आपका ध्यान क्यों हटाया जाना चाहिए..

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1000 किलोमीटर की यात्रा, अक्सर पैदल, (सरकारी) असफलता पर प्रकाश डालता है..

-संजय कुमार सिंह।।

30 मार्च की रात दिन भर की खबरों के बाद मुझे लगा कि लॉकडाउन के बाद मजदूरों के पलायन की खबरें अब मीडिया में नहीं आने वाली। मुख्य रूप से इसका कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई बदनामी को कना ही हो सकता है पर मुझे ऐसा आभास होने का कारण यह था कि इसके लिए एक-दूसरे को दोषी ठहराया गया। मानवीय आधार पर पलायन को जरूरी माना गया और लोगों के घर पहुंचने में सहायता की जरूरत समझी गई। पर केंद्र सरकार का आदेश आया कि नहीं, जो जहां है वहीं रहे, उसे वहीं सहायता मुहैया कराई जाए। यह केंद्र सरकार की लाइन थी। इसका पालन होना था। और मेरा मानना है कि केंद्र सरकार अखबारों में ज्यादा जमीन पर कम काम करती है।

इसलिए मैंने भविष्यवाणी कर दी कि अब पलायन की खबरें नहीं छपेंगी। और वही हुआ अगले ही दिन पलायन अखबारों और टीवी चैनलों से गायब हो गया। 31 मार्च के अखबारों पर मेरी टिप्पणी का सार यही था। और उसके बाद के दो दिन भी पलायन से संबंधित कोई खबर प्रमुखता से नहीं दिखी।
कायदे से जो पैदल चले वो कहां हैं, घर पहुंचे कि नहीं, किस हाल में हैं, उन्हें कहां कैसे ठहराया गया है, खाना मिल रहा है कि नहीं, कैसा और कितना, कौन खिला रहा है – ये सब खबर हैं और हम जैसे लोग जानने के इच्छुक भी। पर अखबार यही बताने में लगे हैं कि निजामुद्दीन में क्या हुआ।

हालांकि खबर वह भी है लेकिन उसकी प्रस्तुति जान बूझकर ऐसे की जाती है कि आप उसी में फंस कर रह जाएं। यह जाना-माना तरीका है। द टेलीग्राफ की आज की पहली खबर यही है। जो दूसरे अखबारों (खासकर हिन्दी) में नहीं मिलनी। इस खबर में हफ्ते भर की यात्रा कर बिहार पहुंचे दो प्रवासी मजदूरों से बात की गई है। इसमें दिल्ली क्यों छोड़े से लेकर वहां क्या करते थे, क्या सीख मिलती है और यात्रा कैसे पूरी की, क्या खाया सब शामिल है। वैसे तो यह कहना और मानना ही गलत है कि घर में रहिए का मतलब यह होगा कि जो जहां है वहीं रहे। और चार घंटे में हर कोई घर नहीं पहुंच सकता। जहां हैं, वहीं रहिए – यह बात बाद में कही गई। और इसके साथ जो आश्वासन होना चाहिए वह भी नहीं था। अब जो आश्वासन दिया गया है उस संबंध में दावा ही है, अखबार सच नहीं बता रहे हैं।


टेलीग्राफ की खबर के एक हिस्सा हिन्दी में इस तरह है, “वीरेन्द्र उसके रूम मेट (जी हां ये घर वाले नहीं हैं) – प्रवीण, संदीप कुमार, विनोद कुमार और संजय कुमार ने गांव लौटने का फैसला किया और स्टेशन के लिए निकल पड़े। इनलोगों ने सड़कों पर बिहार के हजारों मजदूरों को पैदल चलते देखा और उनसे पता चला कि ट्रेन नहीं है और वे बसों के इंतजार में हैं।

वीरेन्द्र और उसके चार साथी पैदल आईएसबीटी पहुंचे। कोई बस नहीं थी। हर ओर भीड़ भाड़ थी, लोग एक दूसरे से पूछ रहे थे पर कोई बताने वाला नहीं था ना ही कोई सांत्वना देने वाला था। ऐसा लगा कि कोई दैत्य पीछा कर रहा है और सब भाग रहे हैं। कई लोग, खासकर महिलाएं और बच्चे रो रहे थे। हम भी डर गए और भीड़ के साथ उत्तर प्रदेश सीमा की ओर बढ़ गए।“ इनमें से एक ने बताया कि रास्ते में खाने के लिए कुछ नहीं मिला। उनके पास सत्तू, चावल था। जब सत्तू खत्म हो गया। तो उन्होंने चावल को पानी में भिगो कर कच्चे ही खाने की कोशिश की। पर बात नहीं बनी। तब जाकर गांव की किसी दुकान से चावल के बदले कुछ भुजा, नमक और हरी मिर्च ली। बहुत मुश्किल है इसे अनुवाद करना .…

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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