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-संजय कुमार सिंह।।
लाइट बंद करके दिया जलाने की प्रधानमंत्री की अपील से पावर ग्रिड फेल हो सकता है इस आशय की एक पोस्ट क़्मेके ज़रिए मेंरे मित्र ने प्रधानमंत्री की अपील के तुरंत बाद बताई। मैंने उसपर ध्यान नहीं दिया। मैं जानता हूं कि पहले भी लाइटें बंद की जाती रही हैं और 1971 की लड़ाई में अचानक सायरन बजता था तो लाइटें बंद कर दी जाती थीं और तब सड़क पर भी लाइट नहीं जलती थी। घर के अंदर लाइट बंद कर मोमबत्ती के प्रकाश की शक्ति और बम गिरने पर खत्म हो जाने का डर सब झेल चुका हूं। और इसलिए साथ रहने का महत्व भी जानता हूं। मुझे याद है, घर की खिड़की में कागज चिपका दिए गए थे और एक दफा हम अंदर मोमबत्ती में बैठे थे तो बाहर से किसी ने खिड़की खुलवाकर बताया था कि मोमबत्ती की रोशनी बाहर जा रही है।
ऐसे में मुझे मोमबत्ती की रोशनी की ताकत नहीं देखनी है और प्रधानमंत्री का विरोध तो मैं करता रहता हूं फिर भी मुझे पावर ग्रिड फेल करने वाला मामला गंभीर नहीं लगा। मुझे उसपर लिखने की जरूरत नहीं महसूस हुई। शाम को एक मित्र ने इस पर लिखने के लिए कहा (लिखना अपना धंधा है, दाल रोटी इससे भी चलती है) तो मैंने मामले को समझने की कोशिश की। मनी कंट्रोल डॉट कॉम की खबर पढ़ी। मुझे लगा कि बात में दम है। पर खबर करने की जरूरत मुझे तब भी नहीं लगी और मैंने मित्र से कह दिया कि इस पर खबर हो चुकी है। मैं चाहता था कि मामला कोई करवट ले। आज उस तर्क का मजाक उड़ाना शुरू हो गया। दूसरे शब्दों में मोदी जी की अपील का बचाव शुरू हो गया।


आज ही रोज कहानी लिखने वाले मित्र संजय सिन्हा ने कालीदास की कहानी लिखी है। इसमें बताया है कि कैसे प्रचारकों ने अपनी दलीलों से कालीदास को महान बनाकर उनकी शादी करवा दी थी। और यह भी कि शादी के लिए कालीदास का चुनाव क्यों किया गया था। संजय सिन्हा राजनीति पर नहीं लिखता और कहता भी है कि उसकी कहानी में राजनीति न तलाशी जाए पर हमलोग कहां मानते हैं। वैसे भी, मोदी जी के बचाव में पोस्ट आनी शुरू हुई तो मुझे अटपटा लगा और जो सब हो रहा था वह मोदी जी को कालीदास बनाने जैसा लगा। ठीक है कि मोदी जी का चुनाव जनता ने उनकी योग्यता और लोकप्रियता पर किया है लेकिन राहुल गांधी को पप्पू साबित करने वाले लोग ही मोदी जी को अब कालीदस की स्थिति में पहुंचा रहे हैं। पर वह अलग मुद्दा है। आइए मोदी जी के समथने में आई कुछ पोस्ट देंखें।
मित्र उमेश चतुर्वेदी ने फेसबुक पर लिखा, जब पूरी दुनिया अर्थ आवर मनाती है, तब कितनी बार दुनिया के ग्रिड फेल हुए हैं? सुरेन्द्र किशोर ने लिखा, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने नौ मिनट के लिए बिजली की सिर्फ बत्ती बुझा देने के लिए कहा है। उन्होंने पंखा, एसी और दूसरे उपकरणों को भी बंद करने के लिए थोड़े कहा है! यदि उस समय बाकी उपकरण चालू रहेंगे तो ग्रिड कैसे फेल कर जाएगा?

मशहूर लेखक और आईआईटी के छात्र रहे चेतन भगत ने ट्वीट किया, मैं इलेक्ट्रीकल एक्सपर्ट नहीं हूं। पर लोगों के लाइट ऑफ करने ग्रिड फेल कर जाने का दावा, वाकई? फ्रीज ऑन है, पंखे भी ऑन हैं, स्ट्रीट लाइट भी। इस बारे में सोचिए। लाइट दिन में बंद रहती है और ग्रिड फेल नहीं होता है सही है? अंग्रेजी में इतना लिखने के बाद भगत ने लिखा है, लाइट जलाओ ना जलाओ, दिमाग की बत्ती जरूर जला लेना! (ये तीनों पोस्ट इतने ही हैं, मैंने संदर्भ से हटाकर नहीं लिखा है)।
इस मामले में मेरा मानना है और यह मुद्दा भी है कि अर्थआवर की अपील सार्वजनिक होती है, और जनहित में किया जाता है। अव्वल तो नहीं शामिल होने का कोई कारण नहीं है पर जो शामिल न हों उन्हें मोहल्ले में ‘सेकुलर’, ‘कम्युनिष्ट’, भाजपा विरोधी, सरकार विरोधी (असल में देशद्रोही) घोषित होने का डर नहीं होता है और इस कारण उन्हें या उनके बच्चों को बाद में लिंच किए जाने का डर तो बिल्कुल ही नहीं होता है।

जनहित में उसका प्रभाव समझाया गया होता है या जो एंटायर पॉलिटिकल साइंस का विद्वान न हो उसे भी समझ में आने वाला होता है। वह कृत्रिम रोशनी के लिए उपलब्ध रोशनी को बंद करने का मामला नहीं होता है। उद्देश्य अंधेरा करना ही होता है। इसलिए बाकी एजेंसियां वैसी व्यवस्था करती हैं (होंगी)। प्रधानमंत्री की अपील ऐसी नहीं है। अगर यह सरकारी आदेश होता तो बिजली कंपनियां वो कार्रवाई करतीं जो जनहित के मामले में करती हैं। अभी करेंगी तो उनपर प्रधानमंत्री की अपील के समर्थन का आरोप लगेगा और नहीं करेंगी तो राष्ट्रीय नुकसान होगा – इसलिए यह मुद्दा है और इसपर स्पष्टीकरण प्रधानमंत्री को या उनके कार्यालय को देना चाहिए। सरकारी आदेश बनाया जा सकता है।

मुझे एक वीडियो मिला जो महाराष्ट्र के बिजली मंत्री का बताया गया है और उसमें लोगों से समस्या बताई है, कहा गया है कि इन दिनों औद्योगिक लोड नहीं है। इसलिए स्थिति अलग है। इसके अलावा, उत्तर भारत या हिन्दी पट्टी में गीजर, पंखे या एसी का लोड नहीं के बराबर है। और बात रोड पर जलने वाली लाइट की नहीं, बंद होने वाली लाइट में लगने वाली बिजली की है।


यह तेज चल रही गाड़ी में अचानक ब्रेक लगाने जैसा बताया गया है। आम समझ है कि गाड़ी ठीक-ठाक रुक कर सामान्य ढंग से आगे बढ़ सकती है पर अचानक ब्रेक लगाने के लिए कहना ही क्यों? अगर प्रधानमंत्री के संदेश से भ्रम हुआ है तो उन्हें स्पष्टीकरण देना चाहिए पर राजनीति ऐसा करने नहीं देगी। और यही समस्या है। ऐसा नहीं है कि यह मामला बिल्कुल निराधार है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि उस समय अपने बिजली के उपकरण ऑफ रखना सबसे सुरक्षित है। अब जो नहीं जानता है वह क्या करे? अपने उपकरण बचाए या ग्रिड – दोनों बचा नहीं सकता कोई भी खराब हो नुकसान उसका ही होना है। पर भक्तों को इससे मतलब नहीं है। इस संबंध में विद्युत मंत्रालय से एक स्पष्टीकरण आया है जो उत्तर प्रदेश बिजली बोर्ड की आंतरिक चिन्ताओं का जवाब नही देता है।

उत्तर प्रदेश पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन लिमिटेड के डायरेक्टर, स्टेट लोड डिस्पैच सेंटर ने डायरेक्टर परिचालन, तकनीकी और वितरण को पत्र भेजकर इस मामले में आगाह किया है और संबंधित निर्देश की मांग की है। संभव है देश भर में ऐसा होगा और आपको कुछ करना नहीं पड़े तथा सब ठीक से गुजर जाए। लेकिन शंका निराधार नहीं है पर मोदी जी की अपील का बचाव बिल्कुल गैरजरूरी है।

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By Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।

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