘व्हाट्सएप ज्ञान’ का ऐसा वितरण पहले और बाद में हुआ कि फिर लगा कि इस दुनिया में जीना और साँस लेना तक कितना मुश्किल है।

एक मोदी समर्थक कोरोना भगाते हुए..

इस मूर्खता महोत्सव ने रोज कमाकर खाने वालों की चीखों और भूख को किनारे कर दिया। यही इसका उद्देश्य भी रहा होगा। आज इस देश का गरीब बेहिसाब अनिश्चितताओं में रह रहा है। पहले अनिश्चितताओं और निश्चिंतताओं का अनमेल मेल चला करता था। अब किसी भी तरह की कोई निश्चितता नहीं रही। न रोजगार की, न जीवन की। दस बाय दस की कुल जगह में क्या तो लोग सोशल डिस्टेंसिंग भी इन दिनों क्या करते होंगे और क्या खातेपीते होंगे? न जाने कितने स्वाभिमानी गरीब हाथ पसारकर माँगने की बजाय भूख की राह मौत चुन रहे होंगे। न जाने कितने बीमार इस बीच मौत के करीब जा चुके हैं। मेरे एक मित्र की माँ के असमर्थ शरीर में सिर्फ कराह बची थी, अब वे कराहने में भी असमर्थ हैं। न जाने कितने घरों की ऐसी ही या इससे मिलती -जुलती दास्तानें होगीं-कोरोना के महा शोर में दबी हुई।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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