सरकार गोरी-अंग्रेज थी तब भी और अब काली-देसी है, तब भी..

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-सुनील कुमार।।
हिंदुस्तान की बड़ी तकलीफदेह तस्वीरें सामने आ रही हैं, आती ही जा रही हैं। कोरोना से प्रभावित किसी और देश में सड़कों पर बेवजह-बेसहारा लोगों के सैकड़ों किलोमीटर सफ़र की ऐसी तस्वीरें देखने नहीं मिलीं क्योंकि वे हिंदुस्तान से अधिक सम्पन्न देश भी थे। हिंदुस्तान की सरकार विदेशों से तो हिंदुस्तानियों को मुफ्त के हवाई जहाज में बिठाकर लाई लेकिन देश के भीतर दसियों लाख, या करोड़ों, मजदूर, बेरोजगार, पैदल सफर करके अपने गांव जा रहे हैं। ऐसे में भाजपा के एक भूतपूर्व सांसद बलबीर पुंज ने उनका मखौल भी उड़ाया है ट्विटर पर, कि काम बंद होने से ये मजदूर अपने घर वालों से मिलने चले जा रहे हैं जिनसे मिलना नहीं हुआ था। बलबीर पुंज इस तरह कुछ सौ किलोमीटर पैदल जाकर देख लें, उनके बदन और दिमाग दोनों की चर्बी छंट जाएगी।

लोगों का बच्चों को, बीमारों को, जख्मी घरवालों को लेकर इस तरह सैकड़ों किलोमीटर चलना भारत-पाक विभाजन की भयानक तस्वीरों को याद दिला रहा है। कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर ऐसी दो तस्वीरों को जोड़कर तुलना भी की है। वह तो अंग्रेज सरकार का वक्त था, आज तो सरकार हिंदुस्तान की है। लेकिन ऐसे में कुछ समझदार लोग भी ऐसे मजदूरों को पलायन करने वाले लिख रहे हैं कि ये लोग आदतन हर बरस पलायन करके जाते ही हैं। यह भी लिखा जा रहा है कि अब वे शहरों से वापिस पलायन करके गाँव आ रहे हैं। क्या मजदूर पलायन करते हैं? क्या वे काम और मेहनत से दूर भागते हैं पलायन करके? सच तो यह है कि बेबस मजदूर काम की तलाश में, या बेहतर मजदूरी की तलाश में सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर जाकर भी रात-दिन काम करते हैं। उनका यह जाना पलायन नहीं होता, यह तो देश-प्रदेश की सरकारों का अपनी जिम्मेदारी से पलायन होता है कि वे अपने काबिल मजदूरों को काम नहीं दे पातीं, जरूरत की मजदूरी नहीं दे पातीं। पलायन मजदूर नहीं करते, सरकारें करती हैं अपनी जिम्मेदारियों से ? लेकिन भाषा को हमेशा ताकतवर का हिमायती बनाया जाता है इसलिए पलायन का कुसूरवार मजदूरों को ठहराया जाता है। आज देश भर से, जगह-जगह से, मकान मालिक अपने किराएदार मजदूरों को भगा रहे हैं। इसमें मजदूर पलायन नहीं कर रहे, किराया लेने वाले मकान मालिक अपनी कानूनी और सामाजिक दोनों ही किस्म की जवाबदेही से पलायन कर रहे हैं।

आज कई वीडियो दिख रहे हैं कि लोग हाईवे के किनारे खड़े होकर गांव जाते लोगों को खाने के पैकेट दे रहे हैं। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के समाजवादी नेता प्रदीप चौबे ने किसानों के लिए लिखा है कि वे ट्रैक्टर (ट्रॉली) लेकर निकलें और गुजरते हुए मजदूरों को दूर तक पहुंचकर आएं। उन्होंने अपने साथियों से भी सड़कों पर मदद के लिए तैनात रहने कहा है। लेकिन सवाल यह है कि देश भर में करोड़ों लोगों को बेबसी में ऐसे क्यों जाना पड़ रहा है?

जो जहां थे वहीं सरकारी और सार्वजनिक इमारतों में, सरकार के दिमाग में, लोगों के दिलों में इतनी जगह नहीं थी कि तीन हफ्ते इनको सिर पर छत और दो वक्त का खाना दिया जा सकता? समाज और सरकार के पास मिलकर भी छतें नहीं थीं? या गाडिय़ां नहीं थीं? पता नहीं खबर सच है या नहीं, एक हिंदुस्तानी एयरलाइंस स्पाईस जेट ने मुम्बई से मजदूरों को पटना तक पहुंचाने का प्रस्ताव दिया है, मुफ्त में। कुछ लोगों ने यह भी लिखा है कि महानगरों में खाली पड़ीं या आधी बनी इमारतों में भी लोगों को ठहराया जा सकता था, बजाय उनके पैदल सफर के। जो सरकार देश भर में पल भर में ट्रेनों को बंद करना जरूरी समझती है उसे यह खतरा नहीं दिखा कि लोग घने बसे महानगरों से देश के गांव-गांव तक जाएंगे जो अधिक बड़ा खतरा होगा, बजाय खाली शहरी इमारतों में ठहरने के? और गांवोंं में भी तो शहर से लौटते अपनों को घुसने नहीं दिया जा रहा है महामारी के इस दौर में। जिनके पसीने के ईंधन से देश की अर्थव्यवस्था का इंजन चलता है, वे आज यहां के नागरिक ही नहीं रह गए, न महानगरों के न गांवों के। वे बस अब सड़क नाम के एक देश के पैदल मुसाफिर हैं, नागरिक कहीं के नहीं ! विभाजन के वक्त तो गोरी अंग्रेज सरकार थी, लेकिन आज तो काली देसी सरकार है ! विभाजन जारी है !

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’का संपादकीय, 28 मार्च)

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