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स्वास्थ्य सुविधाओं पर सबका हक़..

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दुनिया भर में कोरोना वायरस ने मानव जाति के समक्ष अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। आज के दौर में जब हम खुद को विकसित मानने का दंभ पाले हुए हैं। लेकिन एक अतिसूक्ष्म वायरस ने हमें आईना दिखा दिया है। यह समय बहुत कठिन है, लेकिन यही सही वक्त भी है जब हम अपनी गलतियों को सुधार कर भावी पीढ़ियों के लिए जीवन आसान बना सकते हैं। कोरोना का असर राजा और रंक सब पर एक समान हो रहा है, जो यही सीख दे रहा है कि इलाज पर, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं पर सबका एक समान ही अधिकार है। दुनिया की कई पूंजीवादी ताकतें इस वक्त कोरोना से सबसे अधिक प्रभावित दिख रही हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अगले दो हफ्ते बेहद चुनौतीपूर्ण बताएं हैं। ऐसा ही कुछ हाल अब भारत का भी है, हालांकि अपनी बेवकूफी में हम अब भी इसमें हिंदू-मुस्लिम एंगल ढूंढने में लगे हैं। कोरोना तो धर्म, जाति, दौलत किसी सीमा को मानता नहीं दिख रहा है। इसलिए अगर हम यह सोचें कि स्वास्थ्य सुविधाएं अमीरों के लिए, सवर्ण जातियों के लिए श्रेष्ठ रहें और गरीब अपनी मजबूरी के कारण मर जाएं, तो यह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा ही होगा। कम से कम आज के हालात से सबक लेकर अब दुनिया भर की सरकारों को स्वास्थ्य सुविधाओं को निजीकरण के दोष से मुक्त कर देना चाहिए। पूंजीवादी सरकारों ने सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को ध्वस्त कर बड़ी चालाकी से उसमें निजी क्षेत्र की घुसपैठ करवाई। जबकि जिन देशों की सरकारों ने जनता के लिए बेहतर इलाज का जिम्मा खुद उठाया, वो आज दुनिया के लिए मिसाल बन रहे हैं। हाल ही में क्यूबा से डाक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों की एक टीम इटली के मिलान पहुंची। इसके पहले कोरोना से जूझने के लिए क्यूबा की टीमें पांच वेनेजुएला, जमैका, ग्रेनाडा, सूरीनाम और निकारागुआ मुल्कों में भेजी गयी हैं। जब सारे देश केवल और केवल अपनी चिंता में डूबे हैं, क्यूबा के जनसेवी डाक्टर मानवता की सेवा में लगे हैं। 
यह वही क्यूबा है, जिस पर अमेरिका ने अरसे तक प्रतिबन्ध लगाये और इटली जैसे देशों ने उसमें साथ दिया। कई  मुश्किलों के बावजूद क्यूबा में स्वास्थ्य सेवाएं दुनिया के लिए मिसाल हैं।  क्योंकि क्यूबा में स्वास्थ्य सेवाओं को इलाज केंद्रित रखा गया है, यानी उसका प्रमुख उद्देश्य रोगी का जल्द से जल्द सही इलाज होता है, जबकि अमेरिका जैसे तमाम पूंजीवादी देशों में स्वास्थ्य सेवाएं बीमारी केंद्रित होती हैं, जिसमें निजी अस्पतालों और बीमा कंपनियों के मुनाफे के लिए मरीज को जबरन अस्पताल में रोकने, तरह-तरह के टेस्ट कराने के लिए बाध्य किया जाता है। जो इसका बोझ उठा सकता है, वह जीने का अधिकारी होता है, और जो इस खर्च को वहन नहीं कर सकता, उसे बेमौत मरना पड़ता है। कोरोना से जंग के इस माहौल में एनएचएस जैसी संस्थाओं की जरूरत है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद इंग्लैंड के पुननिर्माण के लिए सर विलियम बेवरीज ने समाज के पांच दुश्मनों को दूर करने की जरूरत बताई थी, जो लालसा, बीमारी, अज्ञानता, गंदगी और आलस्य हैं। उन्होंने एक स्वस्थ समाज के लिए लोककल्याणकारी सरकार के जो कर्तव्य बताए, उसी से 1948 में नेशनल हेल्थ सर्विस की स्थापना इस सिद्धांत पर की गयी थी कि अच्छी स्वास्थ्य सेवा सभी को उपलब्ध होनी चाहिये चाहे उनके पास भुगतान करने की क्षमता हो या न हो। मागर्रेट थैचर के काय़र्काल में इस सेवा को धीरे-धीरे कमजोर करने की मुहिम शुरु हुई और बाद की सरकारों ने भी काय़र्कुशलता, प्रतियोगिता आदि के नाम पर इसे दरकिनार करने की कोशिश की। हालांकि वहां का एक बड़ा तबका एनएचएस की प्रासंगिकता बनाए रखने में जुटा है। भारत में पिछले साल चुनाव के वक्त राहुल गांधी ने स्वास्थ्य सेवाओं में निजीकरण की मुखालफत करते हुए राइट टू हेल्थ स्कीम की बात कही थी। लेकिन जनता ने फिर से मोदी सरकार को चुना, और स्वास्थ्य सेवाओं की जिम्मेदारी सरकार को उठाने से बरी कर दिया। मोदी सरकार की स्वास्थ्य नीति में पीपीपी यानि सरकारी-निजी भागीदारी पर जोर है, जिसमें धीरे-धीरे कर सरकार पर से बची-खुची जिम्मेदारी को भी खत्म कर दिया जाएगा। इस वक्त मोदी सरकार भी ट्रंप सरकार की तरह कोरोना के कारण होने वाले आर्थिक संकट से निबटने के लिए राहत पैकेज का ऐलान कर रही है। लेकिन सरकार की प्राथमिकता में सबसे ऊपर अपने राजकोष से स्वास्थ्य सेवाओं को जन-जन तक पहुंचाना होना चाहिए। लोग सेहतमंद रहेंगे तो देश आर्थिक तरक्की भी कर ही लेगा।

(देशबंधु)

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