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-सुनील कुमार।।

खतरे कई किस्म के होते हैं। कुछ दिखते हैं, कुछ देर से दिखते हैं, और कुछ इतनी अधिक देर से दिखते हैं कि उनसे उबरना मुमकिन नहीं होता। आज दुनिया पर कोरोना का खतरा इस तीसरी किस्म का है। कोरोना वायरस से जब लोग संक्रमण पा चुके रहते हैं, तब भी अगला एक पखवाड़ा ऐसा हो सकता है जब उसका असर उन लोगों पर न दिखे। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे लोग इस बीच दूसरों में इस वायरस को बांट नहीं सकते। आम तौर पर वे औरों में इस वायरस को बांटने का एक बहुत बड़ा खतरा लिए चलते हैं। जब तक वे खुद चलता-फिरता बम साबित न हो जाएं, तब तक किसी को यह पता नहीं लगता कि उनमें कोई खतरा भी है। फिर जिस हिंदुस्तान के लिए हम यह लिख रहे हैं, उस हिंदुस्तान में लोगोंं की समाज के प्रति जिम्मेदारी बहुत ही कम है, और यह बात कोरोना को बहुत पसंद भी आने वाली है। आज इस देश में महज कुछ सौ लोग कोरोना-पॉजिटिव कहे जा रहे हैं, जो कि हकीकत में दसियों हजार भी हो सकते हैं, और आने वाले दिन ऐसे भयानक हो सकते हैं जैसे कि हिंदुस्तान के इतिहास में सौ बरस पहले 1918 में देखने मिले थे, और उस वक्त एक बैक्टीरिया से फैले प्लेग ने एक करोड़ बीस लाख लोगों को तीन महीने में ही मार डाला था। अगले तीन महीने मौतों का आंकड़ा अगर इतना पहुंच जाए, तो क्या देश उसके लिए तैयार है? क्या इतनी जलाऊ लकड़ी भी देश में है? या क्या इतनी जमीन भी कब्रों के लिए है? और जिनको यह बात बढ़ा-चढ़ाकर लिखी जा रही लग रही हो, उन्हें 1897 का यह इतिहास याद रखना चाहिए कि भारत के कुछ गांवों में संक्रामक बीमारी की आशंका को हिंदुस्तानी आबादी घटाने की ब्रिटिश साजिश मान लिया था। और 1918 में ऐसी खबरें छपी थीं कि किसी फौजी जहरीली गैस के खुल जाने की वजह से हजारों मौतें हो रही हैं। कुछ उसी किस्म की साजिश की खबरें आज सौ बरस बाद फिर दुनिया की हवा में हैं, लोग चीन या अमरीका को ऐसी साजिश के पीछे मान रहे हैं।

हिंदुस्तान आज किसी भी बड़े संक्रामक-खतरे को झेलने की हालत में नहीं है। एक से अधिक विशेषज्ञों का यह मानना है कि पचीस-पचास करोड़ लोग कोरोनाग्रस्त हो सकते हैं, और लोगों को इलाज नसीब होना पूरी तरह नामुमकिन बात है। कुछ कमअक्लों का यह भी मानना है कि थाली और ताली बजाकर, या तिरंगा झंडा लहराकर कोरोना को डराकर भगाना कुछ मुश्किल होगा, और कोरोना इसे अतिथि देवो भव: वाले भारत में अपना स्वागत समारोह भी मान सकता है। ऐसे में आज जब पूरा देश बारूद के ढेर पर लापरवाही से बैठा हुआ बीड़ी पी रहा है, तो उसकी चिंगारी से तबाही कब होगी, और कितनी होगी इसका अंदाज हमारे लिए नामुमकिन है। ऐसे में कोरोना की आग को इस हिंदुस्तानी जंगल में और अधिक फैलने से रोकने की हमारी अपनी कोशिश के तहत हम हालात सामान्य होने तक आपके इस अखबार ‘छत्तीसगढ़’ को छापना स्थगित कर रहे हैं। बहुत से लोग कोरोना की दहशत में हंै, और उनकी समझ वैज्ञानिक भी है, और अवैज्ञानिक भी। ऐसे लोगों में से बहुत से लोगों ने हमारे हॉकरों से अखबार डालने को मना भी किया है। अखबार अपने समाचारों से तो असीमित तनाव लेकर जाता ही है, हमारे अखबार में विचार भी तनाव ही पैदा करने वाले रहते हैं। ऐसे में अखबार का कागज एक और कोरोना-तनाव लेकर जाए, यह भी कुछ ठीक नहीं है। अखबार बांटने वाले लोग आमतौर पर बहुत सीमित कमाई वाले रहते हैं, और उनकी सेहत बिगडऩे पर आने वाले दिनों में कोई इलाज मिलना भी मुश्किल होगा, इसलिए भी छपा अखबार कुछ दिनों के लिए बंद करना ही हमें बेहतर लग रहा है।

हिंदुस्तान में अब अधिकतर आबादी के पास फोन हैं, और आधी आबादी के पास स्मार्टफोन भी हैं। ऐसे में हम अपने नियमित पाठकों तक किसी न किसी तरह पहुंच ही जाएंगे, हर दिन पहुंचेंगे, हर कुछ घंटों में पहुंचेंगे, समाचार लेकर पहुंचेंगे, विचार लेकर पहुंचेंगे, और पूरे के पूरे पन्नों के ई-पेपर लेकर भी पहुंचेंगे। आने वाले दिन हमारे खुद के लिए सोचने के होंगे, लेकिन इतना तो हमने आज सोच लिया है कि धरती पर खतरे की इस आग को हम कम से कम बढ़ाने का काम तो नहीं करेंगे। देश के एक बड़े संपन्न अखबार ने अपनी छपाई-मशीनों पर ही अखबार छपते हुए ही उस पर सेनिटाइजर का स्प्रे करना शुरू किया है, और हो सकता है कि वैसा अखबार पाठकों के हाथों में कुछ सुरक्षित भी हो। लेकिन हिफाजत की किसी अटकल के बजाय हम पीछे बैठ जाना बेहतर समझ रहे हैं, जब तक कि हिंदुस्तान पर से करोड़ों मौतों का खतरा टल नहीं जाता। सब जिंदा रहेंगे तो छपकर पहुंचने के लिए भी बहुत लंबी जिंदगी बाकी रहेगी। फिलहाल हम कोरोना-खतरे को सीमित रखने की अपनी अखबारी-जिम्मेदारी पूरी करेंगे, और अखबारनवीसी भी जिंदा रखेंगे। आगे फिर किसी दिन छपकर आपके हाथ में पहुंचेंगे, तब तक फोन और कम्प्यूटर पर ही सही।
(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का विशेष संपादकीय, 24 मार्च)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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