इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-संजय कुमार सिंह।।

दैनिक भास्कर के पटना संस्करण की लीड – केंद्र का 1.7 लाख करोड़ का पैकेज और राज्य सरकार का 100 करोड़ का पैकेज साथ साथ। डबल इंजन सरकार का अच्छा प्रचार। केंद्र सरकार के 1.7 लाख के पैकेज में अखबार ने जिस तथ्य को सबसे ज्यादा महत्व दिया है वह है 22 लाख स्वास्थ्यकर्मियों का 50 लाख रुपए का बीमा। सुनने में यह अच्छा लगता है और आवश्यक सुरक्षा व सुविधाओं के बगैर स्वास्थ्य कर्मियों के समर्थन में जब प्रधानमंत्री ताली और थाली बजवा रहे हैं और लोग बजा कर खुश हो रहे हैं तो 50 लाख का बीमा निश्चित रूप से बड़ी खबर है। केंद्र की भाजपा सरकार इसीलिए बीमा करवाती रहती है और पूरा प्रचार पाती है। बीमा असल में जुआ है जो देश में प्रतिबंधित है। सुनने में यह बड़ा लगता है पर असल में इसका लाभ बहुत कम लोगों को मिलता है या कहिए कि बहुत कम लोगों के लिए होता है। दूसरी ओर जो राशि खर्च होती है वह अपेक्षाकृत ज्यादा होती है और लाभ बीमा कंपनी कमाती है। बाकी मामले में प्रीमियम की राशि बेकार।


भाजपा सरकार इसी में भरोसा करती है क्योंकि यह दिखाई ज्यादा देता है। इसीलिए आम गरीबों के लिए सरकारी अस्पतालों की दशा सुधारने और उनपर खर्च करने की बजाय पांच लाख रुपए प्रति परिवार बीमा कराया गया। इलाज के खर्च के लिहाज से यह राशि बहुत कम है और पूरे परिवार के लिए तो लगभग नगण्य। यह बीमा उन्हीं लोगों के लिए है जो अस्पताल में दाखिल होते है और ऐसे लोगों की संख्या सिर्फ चार प्रतिशत होती है। यानी 100 परिवार के पांच सौ लोगों का बीमा कराया गया तो सिर्फ 20 लोगों को अस्पातल में दाखिल होने की जरूरत होगी और इनमें जितने लोगों को बीमा का लाभ मिल सके। लेकिन बीमा के लाभान्वित तो सभी 500 लोग हुए।
कोई परिवार मुश्किल समय के लिए बीमा कराए, पर्याप्त पैसे नहीं होते हैं इसलिए कराए और निजी कमाई से उसकी किस्तें दे तथा जरूरत नहीं पड़ने पर खर्च की गई राशि बेकार जाए या आयकर में लाभ मिल जाए या वह समाज सेवा का खर्च मान ले – यह सब तो ठीक है। पर अस्पताल नहीं होंगे तो बीमा कराने का क्या मतलब? सरकारी खर्चे से बीमा कराया जाए और सिर्फ चार प्रतिशत लोगों के काम आए तो बाकी पैसे बीमा कंपनी की जेब में ही जाएंगे। बीमा कंपनी सरकारी हो तो फिर भी एक बात है लेकिन निजी बीमा कंपनी से सरकारी बीमा कराया जाए तो आप मकसद समझ सकते हैं। इसीलिए तमाम गरीबों का बीमा होने के बावजूद सरकार को कोरोना से लड़ने के लिए करोड़ों का पैकेज देना पड़ रहा है और जिनके लिए बीमा है वे सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर (या मेढ़क कूद लगाकर) गांव पहुंच रहे हैं या पहुंचेंगे। कहने का मतलब यह है कि धन का सही खर्च हुआ होता और प्रचार के मौके का इंतजार नहीं किया जाता तो कोरोना को फैलने से रोका जा सकता था पर शायद उसमें प्रचार नहीं मिलता।
दूसरी ओर, ताली बजवाना एक त्रासदी को ईवेंट बनाना है और 50 लाख का बीमा करना उसका फायदा उठाना है। इसी को कहते हैं हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा। बीमा में खर्च प्रीमियम का ही होता है पर बीमा राशि दिखाई देती है और इसीलिए व्हाट्सऐप्प पर प्रचारकों ने आम लोगों को यही बताया था कि उनका पांच लाख का बीमा हुआ है जबकि वह पूरे परिवार का था और एक व्यक्ति के लिए एक ही लाख हुआ। आयुष्मान योजना के प्रचार में गैरसरकारी पर दल विशेष के प्रचारकों ने यही कहा था कि यह स्विसबैंक से आने वाले काले धन का पांच लाख है जबकि असल में शायद ही किसी को कुछ मिला हो। ऐसा नहीं है कि इसे समझना कोई राकेट साइंस है पर प्रचार इसी का अच्छा हो सकता है इसीलिए किया जाता है। और अखबारों को ऐसे मौके की जरूरत होती है यह किसी से छिपा नहीं है। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार 1.70 लाख करोड़ का यह पूरा पैकेज कोई बड़ी बात नहीं है।
https://epaper.telegraphindia.com/imageview_325678_171920126_4_71_27-03-2020_6_i_1_sf.html
इस लिंक से आप पूरी तालिका देख सकते हैं। मैं इसकी हिन्दी नहीं कर रहा हूं। इसमें मोटी बात यह है कि 22 लाख स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए बीमा तो वैसे भी होना चाहिए और यह कोई भी नियोक्ता देता है। सरकार इस विशेष स्थिति पर विशेष बीमा के लिए 1100 करोड़ रुपए खर्च करेगी और देखने में यह जरूर अच्छा लगता है पर इसका लाभ तभी मिलेगा जब लोग प्रभावित होंगे। और ज्यादा लोग प्रभावित नहीं हुए तो इसकी जरूरत ही नहीं पड़ेगी पर बीमा कंपनी को लाभ होना तय है। सरकार का बीमा प्रेम ऐसा है कि सतपाल मलिक जब जम्मू कश्मीर के राज्यपाल बने तो सरकारी कर्मचारियों का बीमा जरूरी कर दिया जो एक निजी कंपनी से कराया जाना था। विरोध होने पर उसे वापस लिया गया।
संजय कुमार सिंह
27.03.2020

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
No tags for this post.

By Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Eyyübiye escort Fatsa escort Kargı escort Karayazı escort Ereğli escort Şarkışla escort Gölyaka escort Pazar escort Kadirli escort Gediz escort Mazıdağı escort Erçiş escort Çınarcık escort Bornova escort Belek escort Ceyhan escort Kutahya mutlu son