क्या मीडिया में लॉकडाउन की परेशानी का शोर अब थम जाएगा..

Sanjaya Kumar Singh
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-संजय कुमार सिंह।।


मेरा मानना है कि कोरोना पर मीडिया में शोर अब थम जाएगा। जो दिखाना था दिखा लिया गया। अब मजदूरों के पलायन की चर्चा रुक जाएगी। राहत सामग्री बंटने की खबरें दिखेंगी और अब सब ठीक बताया जाएगा। इसका कारण यह है कि सरकार ऐसे ही काम करती है। जमीन पर काम करने से ज्यादा अखबारों में और अखबार वाले खुशी-खुशी सेवा करते हैं। निश्चित रूप से खबरों का चयन संपादकीय विवेक और प्राथमिकता का मामला है और पहले पन्ने पर खबर नहीं होने का मतलब नहीं है कि खबर अखबार में ही नहीं है और पाठक को जानकारी ही नहीं है। फिर भी संपादक अपने अखबार में किस और कैसी खबर को प्राथमिकता देगा यह पहले से तय हो और उसकी भविष्यवाणी की जा सके तो अखबार की खबरों का क्या भरोसा?
आइए आपको बताऊं कि आज अखबारों में क्या है। सबसे पहले द टेलीग्राफ का पहला पन्ना देखिए। पहली फोटो एक व्यक्ति के जख्मी पैरों की है। कैप्शन में बताया गया है यह इलाहाबाद की सीमा पर आराम कर रहे एक दिहाड़ी मजदूर के पैर हैं जो जाहिर है, लॉक डाउन के बाद पैदल चलने से जख्मी हो गए हैं। अखबार में एक और फोटो बरेली में पैदल जा रहे लोगों पर कीटनाशकों का छिड़काव किए जाने की खबर के साथ है। मुझे लगता है कि आज के लिए ये दोनों खबरें सबसे महत्वपूर्ण हैं। पर मीडिया क्या बता रहा है? पैदल निकले प्रवासी मजदूरों को रास्ते में मना लिया गया है। वे सरकारी व्यवस्था में हैं। उन्हें ठीक से खाना मिल रहा है और रास्ते पर कोई नहीं है। सरकार यही बताना चाहेगी और अखबार यही बता रहे हैं। या चुप हैं। वरना ये दो खबरें सभी अखबारों में पहले पन्ने पर होनी चाहिए थी। पैदल चलने वाले मजदूर के जख्मी पैर की फोटो हिन्दी के जो अखबार मैं देखता हूं उनमें किसी में नहीं है।
पैदल जा रहे मजदूरों पर कीटनाशक छिड़कने की खबर (फोटो के साथ, पहले पन्ने पर) अमर उजाला और राजस्थान पत्रिका में है। अमर उजाला की पूरी खबर कोरोना से संबंधित है और प्रवासी मजदूर सड़क पर हैं, उनके साथ अमानवीय व्यवहार हुआ इससे ज्यादा प्रमुखता मरीजों और मरने वालों की संख्या को दी गई है। प्रवासियों की स्थिति बताना सरकारी व्यवस्था की पोल खोलना है पर जो मौतें हो रही हैं वह सरकारी इंतजामों के बावजूद हो रही है – इसका अंतर आप समझ सकते हैं। यही नहीं, कोरोना से संबंधित कोई भी खबर छापना मना है। पर दैनिक जागरण में खबर है, 23 डिग्री सेल्सियस पर मरे आधे कोरोना वायरस। वाराणसी डेटलाइन से हिमांशु अस्थाना की बाईलाइन वाली खबर में यही बताने की कोशिश की गई है कि कोरोना तो बस गया समझो। गर्मी आई नहीं कि वायरस मरने लगे। अगर यह खबर वाकई गंभीर है तो सभी अखबारों में पहले पन्ने पर प्रमुखता से क्यों नहीं होनी चाहिए। और सरकार को ही क्यों नहीं जारी करना चाहिए।
ऐसा नहीं है कि खबर बिल्कुल हवा हवाई है। बीएचयू के जीन वैज्ञानिक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे और दिल्ली स्थित आईसीएमआर (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) के डॉ. प्रमोद कुमार ने अपने लैब में शोध से यह निष्कर्ष निकाला है। दैनिक भास्कर (पटना) में भी यह खबर पहले पन्ने पर है। अब आप इसका जो मतलब लगाना चाहें लगाइए। मैं इसे माहौल बनाना कहता हूं। वह इसलिए भी कि एक तरफ अगर जरूरी खबरें पहले पन्ने पर नहीं हैं तो दूसरी तरफ लॉक डाउन नहीं बढ़ेगा को पूरी प्राथमिकता दी गई है। दैनिक जागरण में यह सेकेंड लीड है जबकि तब्लीगी मरकज में शामिल छह लोगों की तेलंगाना में मौत लीड है। इसका उपशीर्षक है, लॉक डाउन के दौरान निजामुद्दीन में आयोजन में शामिल हुए थे। अमर उजाला ने इसे सात कॉलम में दो लाइन के शीर्षक के साथ छापा है। और इसके साथ ऐसी तस्वीर है कि आप कपड़े देखकर इनका धर्म जान लेंगे। लगभग ऐसा ही नवोदय टाइम्स और नवभारत टाइम्स में भी है।
हिन्दुस्तान में इसे लीड के साथ छापा गया है और लीड है, लॉकडाउन बढ़ाने का इरादा नहीं। यहां समझने वाली बात यह है कि जब लॉकडाउन बगैर किसी पूर्व सूचना या योजना के लगाया गया तो दोबारा पूर्व सूचना दी जाएगी यह कहां जरूरी है. जब लगाने की जरूरत पहले तय नहीं हो पाई तो बढ़ाने की जरूरत पहले कैसे तय हो सकती है। वैसे भी लाकडाउन की घोषणा किसी ने की और कोई दूसरा कह रहा है कि इसे बढ़ाया नहीं जाएगा। ऐसे में इसे कितना महत्व देना है यह समझना मुश्किल नहीं है। इसके बावजूद यह राजस्थान पत्रिका में भी लीड है। ऐसा नहीं है कि खबरों का जो महत्व मैं बता रहा हूं वह कोई बहुत महान और गंभीर पत्रकारों को ही समझ में आएगा। इसके बावजूद अलग तरह की खबरों को महत्व देना और असली खबरों को महत्व नहीं देना कुछ संकेत तो देता ही है।
हो सकता है मैं गलत होऊं पर पत्रकारिता चल ऐसे ही रही है। राजस्थान पत्रिका में आज पहले पन्ने पर एक खबर है, पैदल घर लौटने की कवायद में 29 कामगार सड़कों पर जान गंवा चुके हैं। क्या यह सामान्य है? या यह सूचना नजरअंदाज करने लायक है पर किसी अखबार में टॉप पर नहीं है। राजस्थान पत्रिका में भी नहीं। इसके साथ यह भी उल्लेखनीय है कि दैनिक हिन्दुस्तान ने पहले पन्ने पर लगभग आधे पेज के साथ सिर्फ एक फोटो छापी है। इसका कैप्शन है, नई दिल्ली के आनंद विहार में बस अड्डे पर सोमवार को लॉकडाउन का पालन कराने के लिए तैनात बीएसएफकर्मी। इससे आपको यह भरोसा होगा कि दिल्ली में अब सब ठीक है और दिल्ली छोड़कर जाना चाहने वाले अब सब संतुष्ट हैं। इसमें यह नहीं पूछेंगे कि केजरीवाल ने इनके घरों की बिजली और पानी के कनेक्शन कटवाए थे उसका क्या हुआ? जुड़ गए या कटे ही नहीं थे?
सड़क पर पैदल चलते प्रवासियों के साथ बस पकड़ने आनंद विहार पर जुटी भीड़ को देखकर दुनिया भर में लॉक डाउन नाकाम होने की चर्चा उड़ी तो उसे राजनीतिक रंग दे दिया गया। भाजपा ने आम आदमी पार्टी पर आरोप लगाए और आम आदमी पार्टी ने अपना भरपूर बचाव किया। कल द टेलीग्राफ में इस आशय की एक खबर भी थी। हिन्दी के पाठकों के लिए मैंने उसका अनुवाद कर फेसबुक पर पोस्ट कर दिया। इसके बावजूद, बिहार के जल संसाधन मंत्री संजय कुमार झा ने आरोप लगाया है कि अरविन्द केजरीवाल की सरकार ने सुनियोजित तरीकों से बसों में ढूंसकर 50 हजार से अधिक बिहारियों को एक साथ दिल्ली से निकला। दैनिक भास्कर ने पटना संस्करण में इस आरोप को पहले पन्ने पर छापा है लेकिन इस खबर में यह नहीं बताया गया कि वे बिहार पहुंचे कि नहीं और पहुंचे तो सब अपने घर गए या उन्हें एक जगह रखा गया है या रास्ते में कहीं रोक लिया गया।
सरकारी प्रचार जैसी एक और खबर आज के दैनिक जागरण में है। इसका शीर्षक है, लॉकडाउन का असर: अब तक थमा है कोरोना वायरस का प्रसार। अमर उजाला में खबर है, एक दिन में 227 और मरीज, सात की मौत। इसका फ्लैग शीर्षक है, 1200 पार हुआ मरीजों का आंकड़ा … देश भर में अब तक 32 की मौत, दिल्ली में 25 और मिले। जबकि दैनिक जागरण की खबर है, स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल के अनुसार, भारत में कोरोना के मरीजों की संख्या 100 से 1000 पहुंचने में 12 दिन लगे हैं। इसकी तुलना दुनिया के दूसरे विकसित देशों से करें, तो वहां 12 दिनों में संख्या 100 से बढ़कर आठ हजार तक पहुंच गई थी। उन्होंने कहा, इसे आगे बनाए रखने को सौ फीसद अलर्ट रहने व सरकार के निर्देशों का कड़ाई से पालन करने की जरूरत है। लव अग्रवाल ने कोरोना के प्रसार की गति कम होने का श्रेय लॉकडाउन और दूसरे एहतियाती उपायों को देते हुए कहा कि जिन देशों ने समय पर एहतियाती कदम नहीं उठाए, उन देशों में यह बेकाबू होता गया। कहने की जरूरत नहीं है कि दोनों कबरें सही हैं। खेल प्रस्तुति का है।

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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