कहीं चिदम्बरम मामले में PM को “झटका” न दे दें राष्ट्रहित के प्रति जिद्दी और सजग प्रणब दा…?

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-शिवनाथ झा।। 

“देशेर डाक” (मातृभूमि की पुकार) या यूँ कहें कि राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर 2जी मामलों में प्रणब मुख़र्जी प्रधान मंत्री को भी नहीं छोड़ सकते हैं चाहे उन्हें कोलकाता ही जाना पड़े.

“जी” शब्द में बहुत दम है. जब तक “जी” कहते रहेंगे, आप किसी के भी आँखों का तारा रहेंगे, जैसे ही आपका जिह्वा इसे दुहराने में थोडा भी लड्खाराया और “जी ना” निकला, समझ लें, शामत आ गयी. वरिष्ट कांग्रेसी नेता, जिन्होंने इस पार्टी के आतंरिक और बाहरी कितने ‘उतार-चढाव’ देखे और हमेशा ‘चट्टान’ कि तरह अडिग रहे, आज “शायद” अपने ही लोगों में “अलग-थलग’ दिख रहे है.

“जी” हां, मैं वित्तमंत्री प्रणब मुख़र्जी की बात कर रहा हूँ. अगर पार्टी और सरकार में उनके सहकर्मियों (सहकर्मी बोलना ठीक नहीं है क्योकि उनसे लगभग सभी जूनियर हैं, फिर भी) के ‘बदलते तेवर’ को एक इशारा समझा जाये तो इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि “दादा” किसी “और ओर उन्मुख हों सकते हैं” और यह “कोलकाता” भी हों सकता है!.

भारत वर्ष के इतिहास पर अगर गौर फ़रमाया जाय, खासकर बंगाल को नजर में रखकर, तो एक बात पक्की है कि बंगाल ने इस देश को जो भी दिया, चाहे स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान आन्दोलनकारियों को फांसी पर लटकने कि बात हों, या विज्ञानं और साहित्य में योगदान कि, या फिर देश में राजनितिक दक्षता को मजबूत और स्थिरता प्रदान करने की, बंगाल किसी भी राज्य से अब्बल रहा है. एक बात और है, यहाँ के लोगों में एक बात और होती है और वह है ‘अपने कर्त्तव्य के प्रति निष्ठावान होना, मालिक के प्रति बहुत वफादार होना, साथ ही, अगर किसी “गलत विषय” पर मालिक के साथ “जी हुजूरी नहीं करना”.

दादा के साथ यह सभी बातें सही साबित होती है. अगर दादा तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी को भी “हाथे आड़े” ले सकते हैं तो अपने जीवन के 76 बसंत देखने वाला यह “इंसान” अपनी उम्र से तीन साल छोटे के साथ साथ कम अनुभव और राजनितिक ज्ञान रखने वाले प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को या फि

अपने से दस वर्ष छोटे और “राजनितिक चाटुकार” पी चंदाम्ब्रम, जो अपनी स्वार्थ सिद्धि के  लिए पहले कांग्रेस पार्टी को छोड़ चुके हैं, आज भले ही गृह मंत्रालय देखते हों और “10-जनपथ के बहुत करीबी हों”,  दादा कभी भी “किसी के निजी स्वार्थ सिद्धि में साथ नहीं दे सकते हैं, जहाँ संपूर्ण राष्ट्र-हित का सबाल हों”.

आज तडके प्रणब मुख़र्जी के बहुत करीबी और बंगाल की राजनीति पर पकड़ रखने वाले अपने एक “बुजुर्ग स्त्रोत” को जब “कुरेदने” कि कोशिश की तो “आने वाले समय को और भी अधिक भयावह दिखने का संकेत दिया. जिस तरह उन्हें वाशिंगटन जाकर प्रधान मंत्री डॉ मनमोहन सिंह को “अपनी सफाई देनी पड़ी” यह, संभवतः, प्रधान मंत्री के अकेले का निर्णय नहीं हों सकता है. सूत्रों का मानना है, “अभी तुरंत किसी भी निर्णय पर पहुंचना या उस ओर उन्मुख होना भी गलत होगा, लेकिन प्रणब दा को अच्छा नहीं लग रहा है जिस तरह से बातें चल रही है.”

तो क्या, “ऐसे अवसर पर दादा अपने आप को अकेला पा रहे है, उसी तरह, जिस तरह मुद्दत तक बामपंथी विचारधारा को बढ़ाने में अपना जीवन समर्पित कर देने वाले पूर्व लोक सभा अध्यक्ष, श्री सोमनाथ चटर्जी को बामपंथियों ने किया. अगर कोई साथ है तो वह न्यायपालिका है जिसमे उन्हें बहुत आस्था है. वैसे अभी किसी भी बात पर टिपण्णी नहीं करना चाहिए क्योकि इससे देश में राजनितिक अस्थिरता का वातावरण उत्पन्न होगा.”

 

बहरहाल, दादा के लिए भी यह “अपच” हों रहा है कि वह कौन सा कारण है जिसके कारण सभी पूर्व वित्त मंत्री श्री पी. चिदम्बरम को “गोद में बैठा रहे हैं”. वैसे न्यायपालिका सभी “सम्बंधित व्यक्तियों को निचोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी, चाहे प्रधान मंत्री स्वयं या उनका कार्यालय का २-जी घोटाले या इससे सम्बंधित अन्य भ्रस्टाचार के मामले उसका योगदान क्यों ना हों”, लेकिन एक बात तो तय है कि चिदम्बरम कही ना कही, किसी ना किसी तरह से इस पूरे मामले में लिप्त हैं. इसके लिए उन्हें “किस तरह से सम्मानित किया गया? कितने पैसे मिले या अन्य बाते, यह आगे होने वाली जाँच में मालूम होगा.

 

भारत सरकार के कानून मंत्रालय के एक अधिकारी का मानना है कि “सुब्रमनियम स्वामी द्वारा प्रस्तुत बित्त मंत्रालय द्वारा प्रधान मंत्री कार्यालय को लिखा गया पत्र वास्तव में एक “बाम्ब” के तरह है जो ना केवल तत्कालीन बित्त मंत्री श्री चिदम्बरम को संपूर्ण घेरे में दल दिया है, बल्कि प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को भी २-जी घोटाले मामले के चक्रव्यूह में खीच लिया है. कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच चल रहे “इस युद्ध” में पिछले दिनों वर्तमान वित्त मंत्री श्री प्रणब मुख़र्जी द्वारा लिखा गया एक पत्र कि “अगर उस समय बित्त मंत्रालय चाहती और चिदम्बरम चाहते तो २-जी स्पेक्ट्रम घोटाले को रोका जा सकता था.”

 

कानून मंत्रालय आज एक बरिष्ट अधिवक्ता के हाथ में है और स्वाभाविक है कि कोई ना कोई रास्ता निकलने में ऐंडी-चोटी एक कर दिया जायेगा ताकि प्रधान मंत्री और उनके कार्यालय पर लगने वाले “दाग, दिनाई और खुजली” से बचाया जा सके, लेकिन “बिल्ली कि माँ कब तक खैर मनाएगी?” अगर इसी घोटाले में डॉ. मनमोहन सिंह सरकार के बरिष्ट मंत्रिगन केन्द्रीय कारगर को शोभायमान कर सकते हैं, तो चिदम्बरम क्यों नहीं? प्रधान मंत्री या पार्टी के सेनियर कार्यकर्ता को चिदम्बरम के प्रति क्यों इतना “झुकाब” है, इस बात को भी जानने और कुरेदने में लगे है. प्रधान मंत्री स्वयं इस सम्पूर्ण घटना और चिदम्बरम कि भूमिका पर “मिटटी डालते हुए” कहा था: “इस मामले कि फ़िलहाल अदालत में जांच चल रही है इसलिए सीधे तौर पर अभी कुछ कहना मुमकिन नहीं है. मेरे नजर से और पार्टी कि नजर से चिदम्बरम और उनका कार्यालय अभी तक बेदाग है. इनको लेकर पार्टी में या अन्य सहयोगी पार्टियों के बीच कोई मन-मुटाब नहीं है.”

 

इस क्षेत्र के ज्ञानी महापुरुषों का यह भी कहना है कि इस २००७-०८ में आज के बित्त मंत्री स्पेक्ट्रम मामलों पर सरकार द्वारा गठित मंत्रियों के समूह के अध्यक्ष भी थे. अदालत में दिए गए सख्या के आधार पर राजा इस बात का दावा भी करते हैं कि दिसंबर के अंतिम सप्ताह इस मामले को स्पष्ट करते हुए प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को उन्होंने पत्र लिखा था, उसमे इस बात कि जानकारी दी गयी थी कि “इस विषय पर उन्होंने प्रणब मुख़र्जी से अनगिनत बार विचार-विमर्श किये है.” चाहे वस्तु-स्थिति जो भी हों, 10 जनबरी, 2008 को टेलिकॉम लाइसेंस के लिए “लैटर ऑफ़ इंटेंट” जारी कर दिया गया. इतना ही नहीं, राजा ने प्रणब मुख़र्जी के माथे सारी बातें “मढ़ते हुए” यह भी सुचना दी है कि जिस 121 लाइसेंस और 35 ड्युअल टेक्नोलोजी लाइसेंस जारी किये गए, इससे पहने प्रणब मुख़र्जी को सत्यता पता था.

 

2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला केस का उजागर 2009 में दर्ज के प्राथमिकी रिपोर्ट के आधार पर हुई जो धीरे-धीरे टूल पकड़ता चला गया. प्रारंभ में तो दूर-संचार विभाग के अनगिनत अधिकारीयों और इस मंत्रालय और खास कर इस क्षेत्र से जुड़े कंपनियों पर सरकार को धोखा देकर पैसा कमाने तक सिमित था, लेकिन जैसे-जैसे केंद्रीय जांच ब्यूरो अपना हाथ बढाता गया, मामला संगीन होता गया. कई ज्ञात-अज्ञात ठिकाने पर छपे मारे गए और तथ्य दिखने लगा. इसका बज्रपात राजा पर हुआ, फिर मारन, फिर कनिमोझी. अभी ना जाने कितने और इस दायरे में आयेंगे, यह कहना मुश्किल है.

 

लेकिन एक बात तो तय है, कि सिर्फ कांग्रेस या उनके मत्री या सरकार को समर्थन देने वाली राजनितिक पार्टियाँ या मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में उन पार्टियों के मंत्रिगण ही क्यों? बुनियाद तो बहुत पुरानी है. इस बात से कोई भी व्यक्ति, चाहे सत्ता में हों या विपक्ष में, इंकार नहीं कर सकते कि दूर संचार नीति में आमूल परिवर्तन लाने कि बुनियाद अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधान मंत्रित्व काल में तत्कालीन संचार मत्री प्रमोद महाजन के समय पड़ी थी. बाद में, जब वरिष्ट पत्रकार, संपादक और बी.जे.पी. के अग्रणी नेता अरुण शौरी मंत्री बने तो २-जी स्पेक्ट्रम का आवंटन शुरू हुआ. अरुण शौरी २६ लाइसेंस जारी किये जबकि दयानिधि मारन २५ और राजा इस संख्या को १२१ तक ले गए. एक सबाल यहाँ उठता है कि जिस प्रक्रिया के तहत अरुण शौरी और मारन ने स्पेक्ट्रम बाटें उसी प्रक्रिया के तहत राजा भी. लेकिन राजा ने सीमा उस समय लांघ गए जब उन्होंने स्पेक्ट्रम का नीलामी कर दी.

 

राजनितिक समीक्षकों का मानना है कि प्रधान मंत्री का भले ही चिदम्बरम पर विश्वास हों, लेकिन भारत के 120  करोड़ अवाम का भरोसा  डगमगा गया है. वर्तमान २-जी स्पेक्ट्रम घोटाला हाल-फ़िलहाल में होने वाले सभी घोटालों का सिरमौर है . एक बात और भी है जब बर्तमान गठबंधन सरकार के पुर्कालिन अवधि में जन बाम्पंदियों ने इस बात का सरकार पर आरोप लगाया था तो प्रधान मंत्री खुद यह कर कर देश को शांत करने कि कोशिश किये थे कि उनके समय में ऐसा कोई घोटाला नहीं हुआ है.  तत्कालीन संचार मंत्री कि अध्यक्षता में जिस मंत्रियों के समूह का गठन हुआ था वे सभी इस घोटाले के जिम्मेदार थे. समय कि एही मांग है कि, या तो देश के प्रधान मत्री और मंत्रिमंडल के मुखिया होने के नाते, काम से काम राष्ट्र हित में, डॉ. मनमोहन सिंह इस सम्पूर्ण घोटालों का दायित्व अपने सर पर ले लें. राजा या कनिमोझी या कोई और को काराबास भेजकर वे अपने जिम्मेदारी से नहीं भाग सकते हैं.
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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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  1. आज जो भी हो रहा है ..उससे देश का बुध्दिजीवी संतुष्टनहीं है ..विरोध बाहरअभी नजर नही आता किन्तु हो न हो कांग्रेश में अंदर ही अंदर हलचल मची है ..देशप्रेमी प्रहरी इन घातों को कब तक सहे..आब तो हद हो गयी जागो और जागो नही तो हम बहुत कुछ खो देगे जय हिंद जय भारत

  2. It is all power game Now it is last chance for PRANAB DA to become PM but problem is that Sonia g Never do it & another side entire full capacity try by Pranab da …L K Adwani & mamata still not agreed ….that the problem otherwise Govt change…..any time….

  3. प्रणव दा ऐसे मंत्री हैं जो उस मनमोहन सिंह के मातहत कम कर रहे हैं जो कभी RBI governor के तौर पर उन्हें सैल्यूट करते थे जब प्रणव राजीव सरकार में वित्त मंत्री थे .
    राजनितिक रूप से मनमोहन सरकार के सबसे वरिष्ठ मंत्री हैं प्रणव दा|

  4. और अगर प्रणव को अपने नीतिमत्ता और जमीर की इतनी चिंता है तो बढ़ते महंगाई के चलते उन्होंने बहोत पहले ही अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए था, क्यों की ये उनकी नैतिक जिम्मेदारी है की ना ही बढती महंगाई को वे रोके बल्कि उसे कम भी करे.

  5. राजनीती में इतनी सरलता और निति अब नहीं रही है………मुझे पक्का यकीन है की ऐसा कुछ नहीं होगा……ना ही प्रणव कोलकाता वापस जायेंगे न ही चिदम्बर को पद से हटाया जायेगा….क्यों की ये कांग्रेस की बेशरम और निर्दयी सरकार है.

  6. अरे शिवनाथ, कहाँ से ढूंढा है? बॉस मेरी तो ऐसी की तैसी हो गयी. एक सप्ताह का मेहनत पानी में. लेकिन its very good story, completely different and “true”

  7. दादा के बारे में इस तरफ का लेख पहली बार पढ़ने को मिला , इसमें जानकारी और तथ्य दोनों है. वास्तविकता में प्रणब बाबु हमेशा से नीतिगत कम किये है.

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