आत्मचिंतन का मौका..

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पूरा देश इस वक्त गंभीर हालात से जूझ रहा है औऱ ऐसे में भी मोदीजी ने मन की बात कर ही ली। आज उन्होंने संपूर्णबंदी के चलते हो रही तकलीफों के लिए माफी मांगी। लेकिन इसे जरूरी बताया। जब नोटबंदी का फैसला उन्होंने अचानक लिया था, तब भी कहा था कि यह जरूरी है और अगर सब कुछ ठीक नहीं हुआ तो जिस चौराहे पर चाहेंगे, देशवासी उन्हें सजा दे दें। देश तब भी उस तकलीफ को लाइनों में खड़े होकर झेल गया और अब भी घरों में बंद होकर थोड़ी-बहुत दिक्कतें झेल ही रहा है। इस बार तो वजह जायज भी है क्योंकि सवाल जिदंगी का है। अगर मोदीजी को माफी मांगनी ही थी तो उस गरीब तबके से मांगते, जो उनकी गैरजिम्मेदारी के कारण शहर और गांव के बीच में फंस कर रह गया है। पैदल ही अपने घरों की ओर निकल पड़ा है।

सोशल डिस्टेंसिंग के कायदे के बावजूद बस अड्डों में भीड़ का हिस्सा बन रहा है। उसे डर है कि कोरोना से पहले वो भूख से न मर जाए। मोदीजी चाहते तो इस डर को पनपने ही नहीं देते, लेकिन वे ऐसा करने से चूक गए और अब माफी मांग रहे हैं। वे माफी ही मांगना चाहते हैं तो इस बात की मांगें कि उन्होंने कोरोना की गंभीरता को समझने में देर की। जब जनवरी-फरवरी में इक्के-दुक्के मामले आए थे, तभी एयरपोर्ट पर जांच में कड़ाई बरती जाती, संदिग्धों को अलग रखा जाता, तो कुछ हजार लोगों को तकलीफ होती, लेकिन उससे करोड़ों लोगों की जान पर नहीं बन आती। न इस तरह बंदी की नौबत आती, न अर्थव्यवस्था को झटका लगता। मगर तब मोदीजी डोनाल्ड ट्रंप की मेहमाननवाजी, फिर सीएए विरोधियों पर सख्ती दिखाने और कांग्रेस की सरकार गिरवाने में लगे हुए थे। उन्हें कायदे से देशवासियों से इन सब गलतियों की माफी मांगनी चाहिए। लेकिन वे अब भी प्रवचन देने में लगे हैं। 

मोदीजी ने संस्कृत के श्लोक  ‘एवं एवं विकार : अपी तरुन्हा साध्यते सुखं’ का जिक्र किया। जिसका मतलब है कि बीमारी और उसके प्रकोप से शुरुआत में ही निपटना चाहिए। बाद में रोग असाध्य हो जाते हैं तब इलाज भी मुश्किल हो जाता है। पर उन्हें पता होना चाहिए कि बीमारी से निपटने में देरी सरकार की ओर से हुई और अब पूरा देश इसे भुगत रहा है। भविष्य के डर से वर्तमान कैद हो चुका है और अतीत की गलतियों से सबक लेने हम अब भी तैयार नहीं हैं। जानकार हमेशा इस बात पर जोर देते रहे कि देश में स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधाएं विश्वस्तरीय होनी चाहिए और जन-जन तक इसकी पहुंच हो, यह जिम्मेदारी सरकार को उठानी चाहिए।  लेकिन सरकार इन कर्तव्यों से मुंह मोड़ती रही, ताकि निजी क्षेत्रों को इसका लाभ मिले। निजी बीमा कंपनियों ने सरकार की इस सायास अनदेखी का खूब लाभ उठाया। जिनकी जेब में लाखों का प्रीमियम भरने की क्षमता है, वे सपरिवार बीमा करवाते रहे और गरीब आदमी साधारण बुखार का इलाज करवाने के लिए भी तरसता गया।  

देश में सात सितारा भव्य हास्पिटल खड़े हो गए और सरकारी अस्पताल संसाधनों और अच्छे डाक्टरों की कमी से जूझते रहे। अब जबकि देश में लाखों लोगों के बीमार होने का खतरा मंडरा रहा है तो समझ आ रहा है कि हमारे पास न तो पर्याप्त बड़े अस्पताल हैं, न इलाज के लिए डाक्टरों की फौज है, और जो वाकई जान पर खेलकर दिन-रात इलाज और तीमारदारी में लगे हैं, उनके पास अपनी सुरक्षा के लिए पर्याप्त उपकरण नहीं हैं। नौबत ये आ गई है कि कहीं सरकारी शिक्षण संस्थानों को तो कहीं ट्रेन के डिब्बों को रोगियों को रखने के लिए तैयार किया जा रहा है। अगर इस वक्त भी केवल गरीबों की जान को खतरा होता तो शायद सरकार इतनी सक्रिय नहीं दिखती। गोरखपुर जैसे कई उदाहरण हमारे सामने हैं। अभी तो सबकी जान पर एक जैसा खतरा है, इसलिए सरकार का ध्यान स्वास्थ्य सुविधाओं पर जा रहा है।

वैसे गरीब की जान केवल भारत में ही नहीं हर जगह सस्ती ही मानी जाती है। इसलिए जी-7, जी-20 में शुमार यूरोप और अमेरिका के देश आज महामारी से बेतरह प्रभावित हैं। यहां भी निजी स्वास्थ्य सेवाओं और बीमा कंपनियों के मुनाफे ने आम आदमी की जान से सौदा किया है। कोरोना ने पूरी दुनिया को कष्ट में तो डाला है, लेकिन आत्मचिंतन और आत्मावलोकन का मौका भी दिया है कि हम अपनी गलतियों को सुधारें ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर दुनिया तैयार हो।

(देशबन्धु)

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