पत्रकारों के लिए मिसाल माखनलाल चतुर्वेदी..

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-नवीन शर्मा।।
देश के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान आजादी की लड़ाई और पत्रकारिता दोनों क्षेत्रों में जिन लोगों ने अद्भुत काम किया उनमें माखनलाल चतुर्वेदी व गणेश शंकर विद्यार्थी अग्रणी हैं। खासकर हिंदी पट्टी की पत्रकारिता में इनका काम काफी महत्वपूर्ण है।
माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल 1889 को मध्यप्रदेश के होशंगाबाद में हुआ था। माखनलाल जब 16 वर्ष के हुए तब ही स्कूल में अध्यापक बन गए थे। उन्होंने 1906 से 1910 तक एक विद्यालय में अध्यापन का कार्य किया, लेकिन जल्द ही माखनलाल ने अपने जीवन और लेखन कौशल का उपयोग देश की स्वतंत्रता के लिए करने का निर्णय ले लिया।

स्वतंत्रता संग्राम में हुए शामिल

उन्होंने असहयोग आन्दोलन और भारत छोड़ो आन्दोलन जैसी कई गतिविधियों में भाग लिया। इस दौर का एक वाकया पढ़िए जिससे हम उनकी निर्भीकता को समझ सकेंगे।
कलेक्टर: आपके अख़बार में काबिले-एतराज़ बातें छपती हैं।
माखनलाल: काबिले-एतराज़ बातें छापने के लिए ही हमने अख़बार निकाला है।
कलेक्टर: आप सरकार की आलोचना करते हैं।
माखनलाल: सरकार की आलोचना करने के लिए ही हमने अख़बार निकाला है।
कलेक्टर: मैं आपका अख़बार बंद करवा सकता हूँ।
माखनलाल: हमने यह मानकर ही अख़बार निकाला है कि आप इसे बंद करवा सकते हैं।
कलेक्टर: मैं आपको जेल में डाल सकता हूँ।
माखनलाल: हम यही मानकर यह सब करते हैं कि आप हमें जेल में डाल सकते हैं।
कलेक्टर हँसा।
बोला: Look here, I am not English, I am Irish, but I am an employee of these bastards, Englishmen. I will have to take some action to show them. So be cautious. ( देखो, मैं अंग्रेज़ नहीं हूँ, मैं आयरिश हूँ, लेकिन मैं इन घटिया अंग्रेज़ों का कर्मचारी हूँ. उन्हें दिखाने के लिए मुझे कुछ-न-कुछ कार्रवाई करनी पड़ेगी. इसलिए सतर्क रहो.)

इसी क्रम में वो कई बार जेल भी गए और जेल में कई अत्याचार भी सहन किए,लेकिन अंग्रेज उन्हें कभी अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सके।

अध्यापन भी किया

1910 में अध्यापन का कार्य छोड़ने के बाद माखन लाल राष्ट्रीय पत्रिकाओं में सम्पादक का काम देखने लगे थे. उन्होंने प्रभा” और “कर्मवीर” नाम की राष्ट्रीय पत्रिकाओं में सम्पादन का काम किया

माखनलाल ने अपनी लेखन शैली से देश के एक बहुत बड़े वर्ग में देश-प्रेम भाव को जागृत किया. उनके भाषण भी उनके लेखो की तरह ही ओजस्वी और देश-प्रेम से ओत-प्रोत होते थे.

उन्होंने 1943 में “अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन” की अध्यक्षता की. उनकी कई रचनाए तब देश के युवाओं में जोश भरने और उन्हें जागृत करने के लिए बहुत सहायक सिद्ध हुई.

नव छायावादी शैली
माखनलाल की लेखन शैली नव-छायावाद का एक नया आयाम स्थापित करने वाली थी. जिनमे भी चतुर्वेदी की कुछ रचनाए “हिम-तरंगिनी, कैसा चाँद बना देती हैं,अमर राष्ट्र और पुष्प की अभिलाषा तो हिंदी साहित्य में सदियों तक तक अमर रहने वाली रचनाएँ हैं, और कई युगों तक यह आम-जन को प्रेरित करती रहेगी।
हिंदी साहित्य को योगदान

माखनलाल की कुछ प्रमुख कालजेयी रचनाए हैं – हिम तरंगिनी,समर्पण,हिम कीर्तनी,युग चरण,साहित्य देवता दीप से दीप जले,कैसा चाँद बना देती हैं और पुष्प की अभिलाषा. जिनमें से वेणु लो गूंजे धरा’,हिम कीर्तिनी,हिम तरंगिणी,युग चरण,साहित्य देवता तो सुप्रसिद्ध लेख हैं।

इसके अलावा कुछ कविताएं जैसे अमर राष्ट्र, अंजलि के फूल गिरे जाते हैं, आज नयन के बंगले में, इस तरह ढक्कन लगाया रात ने, उस प्रभात तू बात ना माने, किरणों की शाला बंद हो गई छुप-छुप, कुञ्ज-कुटीरे यमुना तीरे, गाली में गरिमा घोल-घोल, भाई-छेड़ो नहीं मुझे, मधुर-मधुर कुछ गा दो मालिक, संध्या के बस दो बोल सुहाने लगते।

साहित्य एकेडमी का अवार्ड जीतने वाले पहले व्यक्ति

माखनलाल 1955 में साहित्य एकेडमी का अवार्ड जीतने वाले पहले व्यक्ति हैं। हिंदी साहित्य में अभूतपूर्व योगदान देने के कारण ही पंडितजी को 1959 में सागर यूनिवर्सिटी से डी.लिट् की उपाधि भी प्रदान की गयी।

पद्म भूषण सम्मान मिला
1963 में माखनलाल चतुर्वेदी को साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में अपूर्व योगदान के कारण पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया।
माखनलाल चतुर्वेदी के साहित्य की विधा में दिए योगदान के सम्मान में बहुत सी यूनिवर्सिटी ने विविध अवार्ड्स के नाम उनके नाम पर रखे.मध्य प्रदेश सांस्कृतिक कौंसिल द्वारा नियंत्रित मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी देश की किसी भी भाषा में योग्य कवियों को “माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार” देती हैं. पंडितजी के देहांत के 19 वर्ष बाद 1987 से यह सम्मान देना शुरू किया गया।

उनके नाम पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय बना
भोपाल,मध्य प्रदेश में स्थित माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय पूरे एशिया में अपने प्रकार का पहला विश्व विद्यालय हैं. इसकी स्थापना पंडितजी के राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम में पत्रकारिता और लेखन के द्वारा दिए योगदान को सम्मान देते हुए 1991 में हुई.
साहित्य जगत का यह अनमोल हीरा 30 जनवरी 1968 को खो दिया. पंडितजी उस समय 79 वर्ष के थे,और देश को तब भी उनके लेखन से बहुत उम्मीदें थी.
पंडित माखन लाल चतुर्वेदी को सम्मान देते हुए पोस्टेज स्टाम्प की शुरुआत की. यह स्टाम्प पंडितजी के 88वें जन्मदिन 4 अप्रैल 1977 को ज़ारी हुआ।

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