मजहब के नाम पर देश पर थोप डाला सबसे बड़ा खतरा!

Desk

-सुनील कुमार।।
दिल्ली की बहुत घनी बस्ती निजामुद्दीन में मुस्लिमों की एक ऐसी बड़ी धार्मिक बैठक कोरोना के खतरे के बीच हुई कि जो मामूली समझबूझ के भी खिलाफ जाती है। इसमें करीब दो हजार लोग जुटे, और इसी भीड़ के बीच देश में लॉकडाउन हुआ। बाद में यहां से निकलकर लोग देश भर में पहुंचे, इनमें से सात की तेलंगाना में और एक की कश्मीर में मौत की खबर है। इस धार्मिक कार्यक्रम से लौटे लोगों में से दर्जनों के कोरोना-पॉजिटिव होने की रिपोर्ट भी आ गई है। दिल्ली में सरकार इस धार्मिक संस्थान से लोगों को निकालकर क्वारंटाइन सेंटर में भर्ती करा रही है, लेकिन यहां से निकलकर देशभर में लौटे लोगों में से 9 लोग तो अंडमान में ही कोरोना-पॉजिटिव निकल गए हैं। आगे जाने क्या होगा।

बात महज दिल्ली की नहीं है, जिस किसी धर्म में ऐसी कट्टरता हो कि जिंदगी और मौत को अनदेखा करके अपने धर्म को मानने से पूरी दुनिया पर खतरा खड़ा कर दिया जाए, तो फिर ऐसे धर्म के खिलाफ कानून का कड़ा इस्तेमाल करना चाहिए। आज जब हज यात्रा रद्द होने की खबरें हैं, तो दिल्ली में खतरा उठाकर, खतरा खड़ा करके, हजारों का धार्मिक जमावड़ा सरकार को पहले ही खत्म कर देना था। ऐसा तो है नहीं कि देश की राजधानी में मुस्लिमों की इतनी बड़ी भीड़ सरकार की खुफिया नजरों से बचकर हो गई हो, इसे पहले ही खत्म करवाना था। अभी यह खबरें भी आ रही हैं कि बिहार और झारखण्ड की कुछ मस्जिदों में विदेशों से आए हुए धर्मप्रचारक ठहरे हुए थे, बिना सरकार को खबर दिए। अगर ऐसा है, तो यह भी सरकारों की नाकामी है, और यह पूरे देश को भारी पड़ेगी।

लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में मुस्लिमों के बीच यह अफवाह फैलाई गई थी कि पोलियो ड्रॉप्स में ऐसी दवा अमरीका से मिलाकर भेजी जा रही है जिसके पिलाने से मुस्लिमों की नस्ल बढऩा ही रुक जायेगा। हिंदुस्तान में तो किसी तरह इस अफवाह पर काबू पाया गया, लेकिन कट्टरपंथी धर्मान्धता में डूबे पाकिस्तान में ऐसा नहीं हो पाया। वहां अभी कुछ महीनों पहले तक पोलियो ड्रॉप्स पिलाने वाले सरकारी कर्मचारियों को मजहबी आतंकियों ने गोली मारकर मार डाला। नतीजा यह है कि आज पाकिस्तान दुनिया की उन गिनी-चुनी जगहों में से है जहां पोलियो जिंदा है, और बाकी दुनिया के लिए खतरा भी है।

लेकिन मुस्लिमों के बीच अशिक्षा के चलते, गरीबी की नासमझी के चलते, मदरसों की अवैज्ञानिक पढाई के चलते, मुस्लिमों को यह समझाना आसान हो गया है कि जब तक अल्लाह नहीं चाहेगा उन्हें कोई नहीं मार सकता। जिस धर्म में शिक्षा जितनी कम है, कट्टरता जितनी अधिक है, उस धर्म में धर्मगुरु, लोगों को उतनी ही आसानी से बेवकूफ बनाकर अपनी दूकान चलाते हैं। अल्लाह भी उन्हीं को बचाना चाहेगा जो खुद को बचाना चाहेंगे, न कि ऐसे लोगों को जो कि दूसरे बेकसूर लोगों की जिंदगी पर खतरा खड़ा करें। इतिहासकार इरफान हबीब ने इसे बेवकूफी और जुर्म लिखा है कि ऐसे वक्त यह धार्मिक कार्यक्रम किया गया। उन्होंने लिखा-हैरानी की बात है कि यह जमाती खबर नहीं पा सके थे, या दुनिया भर पर मंडराते खतरे को उन्होंने जान-बूझकर अनदेखा किया ?

अभी तक हिंदुस्तानी टीवी चैनल फिदा होकर कुछ मुस्लिम मुल्लाओं के वीडियो दिखाने में लगे हैं जिनमें नमाज के लिए मस्जिद जाने वालों को अल्लाह की मेहरबानी से हिफाज़त मिली होने के दावे किये जा रहे हैं। ऐसे लोग अपने ही मजहब के लोगों को मिटा देने पर आमादा है। जिनके ऐसे-ऐसे यार, उनको दुश्मन की क्या दरकार?

यह वक्त और दुनिया पर मंडराता खतरा बताता है कि अब किसी धर्म को दुनिया पर खतरा नहीं बनने दिया जा सकता। अब इंतजाम सरकारों की ताकत से परे के हो गए हैं, खतरे विज्ञान की ताकत से परे के हो गए हैं। ऐसे में किसी को बेवकूफ होने की छूट नहीं दी जा सकती और ना ही धर्मांध होने की। कोई धर्म अल्पसंख्यक है, इस नाते उसे बाकी देश को खत्म करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। इस जमावड़े पर सख्त कानूनी करवाई करनी चाहिए ताकि बाकी धर्मों के धर्मांधों के लिए भी यह एक सबक रहे। आज दिल्ली के इस धर्मांध जमावड़े ने पूरे देश का सबसे बड़ा अकेला खतरा खड़ा कर दिया है, इतना बड़ा कि उसे सा रे ईश्वर मिलकर भी नहीं सुधार सकते। यह अलग बात है कि लोगों को यहाँ जुटाने वाले मुल्ला उन्हें हूरों का सपना दिखा रहे होंगे!

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 31 मार्च)

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