पासपोर्ट और राशन कार्ड के बीच सरकारी तौर-तरीकों से खिंच गई है एक गहरी खाई..

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-सुनील कुमार।।
सच की लड़ाई बड़ी मुश्किल होती है। उसे झूठ से लडऩा होता है, जो कि बड़ा आकर्षक होता है, सनसनीखेज भी होता है, और लोगों के दिमाग पर जोर भी नहीं डालता। आज हिंदुस्तान में जब लोग चारों तरफ देश भर में बुरी तरह फंस गए बेबस, बेघर मजदूरों को देख रहे हैं, जो कि मजदूरी पाए बिना भी कारखाने, कंस्ट्रक्शन की जगहें, कारोबारी की जगहें छोड़कर रातों-रात सैकड़ों या हजार से भी अधिक किलोमीटर से पैदल सफर पर रवाना होने को मजबूर हुए, तो जाहिर है कि इस नौबत के लिए सरकार की आलोचना तो होगी ही। फिर यह तो वही सरकार है न जिसने दुनिया भर में बिखरे हिन्दुस्तानियों को विशेष विमान भेज-भेजकर वापिस बुलवाया, उन्हें मुफ्त में लेकर आयी। और यह तब हुआ जब जाहिर तौर पर कोरोना दूसरे देशों से हिंदुस्तान आने वाले लोगों के साथ आने की पुख्ता मेडिकल खबर थी। हिन्दुस्तानियों को लौटने का हक़ सौ-फीसदी था, लेकिन जगह-जगह भूख या कमजोरी से मर चुके दर्जनों पैदल मजदूरों के तबके में यह रंज तो जायज है कि पासपोर्ट वाले लोग बीमारी लेकर आये और राशन कार्ड वालों पर लाद दी। प्रदेश से लौटकर आये, दावतों में हिस्सा लिया, सरकारी चेतावनी के खिलाफ घूमे-फिरे, और बीमारी है कि गरीबों को बेरोजगार, बेघर, बेबस कर देने वाला लोकडाउन लड़वाकर मानी है। उसके बाद फिर आज तो ये गरीब बेघर राशन कार्ड वाले भी नहीं रह गए हैं, कार्ड अगर है भी तो किसी प्रदेश का, काम किसी और प्रदेश में कर रहे थे, और आज बीच रस्ते किसी और प्रदेश में फंस गए हैं। ऐसे बिन राशन कार्ड वालों को पासपोर्ट वाले लोग खटक रहे हैं तो उसमें कोई बेइंसाफी तो है नहीं। पासपोर्ट वालों की इमारतों में एयर इंडिया के पायलटों, विमान कर्मचारियों, डॉक्टरों, नर्सों को निकलने का काम भी चल रहा है, इसलिए आज इस देश में सरकार के कामों से पासपोर्ट और राशन कार्ड के बीच एक खाई तो खिंच ही गई है।

ऐसे में जब लोग संचितों के मुकाबले वंचितों के हक़ की बात कर रहे हैं, तो उन्हें अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है। जऱा सी एक चूक किसी को किसी धर्म का विरोधी साबित कर सकती है, जऱा सी चूक सरकार विरोधी साबित कर सकती है। मीडिया के पेशेवर लोगों को और भी सावधान रहना चाहिए क्योंकि वे एक हड़बड़ी के मोर्चे पर हैं, खुद आँखों देखी कम हो गयी है, और दूसरों के मोहताज अधिक हो गए हैं, सूचना के लिए, खबरों के लिए। ऐसे में गरीब के हक की बात करते हुए कोई चूक हो जाये तो वह पहाड़ सी बढ़ाकर सरकार-विरोधी करार दी जा सकती है।

देश में कोरोना मौतों का आंकड़ा पैदल-मजदूरों के आंकड़ों से बहुत अधिक नहीं बचा है, बस यही है कि सूनी रेल पटरियों पर चलते हुए मजदूर के मरकर गिर जाने की खबर, बड़े अस्पतालों में कोरोना-मौतों के मुकाबले बहुत देर से आती है। लेकिन इस देश को समझना चाहिए कि मुसीबत के इस दौर को लेकर लोगों की जो इंसानियत सामने आ रही है, और जो हैवानियत सामने आ रही है, वह अच्छी तरह दर्ज हो रही है। इस दौर में सच और झूठ के बीच की लड़ाई भी इतिहास में दर्ज हो रही है। सच को पूरी ईमानदारी के साथ सच पर टिके रहना चाहिए, क्योंकि झूठ के तो बहुत से यार होते हैं, सच तकऱीबन अकेला होता है। फिर यह भी है कि सच की इज्जत का जनाजा निकालने के लिए बहुत सी ताकतें लगी ही रहती हैं।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 2 अपै्रल 2020)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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