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-सुनील कुमार।।
छत्तीसगढ़ के सरगुजा इलाके से सुबह-सुबह ही दिल दहलाने वाली खबर आई, एक आदमी ने आधी रात अपनी माँ और तीन बुजुर्ग पड़ोसियों का कत्ल कर दिया, कई बैल और मुर्गे काट डाले। यह सब एक तांत्रिक पूजा के बाद किया बताया जा रहा है। देश में जगह-जगह तांत्रिक पूजा, और बलि के नाम पर कत्ल की कई वारदातें सामने आती हैं, छत्तीसगढ़ में हर महीने ही ऐसा कुछ-ना-कुछ होते ही रहता है। इससे परे महिलाओं को टोनही कहकर मारना भी छत्तीसगढ़ और झारखण्ड में बहुत बार होता है। इक्कीसवीं सदी चल रही है, इस देश में कहीं जाति के नाम पर, कहीं धर्म के नाम पर, कहीं सगोत्र विवाह करने पर, तो कहीं दूसरी जाति में विवाह करने पर कत्ल किए जाते हैं, और लोग उन्हें इज्जत के लिए किए गए कत्ल भी कहते हैं, ऑनर -किलिंग!

देश में पढ़ाई-लिखाई, राजनीतिक-चेतना, और शहरीकरण के साथ लोगों की सोच में जो वैज्ञानिकता आनी थी, वह आनी तो दूर रही, रही-सही भी बुरी तरह घटती दिख रही है। अब लोग और अधिक कट्टर, धर्मांध, नफरतजीवी होते दिख रहे हैं। वैज्ञानिकता के साथ एक दिक्कत है, जब वह जाती है, तो पूरी तरह से जाती है, और अन्धविश्वास बारात लेकर आता है, डेरा जमा लेता है, घरजमाई होकर बैठ जाता है। आप लोगों से गणेश को दूध पिलवा दें, उनके भीतर की वैज्ञानिकता चल बसती है, फिर उनसे आगे चलकर दूसरे पाखंड करवाना आसान हो जाता है। हिंदुस्तान में हम देखते हैं कि कुछ ताकतें लगातार बीच-बीच में परखती रहती हैं कि लोगों में सोचने-समझने की ताकत बची हुई तो नहीं है? ऐसा हो तो फिर कोई और पाखंड खड़ा कर दिया जाता है। जैसे कोरोना पॉजिटिव मरीज की बार-बार जाँच करके देख लिया जाता है कि कोरोना चल बसा है या नहीं, उसी तरह हिंदुस्तान में राजनीतिक ताकतें, धर्मांध ताकतें बार-बार देख लेतीं हैं कोई वैज्ञानिकता बच तो नहीं गई है। इसके लिए अन्ना हजारे, श्री-श्रीरविशंकर, बाबा रामदेव, सदगुरु, बलात्कारी आसाराम जैसे कई लिटमस पेपर इस्तेमाल किए जाते हैं। आसाराम जब लोगों को ऐसा पाते हैं कि वे अपनी नाबालिग लड़की को भी ऐसे बाबा के पास छोड़ सकते हैं, तो फिर यह समाज की एक अच्छी परख हो जाती है कि यह समाज, यह देश अब और अधिक दूर तक बेवकूफ बनाने के लायक फिट है। फिर राम-रहीम नाम का एक और लिटमस पेपर और लोगों से बलात्कार करके, मर्दों को बधिया बनाकर और परख लेता है। ये सारे लोग फिर निर्मल बाबा की तरफ भी देखते रहते हैं कि लोग वहां मोटा भुगतान करके बेवकूफ बनने का सर्टिफिकेट खरीद रहे हैं या नहीं।

नेहरू ने इस देश में बड़ी कोशिश करके जो वैज्ञानिक सोच विकसित की थी, उसे तबाह करना तो उनकी बेटी ने ही मचान पर टंगे देवरहा बाबा के पाँव तले अपना सर धरकर शुरू कर दिया था, और बाद में बहुत सी पार्टियों ने, बहुत से नेताओं ने यही काम किया. और तो और दिग्विजय सिंह जैसे धर्मान्धता-विरोधी नेता भी आसारामों जैसों के चरणों में बिछते रहे, गलत मिसालें कायम करते रहे। अभी-अभी दिल्ली में मुस्लिमों के एक संगठन ने जिस तरह कोरोना-चेतावनी को अनदेखा करके, खतरे को अनसुना करके पूरे देश पर कोरोना-खतरे को दुगुना कर दिया है, वह वैज्ञानिक सोच पर अन्धविश्वास, धर्मान्धता की जीत रही।

जब देश की सोच से तर्क निकाल दिए जाएँ, सवाल निकाल दिए जाएँ, तो फिर उस खाली जगह पर अन्धविश्वास, धर्मान्धता तेजी से घुसकर काबिज हो जाते हैं। ऐसे में पहले से जिनकी आस्था अंधविश्वासों पर हो, वे तो अपनी इस सोच को और पुख्ता बना बैठते हैं। इसी सरगुजा में पिछली भाजपा सरकार के गृहमंत्री जिस तरह से एक कम्बल-बाबा के कम्बल में दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय
5 अप्रैल 2020 जाने वाले इलाज को स्थापित करते रहे, उससे बाकी पाखंडियों को और बाजार मिला। बीती रात सरगुजा में जो इतने क़त्ल हुए, वे उसी किस्म के बाजार की उपज हैं, वे रातों-रात नहीं हुए हैं, वे लंबी मेहनत की फसल की उपज हैं। फिलहाल आज रात दिए जलते देखने की तैयारी करें।
(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय 5 अप्रैल 2020)

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