इस बार सरकार बैंक खुला रखने के लिए क्यों परेशान है?

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-संजय कुमार सिंह।।


देश भर में अचानक लागू किए गए लॉक डाउन में जब परीक्षाएं नहीं हो रही हैं, अस्पतालों के ओपीडी बंद कर दिए गए हैं, लोगों को घर से निकलना ही नहीं है तब बैंक खुले रखने का मकसद मुझे अभी तक समझ में नहीं आया है। बाद में पता चला कि डाकघर भी खुले हैं क्योंकि वहां भी लोगों के बचत खाते होते हैं और लोगों के पैसे जमा हैं। जब जान पर बन आई है तो सरकार को लोगों और उनके पैसों की भी चिन्ता है। वरना नोटबंदी के समय घर में शादी है, पैसे नहीं हैं …. कह कर सरकार जी हंस रहे थे। डिजिटल जमाने में बैंकों की शाखाएं खुले रखने की जरूरत बिल्कुल नहीं है और खुला ही रखना था (सरकारी कामों के लिए) तो कुछेक खास बैंक की कुछ खास शाखाएं खुली रखी जा सकती थीं।
मुझे नहीं पता एक बैंक के खाते दूसरे से चलाना कितना संभव है (एटीएम तो चलते ही हैं) पर अगर ऐसा हो सकता तो किसी एक बैंक की सभी या कुछेक शाखाओं को खोलकर काम चलाया जा सकता था और घर पर शादी है पैसे नहीं हैं जैसी स्थिति नहीं आती। मुख्य बात यह है कि लॉक डाउन को सफल बनाने के लिए जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा लोग घरों में रहें और कम से कम लोग बाहर रहें जो किसी से मिलें या किसी के घर जाएं। इसके लिए बैंक बंद होते और होम डिलीवरी चालू रहती तो बेहतर होता। कहीं भी फंसे लोगों के लिए कोई भी कहीं से भी खाना ऑर्डर कर सकता था और जिन्दा रहने के लिए यही बुनियादी जरूरत है। पर लगता है इस बार सरकार के लिए बैंकों को खुला रखना ज्यादा जरूरी है।
इतना कि वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग में डिप्टी डायरेक्टर राघव भट्ट ने 27 मार्च को देश के सभी सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैकों के एमडी, सीईओ और इंडियन बैंक्स एसोसिएशन के चेयरमैन को एक पत्र लिखा है। इसमें कहा गया है कि 27 मार्च को यह देखा गया कि सरकारी क्षेत्र के बैंकों की 10,304 शाखाएं और निजी क्षेत्र के बैंकों की 3447 शाखाएं काम नहीं कर पाईं। निश्चित रूप से इसका कारण भिन्न राज्यों में लागू भिन्न प्रतिबंध रहे होंगे और इनमें कर्फ्यू लागू होना तथा बैंक खुले रहने की अनुमति होने न होने का मतलब है। पत्र के अनुसार इसी तरह सरकारी बैंकों के 68189 तथा निजी क्षेत्र के बैंकों के 16,852 बीसी (बिजनेस कॉरसपोंडेंट) काम नहीं कर पाए।
पत्र में कहा गया है कि मुझे इस बात पर रोशनी डालने का निर्देश मिला है कि बैंकिंग चैनल को खुला रखना जरूरी है और यह सुनिश्चित किया जाना है कि शाखाएं और बीसी लॉक आउट की पूरी अवधि में काम करें ताकि लोगों को किसी तरह की बाधा या समस्या का सामना नहीं करना पड़े। सरकार द्वारा पेश प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज के मद्देनजर यह खास तौर से महत्वपूर्ण है ताकि गरीब और प्रभावित हो सकने वाले की आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। इसके परिणाम स्वरूप कई लोगों की नकद निकालने की आवश्यकता शाखाओं और बीसी के जरिए पूरी की जानी होगी। इसलिए यह आग्रह किया जाता है कि सभी सरकारी बैंक स्थानीय जिला राज्य प्रशासन के साथ तालमेल में यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाएं कि शाखाएं खुली रहें और बीसी काम कर पाएं।
सभी सरकारी बैंक प्रत्येक रीजन/ जोन /सर्किल आदि में जीएम (महाप्रबंधक) या ऊपर के रैंक के फील्ड स्तर के अधिकारी को इस काम में लगाएं ताकि स्थानीय प्रशासन से संयोजन आसान हो सके और कोई भी लंबिध मामला शीघ्रातिशीघ्र निपटाया जा सके। जहां तक निजी क्षेत्र के बैंकों की बात है आईबीए से आग्रह किया जाता है कि कृपया अपनी शाखा और बीसी के परिचालन की निगरानी करें ताकि ये सीवनहीन ढंग से काम कर सकें। इस पत्र के साथ सभी सरकारी और निजी बैंकों की कुल शाखाओं की संख्या और काम करने वाली शाखाओं की संख्या लिखी हुई है और बताया गया है कि किस बैंक की कितनी शाखाएं बंद थीं तथा कुल कितनी हुईं और फिर ऐसा ही निजी बैंकों के मामले में है। सबका जोड़ वही है जो ऊपर लिखा है। इस मामले में खास बात तो यह है कि बैंक गरीबों के लिए खुले रखे जाने हैं जिन्हें रोज लाखों रुपए निकालने या जमा करने की जरूरत नहीं होती है और लॉकडाउन की अवधि में रोज पैसों की जरूरत नहीं होनी है। एक बार में पैसा निकालकर काम किया जा सकता है।
बैंकों के मामले में सरकार का यह रुख नोटबंदी के समय से बिल्कुल अलग है। तब गरीब को कारोबार करना था। उस समय बहुत सारे भक्त किस्म के लोगों ने पूछा था कि जो रोज 500 रुपए कमाता है उसे 5000 रुपए की जरूरत क्यों है। मैंने तब भी कहा था कि 5000 रुपए का सामान रोज बेचकर ही कोई 500 रुपए बचाएगा। यह राशि कम ज्यादा हो सकती है और रोज कमाने वाले को 500 रुपए कमाने के लिए 5000 रुपए की आवश्यकता हो सकती है। यह जरूरी नहीं है कि रोज सारा कारोबार नकद हो। पर जब लॉक डाउन है और करीब को कहीं जाना नहीं है, कोई कारोबार नहीं करना है तो सिर्फ खाने के लिए उसके पास दो,चार पांच हजार रुपए होंगे उससे वह महीने भर का राशन खरीदकर घर में रहेगा। वह बैंक क्यों जाएगा। इसके अलावा, देश भर में घर से निकलने वालों को जिस ढंग से मारा-पीटा जा रहा है उसमें बैंक कर्मी तो छोड़िए ग्राहक कैसे शाखाओं में आएंगे इस बारे में पत्र में कुछ नहीं लिखा है। इस पत्र में डाक घरों के खातों की भी कोई चर्चा नहीं है और ना यह पत्र उससे संबंधित किसी व्यक्ति को संबोधित या अग्रसारित बताई गई है।

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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