पीएम-केयर्स फंड को होना होगा पारदर्शी..

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देश में पहले से ‘प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष’ के रहते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक नया राहत कोष या ट्रस्ट ‘पीएम-केयर्स फंड’ (प्राईम मिनिस्टर्स सिटिजंस असिस्टेंस एंड रिलीफ इन इमर्जेंसी सिचुएशंस फंड) बनाकर एक नये विवाद को जन्म दे दिया है। उनके इस कदम को जहां एक ओर संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है वहीं सरकार का कहना है कि नये कोष के माध्यम से पूरे विश्व के साथ देश भर में चल रहे कोरोना संक्रमण से लड़ने के लिये आवश्यक धन संग्रहण में मदद मिलेगी। सरकार ने नये राहत कोष की आवश्यकता का स्पष्टीकरण देते हुए बताया है कि पहले से मौजूद पीएम राहत फंड कोरोना जैसी महामारियों से लड़ने के लिये पर्याप्त नहीं है। फिर भी, इस जवाब से न तो लोग संतुष्ट हैं और न ही यह फंड पारदर्शिता का तकाजा कैसे पूरा करता है, यह साफ है। 

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जनवरी, 1948 में इस कोष की स्थापना देश के विभाजन की त्रासदी झेल रहे लोगों की तत्काल आवश्यकता के लिये की थी। इसका ज्यादातर इस्तेमाल बाढ़, चक्रवाती तूफान व भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं में मारे गये लोगों के परिजनों या प्रभावितों को मदद देने के लिये किया जाता है। इसका थोड़ा हिस्सा दिल के ऑपरेशन, किडनी प्रत्यारोपण अथवा कैंसर के महंगे इलाज के लिये भी होता है। इसका गठन तो संसद द्वारा नहीं किया गया था एवं इसके लिये राशि का आबंटन प्रधानमंत्री की मंजूरी से ही होता है, फिर भी संसद से इसके खर्चों की मंजूरी ली जाती है।

इसमें दी जाने वाली राशि पर आयकर विभाग दानदाता को 80 (जी) के तहत 100 फीसदी छूट देता है तथा इसका ऑडिट बाहरी व स्वतंत्र एजेंसी करती है। पिछले 10 वर्षों के दौरान देखें तो कोष ने 2009-10 में 1652 करोड़ संकटग्रस्त लोगों को दिये थे। उसके बाद के प्रति वर्ष में क्रमश: 1700, 1727, 2011, 2610, 2637, 2923, 3229 और 2018-19 में 3800 रुपये खर्च किये गये। इन आंकड़ों को पेश करने का आशय यह बतलाना है कि इस कोष की स्थापना जिस उद्देश्य को लेकर की गयी थी, वह पूरा किया जाता रहा है। बल्कि कहा तो यह भी जाता है कि अब भी इस कोष में करीब 3800 करोड़ रुपये की राशि बिना इस्तेमाल की रखी हुई है।

ऐसे में अपने चिर-परिचित अंदाज में अचानक से मोदीजी ने कोरोना से लड़ने के लिये  पीएम-केयर्स फंड के नाम से नये ट्रस्ट की स्थापना की और लोगों से इसमें मुक्त हस्त दान की अपील की। उनकी अपील का असर भी हुआ है। बड़ी संख्या में लोग फंड में योगदान दे रहे हैं। इनमें औद्योगिक व व्यवसायिक घराने हैं तो कलाकार और प्रसिद्ध सेलेब्रिटीज़ भी। लेकिन कांग्रेस नेता शशि थिरूर ने अपने ट्विट के जरिये जो सवाल खड़ा किया है वह भी वाजिब है। इसमें उन्होंने पूछा है कि क्यों नहीं पुराने फंड का ही नाम बदलकर उसी से काम चला लिया जाता। थरूर के ट्विट में तंज था। उनका इशारा इस सरकार की संस्थाओं के नाम बदलने की प्रवृत्ति की ओर तो था ही, उन्होंने पारदर्शिता की भी अपेक्षा की है।

उधर सरकार की तरफ से जो स्पष्टीकरण आया है उसमें बताया गया है कि वर्तमान राहत कोष केवल प्राकृतिक आपदाओं तथा कुछ तयशुदा गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों को मदद देने के लिए ही बना है जबकि पीएम-केयर्स कोरोना जैसी  महामारियों से जूझने के लिये बनाया गया है। चूंकि सरकार का उद्देश्य कोविड-19 जैसी महामारी से निपटने के लिये आवश्यक वित्तीय संसाधन जुटाना है, इसलिये नये राहत कोष की जरूरत महसूस की गयी है। यह भी कहा गया है कि वर्तमान राहत कोष में न्यूनतम योगदान 100 रुपये है जबकि पीएम-केयर्स में कोई चाहे तो 10 रुपये भी दान कर सकता है।

सरकार का यह स्पष्टीकरण इसलिए संतोषजनक नहीं है क्योंकि प्रधानमंत्री राहत कोष पूर्णत: पीएम के निर्देशों पर चलने वाली संस्था है, चाहे उसके खर्चों के लिये संसद की मंजूरी लेनी होती है। आंशिक संशोधनों के साथ इस फंड को इच्छित उद्देश्यों के योग्य बनाया जा सकता था। उधर चेरिटेबल ट्रस्ट के अंतर्गत इसके पंजीकरण से संबंधित भी कुछ आपत्तियां व संशय सामने आए थे, लेकिन कानून विशेषज्ञों की राय है कि जिस संस्था के अध्यक्ष स्वयं प्रधानमंत्री हों और वित्त मंत्री, गृह मंत्री व रक्षा मंत्री सदस्य हों वहां ऐसी बातें कोई अवरोध नहीं बन सकतीं। 

लोगों के संदेह का एक बड़ा कारण यह है कि प्रधानमंत्री का ट्रैक रिकार्ड वित्त के मामले में बेहद खराब है। वे अक्सर जवाब देने से बचते हैं और अपने कामों का स्पष्टीकरण देने में उनका भरोसा नहीं है। नोटबंदी से लेकर जीएसटी और विकास दर से लेकर बेरोजगारी के आंकड़ों तक के जो भी मामले हों, वे न तो पिछला हिसाब देते हैं और न ही इसके बारे में जनता को बतलाते हैं कि कोई भी नया काम वे क्यों करना चाहते हैं। यही कारण है कि जब पीएम-केयर्स के नाम से ऐसे कोष की स्थापना की गयी जिसमें उन्होंने लोगों से उदार ह्रदय से कोविड-19 के नाम से भी कहलाये जाने वाली इस बीमारी से लड़ने के लिये राशि मांगी, तो कुछ सवाल खड़े हुए जो लाजिमी हैं। लोगों को शक है कि यह संस्था पर्याप्त पारदर्शी नहीं रहेगी।

वैसे प्रधानमंत्री को चाहिये कि वे इन बिंदुओं पर अपना स्पष्टीकरण देकर जनता को आश्वस्त करे कि नये ट्रस्ट में आने वाली राशि का दुरुपयोग नहीं होगा।  अब जब यह नया कोष बन ही गया है, तो देखना होगा कि वह कितना पारदर्शी व उपयोगी रहेगा तथा उन उद्देश्यों को कितना प्राप्त कर सकेगा जिसके लिये उसका गठन किया गया है। यह जरूर है कि ऐसी संस्थाओं को पारदर्शिता का तकाजा तो पूरा करना ही होगा।

(देशबन्धु)

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