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सुप्रीम कोर्ट ने दो दिन पहले राज्यों से कहा है कि वे जेलों में बंद कैदियों को पैरोल पर छोडऩे के लिए उच्चस्तरीय पैनल बनाएं जो कि सात बरस से अधिक तक कैद रह चुके सभी को पैरोल पर छोडऩे पर विचार करे। अदालत ने भारतीय जेलों में क्षमता से बहुत अधिक भरे गए कैदियों को कोरना जैसे संक्रमण से बचाने के लिए यह आदेश दिया है। अदालत का कहना है कि जो विचाराधीन कैदी ऐसे मामलों में जेलों में बंद हैं जिनमें अधिकतम सजा सात बरस तक ही हो सकती है उन्हें भी ऐसी ही पैरोल दी जानी चाहिए। अदालत ने इस कमेटी की बैठक हर हफ्ते एक बार करने को कहा है। अदालत ने संक्रमण से बचाने के लिए विचाराधीन कैदियों की कोर्ट-पेशी भी रोक दी है, और एक जेल से दूसरी जेल कैदियों को भेजना भी। इसके अलावा और भी बहुत से निर्देश अदालत ने दिए हैं जो कि कैदियों की जान बचाने के लिए जरूरी हैं।

हिन्दुस्तान में आम सोच में कैदियों के साथ कोई रियायत एक गैरजरूरी या बहुत हद तक खराब बात मान ली जाती है। जब कभी कैदी के खानपान, या उसके इलाज की बात हो, या जेलों में न्यूनतम मानवीय सुविधाओं की बात हो, लोगों को लगता है कि यह तो सजा काट रहे लोग हैं, और इन्हें कोई सुविधा या रियायत क्यों मिले? यह समझने की जरूरत है कि जब ये सुविधाएं एक न्यूनतम मानवाधिकार जितनी हों, या किसी जानलेवा बीमारी से इलाज जैसी जरूरत हो, तो एक कैदी के अधिकार जेल के बाहर के एक सामान्य नागरिक के अधिकारों के अधिक ही होनी चाहिए। ऐसा इसलिए कि बाहर के नागरिक तो अपने लिए सुविधाएं जुटा सकते हैं, जेल के कैदी अपनी मर्जी से कुछ नहीं पा सकते, और वे सरकार की ही जिम्मेदारी होते हैं।

भारत में जेलों का हाल इतना खराब है कि कैदियों के रहने की जगह नहीं, उनके नहाने या शौच की पर्याप्त जगह नहीं, और जेलों के भीतर अपराधियों का माफियाराज चलता है जो कि आम कैदियों के हक छीनने का काम भी करता है ताकि उनसे वसूली की जा सके। ऐसे में कुछ लोगों को यह लग सकता है कि आज कोरोना जैसे वायरस के संक्रमण में जेल तो सबसे ही सुरक्षित जगह है क्योंकि वह आम लोगों से कटी हुई है। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है, सच तो यह है कि हजारों कैदियों के पीछे सैकड़ों जेल कर्मचारी भी तैनात रहते हैं जो कि रोज घर आते-जाते हैं, और जेल के बाहर की आम जिंदगी जीते हैं। इसलिए ऐसे सैकड़ों कर्मचारी अगर संक्रमित होते हैं, तो वे जेल के भीतर भी संक्रमण लेकर आ सकते हैं, और लबालब भरी हुई जेलों में संक्रमण फैलना बाहर के मुकाबले बहुत अधिक रफ्तार से होगा। कल की खबर है कि पश्चिम बंगाल की एक सबसे बड़ी जेल में कैदियों ने लगातार दूसरे दिन हिंसा की क्योंकि 31 मार्च तक अदालतें बंद होने से उनकी जमानत याचिकाओं पर सुनवाई ठप्प है, और घरवालों से साप्ताहिक मुलाकात भी रोक दी गई है। इस हिंसा में कुछ लोगों की मौत की खबर भी है, और आगजनी भी हुई है। अपराधियों की घनी आबादी वाली जेलों में हो सकता है कि यह हिंसा नाजायज भी हो, और यह भी हो सकता है कि यह कोरोना की दहशत में की गई हो। लेकिन यह नौबत कुछ सोचना भी सुझाती है।

आज जेलों के बाहर कैदियों के परिवार हैं, और हो सकता है कि उन परिवारों के पास जिंदा रहने के लिए पूरे इंतजाम न हो। कुछ लोगों को लग सकता है कि आज अगर कैदियों को पैरोल पर छोड़ा भी जाएगा, तो वे घर कैसे पहुंचेंगे क्योंकि गाडिय़ां तो बंद हैं, इसके अलावा एक दिक्कत यह भी आ सकती है कि गांवों में लोग बाहर से या जेल से आए हुए कैदी को 14 दिन भीतर न आने दें, संक्रमण से बचने के लिए बहुत से गांवों में ऐसा किया भी जा रहा है, जहां बाहर से लौटे मजदूर गांवों के बाहर ही ठहरा दिए गए हैं। लेकिन बात महज तीन हफ्तों की नहीं है, ये तीन महीनों तक भी बढ़ सकती है, और जेल में बंद कैदी का परिवार बाहर जिंदा रहने, इलाज कराने में कमजोर भी साबित हो सकता है। हो सकता है कि इटली या स्पेन की तरह बूढ़े लोग अपने आखिरी दिन देख रहे हों, और ऐसे में उन्हें परिवार के लोगों की अपने बीच जरूरत हो। इन तमाम बातों को देखते हुए कैदियों को अगले तीन महीने के पैरोल पर तुरंत छोडऩा चाहिए, इससे जेलों के भीतर सिर्फ खूंखार कैदी बच जाएंगे, और भीड़ छंटने से जेल में संक्रमण का खतरा भी कम होगा। लोगों ने एक पखवाड़े पहले पढ़ा भी होगा कि इरान में कोरोना-संक्रमण में बुरा हाल हो जाने के बाद अपनी जेलों से 54 हजार कैदियों को एक साथ रिहा कर दिया था। इस असाधारण, अभूतपूर्व खतरे के बीच जेलों की हकीकत देखते हुए, कैदियों और उनके परिवारों के मानवाधिकार देखते हुए अधिक से अधिक कैदियों को तुरंत रिहा करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बंधनकारी न मानते हुए एक संभावना मानना चाहिए।
(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 25 मार्च 2020)

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