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देर आयद, दुरुस्त आयद..

आख़िरकार राहत पैकेज का ऐलान

जिस राहत पैकेज का कई दिनोंसे इंतजार था, आखिरकार आज उसकी घोषणा वित्तमंत्री ने कर ही दी। उन्होंने कहा कि हम नहीं चाहते कि कोईभूखा या तंगी में रहे। सरकार गरीबों तक पैसा पहुंचाएगी। एक लाख 70 हजार करोड़ का राहत पैकेज सरकार देगी। ऐसे मौके पर मजदूर और गरीब को राहत जरूरी है। राहत पैकेज के साथ वित्तमंत्री ने ये ऐलान भी किया है कि स्वास्थ्य कर्मियों का 50 लाख रुपए का बीमा कवर किया जाएगा। अगले कुछ दिन देश के लिए काफी चुनौतीपूर्ण हैं। ऐसे में सरकार की इस घोषणा से कुछ तो राहत मिलेगी।

लेकिन ऐसा तभी होगा, जब इस पर शत प्रतिशत ईमानदारी से, बिना देर किए काम शुरु हो जाए। इससे पहले कई बार ये देखा गया है कि प्राकृतिक आपदा के वक्त राहत समय से नहीं पहुंची है या बिचौलियों की भेंट चढ़ गई है, जिससे जरूरतमंदों को खाली हाथ रहना पड़ा है। इस वक्त समाज को मदद के साथ, सरकारी औऱ प्रशासनिक तंत्र की संवेदनशीलता की भी खासी जरूरत है। जिस दिन से संपूर्ण बंदी हुई है, उस दिन से कुछ मार्मिक तस्वीरें सामने आ रही हैं। जैसे मजदूरों या सड़क किनारे जूते-चप्पल सुधारने या कपड़े दुरुस्त करने वाले कारीगर पूरे परिवार के साथ अपने-अपने गांवों को पैदल निकल पड़े  हैं। किसी का सफर 3 सौ किमी का है, किसी का हजार किमी का।

रास्ते में न कहीं रात गुजारने का ठिकाना, न खाने-पीने का इंतजाम। कोई गुजरात से राजस्थान जा रहा है, कोई दिल्ली से बिहार, कोई कर्नाटक से महाराष्ट्र। सिर पर सामान की गठरी, जिसे खोला जाए, तो एक पूरी गृहस्थी बन जाती है, गोद में या उंगली थामकर चलते छोटे बच्चे। इनकी हालत देखकर कहा ही नहीं जा सकता कि ये बीमारी से बचने के लिए जिंदगी की ओर बढ़ रहे हैं या जिंदा रहने के लिए चलते-चलते मौत की ओर बढ़ रहे हैं। अगर सरकार थोड़ी समझदारी और संवेदनशीलता से काम लेती, तो इन्हें यूं भटकना नहीं पड़ता।

एकदम से 21 दिन का बंद कहने से पहले प्रशासनिक अमले और तमाम राज्य सरकारों को विश्वास में लेकर पहले यह सुनिश्चित किया जाता कि रोज कमाने-खाने वाले इस तबके के लिए कम से कम 21 दिन तक खाने औऱ रहने का इंतजाम हो जाता। इस काम में गैर सरकारी संगठन भी मदद करते। सबके मिले-जुले प्रय़ास से हजारों लोगों को राहत मिल जाती। इससे मोदीजी की तारीफ ही होती, लेकिन उन्हें शायद असली तारीफों की दरकार ही नहीं है। वे उन चापलूस पत्रकारों से ही खुश हैं, जो इस मुसीबत की घड़ी में भी उनकी लल्लो-चप्पो में लगे हैं।

वैसे इन तथाकथित पत्रकारों को प्रकाशराज जैसे लोगों की मिसाल भी देश को बतानी चाहिए, जिन्होंने कुछ दिहाड़ी मजदूरों को अपने फार्म हाउस में रहने की जगह दी है। उनकी तरह और भी बहुत से लोग इस तरह की मदद करने आगे आ रहे हैं। बहुत से सांसद, विधायक भी कहीं स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करवा कर, तो कहीं राहत के लिए धनराशि देकर इस महामारी की पीड़ा को कम करने में लगे हैं। यह देखना भी सुखद है कि कांग्रेस, सपा, बसपा जैसे विपक्षी दलों ने बंद के कदम में साथ देने का फैसला किया है।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी  ने तो बाकायदा मोदीजी को एक पत्र लिखकर 21 दिन के बंद को स्वागत योग्य बताया है। उन्होंने लिखा कि  ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में, मैं यह बताना चाहूंगी कि हम महामारी की रोकथाम सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए हर कदम का समर्थन और सहयोग करेंगे।’ इसके साथ ही कुछ सुझाव भी दिए हैं, जिन पर मोदीजी को गौर फरमाना चाहिए।

उन्होंने डॉक्टरों और अर्द्धचिकित्सकों की रक्षा करने तथा आपूर्ति श्रृंखला को आसान बनाने के लिए कदम उठाने की मांग की। साथ ही उन्होंने कहा कि केंद्र को छह महीनों के लिए सभी ईएमआई को टालने पर विचार करना चाहिए, इस अवधि के लिए बैंकों द्वारा लिया जाने वाला ब्याज भी माफ करना चाहिए। जिस तरह इस वक्त विपक्षी दल मोदीजी का साथ दे रहे हैं। उन्हें भी थोड़ी दरियादिली दिखाते हुए राजनैतिक पूर्वाग्रहों के बिना अच्छे सुझावों को सुनना और मानना चाहिए। पहले देश बच जाए, फिर राजनैतिक हिसाब-किताब पूरा किया जाए।

(देशबन्धु)

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