Home देश उनके लिए नौ मिनट पूनम का चाँद देखना..

उनके लिए नौ मिनट पूनम का चाँद देखना..

-सुनील कुमार।।
फिर आकाशवाणी हुई है कि 5 तारीख को रात 9 बजे लोग अपने दरवाजों पर आकर, अपनी बालकनी से, 9 मिनट तक दिया मोमबत्ती, टॉर्च, मोबाइल फोन, किसी भी से रौशनी करें। 130 करोड़ हिंदुस्तानियों के एक साथ ऐसा करने से देश की एकता सामने आएगी और देश अँधेरे से लड़ सकेगा। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आसमान से ऐसा कहते हैं, तो देश में करोड़ों लोग उन्हें जरूर ही मानेंगे, और ऐसी रौशनी करेंगे। अब इस मुद्दे पर लिखते हुए एक दिक्कत आ रही है कि बात सीधी-सपाट लिखी जाए, या व्यंग्य में लिखी जाए, या प्रतीकों में लिखी जाए, जिनमें कि मोदी इन दिनों समाधान दे रहे हैं ?

चलिए, सीधे शब्दों में ही सही। मोदी ने कुछ दिन पहले थाली-ताली, शंख-घंटी बजवाये थे। दिन भर जनता कर्फ्यू का सन्नाटा था, और शाम में सड़कों पर खूब जश्न मनाया गया था। इसलिए इस बार मोदीजी ने इस बार घर की देहरी से बाहर जाने मना कर दिया। अब सवाल यह है कि आज सुबह 9 बजे देश के लोग प्रधानमंत्री से क्या सुनना-जानना चाहते थे? देश में जगह-जगह से डॉक्टर लिख रहे हैं कि उन्हें मास्क नहीं मिल रहे, दस्ताने नहीं मिल रहे, सोने का वक्त नहीं मिल रहा, और अभी दो दिन से तो कुछ धर्मांध मुस्लिम, अस्पतालों में उन पर थूक भी रहे हैं। इंदौर में तो मुस्लिम मोहल्ले में पहुंचे स्वस्थ्य कर्मचारियों, डॉक्टरों पर जमकर पथराव हुआ। पूरे देश का मीडिया इन ख़बरों से भरा पड़ा है कि किस तरह देश भर से मजदूर अपने गावों के सैकड़ों-हज़ार किलोमीटर के पैदल सफर पर निकल पड़े हैं, किस तरह रास्तों पर मर रहे हैं। उन्हें न दवा हासिल है, न जांच, ना इलाज, और तो और उनके पास खाने और सर छुपाने को भी नहीं है। न रोजगार है, न गांव है, न परिवार साथ में है। ऐसे करोड़ों लोग अपने ही देश में अजनबी हैं और शरणार्थी हैं। जिस प्रदेश में फंसे हैं, वहां कोई इंतजाम हो गया तो ठीक है वरना कोरोना के पहले भी मौत तो है ही। लोगों के मन में लॉकडाउन के बाद जि़ंदा रहने के लिए फिक्र है, क्योंकि देश के करोड़पतियों और अरबपतियों के मन में भी आने वाले महीनों के लिए फिक्र है, बेघर, बेबस, बेरोजगार के मन में तो दहशत है ही। दहशत के इस अँधेरे को कौन सा दिया मिटाएगा?

नरेंद्र मोदी की तरकीबें बहुत आसान हैं, नोटबंदी के एटीएम पर खड़े हैं, भूख लगी है, तो कभी तिरंगा, कभी राष्ट्रवाद, कभी भारतमाता, कभी कारगिल की शहादत, कभी 130 करोड़ लोगों की सामूहिक ताकत का झुनझुना लोगों को थमा देते हैं, और उनके भक्त थाली पीटकर अपनी सामाजिक जवाबदेही पूरी मान लेते हैं, मान लेते हैं कि कोरोना को भागने के लिए उन्होंने काफी कर लिया। नरेंद्र मोदी खुद बहुत चतुर हैं, इसलिए हम यह तो नहीं मानते कि वे खुद भी इस खुशफहमी में पड़ जाते होंगे कि उन्होंने कोरोना से लडऩे के लिए, 130 करोड़ लोगों की जरूरत के लिए, सब कुछ कर दिया है। हम उनको बहुत समझदार मानते हैं, और इसलिए मानते हैं कि वे खुद अपनी ऐसी बात में फंसने वाले नहीं हैं, वे ऐसी धारणा के शिकार नहीं हो सकते। उनको जन्नत की हकीकत अच्छी तरह मालूम है।

आज देश के 130 करोड़ लोगों को किस एकता की जरूरत है? लोग तो एक ही हैं, एकता की जरूरत है तो खुद प्रधानमंत्री को है कि ऐसी मुसीबत के वक़्त वे राज्यों को साथ लेकर चलने की एकता दिखाएँ। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अभी कुछ इंटरव्यू में कहा है कि प्रधानमंत्री लॉकडाउन के पहले मुख्यमंत्रियों से सलाह-मशविरा कर लेते तो उस पर बेहतर अमल हो पता। दिक्कत के बीच इस बात को लोग आलोचना भी मान सकते हैं, लेकिन अगर मुसीबत के वक्त भी हम आईना देखने से इंकार कर देंगे, तो आज तो देवताओं ने भी ताली-घंटी, शंख-आरती, सुनना बंद कर दिया है, इंसानों को भी आत्मप्रशंसा सुनना बंद कर देना चाहिए। आज का वक्त तो कड़वी हकीकत को देखने और मानने का है। बाकी वक्त तो निर्मल बाबा भी आसान समाधान बता देते हैं कि फलां दिन, फलां बजे, फलां रंग के कुत्ते को रोटी देने से कृपा बरसेगी। देश के 130 करोड़ लोग तो वैसे भी एक हैं, अपने घरों में हैं, कहीं कोई दंगा नहीं हो रहा है। जब देश के 130 करोड़ लोग एक मुसीबत को झेल रहे हैं, तो वे वैसे भी एक साथ हैं। ऐसे में बंद मंदिरों के देश में घरों की देहरी पर एक नए किस्म की रौशनी से क्या हासिल होगा? किसे हासिल होगा? फिर मोदीमुग्ध देश यह खबरें भी पढऩे से इंकार कर रहा है कि मोदी की थाली-चम्मच, घंटी की आईडिया उनसे बहुत दिन पहले इटली और स्पेन में इस्तेमाल हो चुकी थी, और अब रौशन-खय़ाल भी एक पखवाड़े से अधिक पुराना है, इटली का ही है, जिसके लोगों ने कोरोना-ग़मगीन माहौल को हराने के लिए यह तरकीब आजमाई थी। पूरी दुनिया में प्रचारित ऐसे प्रयोगों को मोदी क्यों दुहरा रहे हैं?

प्रतीकों की बातें धर्म, आध्यात्म, और बाजीगरी दिखने वालों को तो माकूल लगती हैं, लेकिन इस सबसे बड़ी मुसीबत के बीच हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री ठोस बात करते ही सुहाता। मोदीजी की खासियत यही है कि वे सीधे मुद्दे की बात नहीं करते, सीधे समाधान की बात भी नहीं करते, वे दरअसल सीधे आँखों में आँखें डालकर भी बात नहीं करते, वे सब कुछ पूर्वनियोजित, प्रायोजित, और सुनियोजित करते हैं। उनके पास अनायास सवालों की गुंजाईश नहीं है, सायास सवालों की ही जगह है जिनके जवाब भी सवाल पूछते टीवी पत्रकार पन्नों पर लेकर बैठते हैं, कैमरों पर दिखते भी हैं। ऐसे में देश के इस मुकाम पर भी प्रधानमंत्री करोड़ों बेघर, बेबस, शरणार्थियों के लिए अगर घरबार वालों के दरवाजों पर रौशनी में कोई रास्ता देखते हैं, तो यह अपने शब्दों पर मुग्ध नेता की पहचान है।

जो हफ्ते भर से पैदल सफर के बीच कहीं पड़े हैं, तो अस्पतालों में लोगों को बचाते हुए जिनकी खुद की जिंदगी खतरे में है, जो बिन तैयारी, बिन योजना के लॉकडाउन की वजह से राज्यों में करोड़ों मजदूरों की दिक्कत झेल रहे हैं, उन लोगों को मोदी से कुछ तो ठोस बात करने की उम्मीद थी। लेकिन भूखे देश को गोल रोटी की जरूरत पर मोदी ने नौ मिनट तक पूनम का चाँद देखने कह दिया है।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 3 अप्रैल 2020)

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