यह शर्मनाक दृश्य है..

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यह महान दृश्य है, चल रहा मनुष्य है, अश्रु स्वेद रक्त से, 
लथपथ लथपथ लथपथ, अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ। 

बच्चनजी ने इंसान की जिजीविषा, कर्मठता और दृढ़इच्छाशक्ति का वर्णन करते हुए यह पंक्तियां लिखी थीं, लेकिन अगर आज के संदर्भ में वे लिखते तो, महान दृश्य की जगह शर्मनाक दृश्य लिखते। आंसू, पसीने और खून से लथपथ इंसान आज जिस अग्निपथ पर चल रहे हैं, वह सरकार की नाकामी, गैरजिम्मेदारी से तैयार हुआ है। इस पर सरकार को शर्म आनी चाहिए, लेकिन अभी वह अपने करतूतों की लीपापोती में जुटी है।

जनता को नसीहत दी जा रही है कि सड़क पर न निकले। लेकिन बिना निकले जीवन कैसे चल सकता है, इसकी तैयारी उसने नहीं की। नतीजा ये है कि देश भर में लाखों लोग इस वक्त सड़कों पर चल रहे हैं, ताकि किसी भी तरह अपने घर पहुंच सकें। जंगलों को काटकर, तालाबों को पाटकर, नदियों पर बांध बनाकर, जो लंबे-चौड़े राष्ट्रीय राजमार्ग गाड़ियों को रफ्तार देने के लिए बनाए गए, वे आज पैदल चलने वालों के जख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं।

विकास के नाम पर कांक्रीट के जंगल नहीं बनते, तो आज राहगीरों को थोड़ी देर सुस्ताने के लिए पेड़ों की छांव मिल जाती, मिट्टी से भरी पगडंडियां पैरों की थकान थोड़ी कम कर देतीं। लेकिन विनाश और विकास दोनों ही सूरतों में गरीब की जान ही फंसती है। उस पर प्रशासन की संवेदनहीनता उनकी परेशानियां और बढ़ा देती हैं। आज तो सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया कि दहशत के कारण मजदूरों का पलायन कोरोनावायरस की तुलना में एक बड़ी समस्या है। दरअसल लॉक डाउन की वजह से जिस तरह हजारों मजदूर अपने घरों को लौटने पर मजबूर हुए हैं, उस पर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। केंद्र सरकार से मंगलवार तक स्टेट्स रिपोर्ट अदालत ने तलब की है। इस बीच केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारें मजदूरों की सुध लेने में जुट गई हैं। लेकिन अब तक आवाजाही का सिलसिला थमा नहीं है। बड़ी संख्या में लोग अपने गांव-घर पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं, और इसमें उन्हें कहीं-कहीं पुलिस-प्रशासन की अमानवीयता का सामना करना पड़ रहा है।

मध्यप्रदेश में एक सब-इंस्पेक्टर ने एक महिला मजदूर के माथे पर लिख दिया कि ‘मैंने लॉकडाउन का उल्लंघन किया है, मुझसे दूर रहो’। ऐसा लगा कि दीवार फिल्म का दृश्य दोहराया जा रहा है,  जिसमें नायक के हाथ पर लिख दिया जाता है- मेरा बाप चोर है। महामारी से बचाने के लिए लोगों को जागरूक और सावधान करने का यह क्रूर तरीका भी किसी महामारी से कम नहीं है। कोरोना का इलाज तो देरसबेर निकल ही आएगा। लेकिन गरीबों को किसी न किसी बहाने प्रताड़ित करने की यह बीमार मानसिकता शायद लाइलाज ही रह जाएगी। 

मप्र की इस घटना के बाद अब उत्तरप्रदेश से एक तस्वीर सामने आई है। बरेली जिले में दिल्ली, हरियाणा, नोएडा से आए सैकड़ों मजदूरों, महिलाओं और छोटे बच्चों को जमीन पर बैठाकर उनके ऊपर डिसइंफेक्ट दवाई का छिड़काव किया गया। जिसके बाद बहुत सारे बच्चों ने अपनी आंखों में जलन की शिकायत की। इस के बावजूद किसी को अस्पताल में भर्ती नहीं किया गया, बल्कि सबको घर भेज दिया गया। क्या दवा छिड़कने वाले कर्मचारियों को लोहे, कांच, प्लास्टिक के सामान और हाड़-मांस के इंसानों में कोई फर्क नजर नहीं आया। अधिकारसंपन्न ऐसे लोग आखिर खुद किस मिट्टी के बने हैं? बहरहाल यह देखकर थोड़ी राहत मिल रही है कि इस बेहद कठिन समय में भी समाज के बहुत से सामान्य लोग अपनी क्षमता का अधिकतम उपयोग करते हुए गरीबों की मदद कर रहे हैं। उन्हें जिस तरह भी हो, राहत पहुंचा रहे हैं और बदले में न कोई लाभ चाह रहे हैं, न प्रचार।

ऐसे लोगों से ही देश बनता है और बचता भी है। क्योंकि जिस देश में शासक गैरजिम्मेदार हो, वहां जनता पर जिम्मेदारी अपने आप बढ़ जाती है।

(देशबन्धु)

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