हिन्दी और अंग्रेजी अखबारों का अंतर..

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संजय कुमार सिंह।।

आज देश भर में प्रधानमंत्री की अपील पर बत्ती बुझाकर दीया जलाने की तैयारी है। प्रधानमंत्री के विरोधियों ने हवा उड़ा दी कि इससे ग्रिड फेल कर जाएंगे। भक्तों ने पूछा पहले ग्रिड क्यों नहीं फेल करते थे। बताया गया कि किसी अपील पर या योजना के अनुसार अचानक लाखों हजारों बत्तियां बद करने से ग्रिड फेल न करे इसके बंदोबस्त किए जाते हैं। प्रधानमंत्री की अपील सरकारी आदेश नहीं है इसलिए विवाद है। बाद में बिजली मंत्रालय ने कह दिया कि कोई दिक्कत नहीं होगी। पर यह नहीं बताया कि उसके लिए देश भर में सैकड़ों लोगों को काम पर लगाया गया है उन्हें सतर्क रहना होगा। इस आशय के पत्र और आदेश सोशल मीडिया पर भी आ गए। फिर भी आज के हिन्दी अखबारों में इसपर कोई खबर पहले पेज पर नहीं है। विवाद था, यह बताने के लिए नहीं तो ये जानकारी देने के लिए भी नहीं कि वो चिन्ता न करें। चार अंग्रेजी अखबारों की पहले पन्ने की खबरें साथ पोस्ट कर रहा हूं। द टेलीग्राफ ने तो इस खबर को लीड बनाया है। इसमें बताया गया है कि देश भर में बिजली के भार और मांग के बीच संयोजन स्थापित करने वाली सरकारी संस्था पोसोको ने इसके लिए 13 पन्ने की एडवाइजरी जारी की है।

दूसरी ओर, हिन्दी के जो सात अखबार मैं देखता हूं उनमें सिर्फ नवभारत टाइम्स में खबर छपी है जो इस प्रकार है। सरकार ने कहा, ग्रिड फेल नहीं होने देंगे। इसके संबंधित अंश हैं, … पीएम की अपील पर महाराष्ट्र के ऊर्जा मंत्री समेत विपक्षी दलों ने ही नहीं, कई जानकारों ने भी ग्रिड फेल होने की आशंका जताई। सोशल मीडिया पर भी बहस छिड़ी। आखिरकार सरकार सामने आई। केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय ने ग्रिड फेल होने की आशंका को खारिज किया और कहा कि बिजली में उतार-चढ़ाव में संतुलन के लिए पर्याप्त इंतजाम हैं। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया कि पीएम ने स्वैच्छिक रूप से घरों की लाइट बंद करने की अपील की है। यह नहीं कहा कि स्ट्रीट लाइट, घर के पंखे, टीवी, कूलर, एसी और फ्रिज बंद करना है। साथ ही जरूरी सेवाओं, जैसे- अस्पतालों, पुलिस थानों, उद्योगों, ऑफिसों आदि में लाइट जलती रहेगी।

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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