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-सुनील कुमार।।
बुरा वक्त कई अच्छी नसीहतें देकर आता है, कई नई बातें सिखा जाता है। हिन्दुस्तान में कोरोना जिस रफ्तार से लंबी-लंबी छलांगें लगाकर फैल रहा है, उसका अंदाज अब तक लोगों को लग नहीं रहा है, इसलिए कि लोगों को लगता है कि जितने लोगों की मेडिकल जांच में कोरोना पॉजिटिव निकला है वही हकीकत है। सच तो यह है कि उससे हजारों गुना लोगों को आज ही कोरोना पॉजिटिव होगा, और लाखों लोगों को तब तक हो चुका होगा, जब तक इन हजारों लोगों की शिनाख्त हो पाएगी। ऐसे में तीन दिन पहले हमें यह अखबार छापना बंद कर देना ठीक लगा था। बात महज सैकड़ों कर्मचारियों की नहीं थी, उसे लोगों तक पहुंचाने वाले हजारों लोगों की जान की हिफाजत की बात भी थी। जान है तो जहान है, आज के इस डिजिटल जमाने में लोगों की जिंदगी को खतरे में डालते हुए अखबार को बंटवाना कम से कम हमें समझदारी नहीं लगी, और बिना किसी और पर अपनी सलाह का दबाव डाले हमने उसे छापना तब तक स्थगित कर दिया जब तक कोरोना लोगों की जिंदगी पर मौत बनकर मंडराता रहे। रोज सुबह-शाम छत्तीसगढ़ में दसियों हजार हॉकर कुछ घंटे घर-घर जाएं, यह बात प्रधानमंत्री के देश के लॉकडाऊन के शब्दों और उनकी भावना, किसी के साथ भी मेल खाने वाले बात नहीं थी, चिकित्सा विज्ञान के हिसाब से तो मेल खाने वाली बात बिल्कुल भी नहीं थी।

अब आज यह लग रहा है कि इस अखबार को तैयार करने और इंटरनेट-मोबाइल फोन पर लोगों तक पहुंचाने के लिए जिस तरह कुछ दर्जन लोग एक हॉल में कम्प्यूटरों पर काम कर रहे हैं, वह भी हिफाजत के खिलाफ है, और इसका कोई रास्ता ढूंढना जरूरी है। इसलिए आज सुबह हमने तय किया कि अखबार का न्यूजरूम तुरंत बंद कर दिया जाए, और सारे लोग अपने घरों से काम करें। टेक्नालॉजी तो मौजूद है, लेकिन ऐसी आदत नहीं रही कि बिना आसपास बैठे, बिना एक-दूसरे पर चीखे-चिल्लाए, बिना झल्लाए, बिना संवाददाताओं को फोन पर डपटाए अखबार तैयार कर लिया जाए। ऐसी दिमागी हालत में भी आज इस वक्त जब एक कम्प्यूटर पर यह हाल टाईप हो रहा है, तब दूसरे कम्प्यूटर ले लेकर कुछ साथी घर रवाना हो रहे हैं, कुछ और लोग कुछ घंटों का काम यहीं निपटाकर रवाना हो जाएंगे। जिन मशीनों पर रोज दफ्तर में काम होता है, उन्हीं मशीनों पर घर से काम होने लगेगा, और इस तरह की नेटवर्किंग जो कि दुनिया में बहुत सी जगहों पर आम हैं, वह सीखने का हमारे लिए यह एक नया मौका है। यह इसलिए मुमकिन हो पा रहा है कि इंटरनेट और टेलीफोन की सहूलियतें बढ़ी हुई हैं, और इसके लिए हम इन कंपनियों के आज भी काम कर रहे कर्मचारियों को भी शुक्रिया के साथ सलाम कर रहे हैं।

लोग अभी भी अखबारी कागज को महफूज बताकर यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि कोरोना कागज के मार्फत कहीं नहीं जाता। लेकिन इस कागज को लेकर घर-घर भटकने वाले, बहुत ही मामूली मजदूरी पाने वाले लोगों की जिंदगी के खतरे का अहसास करना भी जरूरी है। सरकार के कानून अखबार छापने और पहुंचाने की छूट दे रहे हैं, लेकिन स्मार्टफोन और इंटरनेट के जमाने में कुछ दिनों के लिए हॉकरों की जिंदगी खतरे में डाले बिना भी काम चल सकता है। अखबार के दफ्तर में आए बिना भी एक अखबार निकल सकता है, और छपे बिना भी बंट सकता है। यह सब हमें सीखने मिल रहा है, और हकीकत यह है कि कुछ नया सीखने के लिए स्लेट पट्टी पर पहले का लिखा हुआ साफ करना पड़ता है, और हमें एक बड़ी मेहनत उसी पुरानी सोच को मिटाने में करनी पड़ रही है।

छत्तीसगढ़ की सड़कों पर अब भी आम लोगों की आवाजाही, लोगों का बिना मास्क लगाए निकलना, किराना दुकानों या गैस दुकानों पर लोगों की धक्का-मुक्की जैसी भीड़ से ऐसा लगता है कि कोरोना के खतरे का पूरा अहसास लोगों को है नहीं। लोगों को यह अंदाज नहीं हैं कि आज कुछ असली, कुछ फर्जी वीडियो जिस तरह तैर रहे हैं, और लाशों को इधर-उधर पड़े हुए बता रहे हैं, वह एक हकीकत भी हो सकती है। ऐसे कल से बचने के लिए आज अपने आपको बंद कर लेना जरूरी है। यह वक्त उन तमाम लोगों की जिंदगी को बचाने के लिए भी जरूरी है जो अस्पतालों में मरीजों और मौतों के मोर्चे पर डटे हुए हैं। जो लोग मरीजों को अस्पताल तक ले जा रहे हैं, और रात-दिन ड्रायवरी कर रहे हैं, स्ट्रेचर उठा रहे हैं। यह वक्त उन पुलिसवालों को भी सलाम करने का है जो लापरवाह लोगों से जूझते हुए शहरों के हर चौराहे पर खड़े हैं, और हर किसी को रोककर उससे बात करने को मजबूर हैं। आज जब लोग जायज वजहों से इस हद तक डरे हुए हैं कि अड़ोस-पड़ोस तक आना-जाना बंद है, और रहना भी चाहिए, तब भी पुलिस रात-दिन सड़कों पर है, धक्का-मुक्की और भीड़ के बीच है, अस्पताल में भी है, और थाने में भी लोगों से जूझ रही है। यह वक्त अपने परिवार से दूर काम कर रही ऐसी पुलिस को भी सलाम करने का है।

बाजार में कुछ लोग अपनी खुद की बेबसी से सब्जी बेचने बैठे हैं, दूध पहुंचा रहे हैं, गैस सिलेंडर पहुंचा रहे हैं, बिजली घरों को चला रहे हैं, बिजली घरों के लिए कोयला निकाल रहे हैं, कोयले से लदी ट्रकें और मालगाडिय़ां चला रहे हैं। मेडिकल स्टोर खोलकर बैठे हैं जहां पर मरीजों और उनके घरवालों के अलावा कोई नहीं आते, और उनका सीधा खतरा झेल रहे हैं। ऐसे तमाम लोगों को हमारा सलाम। साथ ही बाकी लोगों से यह अपील भी कि इनमें से किसी से भी बहस न करें, उनके काम में दिक्कत न डालें। यह मौका बातों को बहुत व्यवस्थित तरीके से लिखने का नहीं है, और अपनी खुद की बात लिखते हुए यह अंदाज नहीं था कि दूसरों के लिए धन्यवाद की बात यहीं पर लिखना सूझेगा। कुल मिलाकर बिना किसी इमरजेंसी घर से न निकलें, और मानव-नस्ल को जिंदा रहने दें।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय 26 मार्च 2020)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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