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आइए, देखें दिल्ली सरकार के इस विज्ञापन में क्या नहीं है

-संजय कुमार सिंह।।

आज दिल्ली सरकार का एक विज्ञापन सभी अखबारों में प्रमुखता से छपा है और अच्छी बात है कि हिन्दी में (भी) है। इसका शीर्षक है, “कुछ एहतियात जो दें कोरोना को मात”। कहने की जरूरत नहीं है कि इसमें एहतियात ही बताए गए हैं और जिसे इनका पालन करना है वह कैसे करेगा इसपर शायद अभी सोचा ही नहीं गया है। इसमें पहली सलाह या एहतियात है, अगर आपको होम क्वारंटाइन या सेल्फ आइसोलेशन के लिए कहा जाए तो उसका अवश्य पालन करें।

सवाल यह है कि आपने तो होम क्वारंटाइन या सेल्फ आइसोलेशन के लिए कह दिया और यह जरूरी भी है। लेकिन एक व्यक्ति जो नौकरी पेशा है। जो कमाता है उसी से खर्च चलता है उसी से उसका परिवार चलता है वह होम क्वारंटाइन या सेल्फ आइसोलेशन के लिए कहे जाने का पालन कैसे करे? मान लीजिए वह अच्छी नौकरी में है, उसे छुट्टी मिल जाएगी और वेतन भी नहीं कटेगा। पर घर में वह बच्चों और माता पिता के साथ कैसे और कितना अलग रह पाएगा। आदर्श स्थिति में वह अपना काम खुद कर लेगा पर बच्चों और अभिभावकों के संपर्क में न आए यह कितना संभव है?

आम तौर पर लोग एक-दो कमरे के घरों में रहते हैं। जो साधारण नौकरी या धंधे में हैं उनकी हालत और बुरी है। काम न करें तो पैसे नहीं मिलेंगे। अगर पति – पत्नी दोनों काम करते हैं और दोनों घर पर हैं तो क्या बच्चे संपर्क में नहीं आएंगे। आदर्श स्थिति में सरकार कह सकती थी कि हमने सबका ठेका नहीं लिया है। नहीं रह सकता तो जाए मरे। पर अभी स्थिति ऐसी नहीं है। अगर वह अलग नहीं रहेगा तो अलग रहने के लिए कहने का कोई लाभ नहीं है। और यह सरकार तथा समाज का काम है कि उसका अलग रहना सुनिश्चित किया जाए। सरकार को इस बारे में सोचना होगा।

विज्ञापन में आगे कहा गया है, अगर फ्लू के लक्षण दिखाई दें जैसे बुखार, खांसी, जुकाम आदि हो तो 1. इसमें फोन नंबर दिए गए हैं और कहा गया है कि खुद अस्पताल न पहुंच जाए। उन नंबरों पर फोन करें। यह अच्छी बात है। जाहिर है, इसके बाद का काम फोन पर बात करने वाले का है। पर यह बताया नहीं गया है कि वह क्या-क्या करेगा और उससे क्या उम्मीद करनी है। नहीं करे तो क्या करना है। फोन करने के बाद कार्रवाई का इंतजार कितनी देर करना है।

यह काम की बात है। और ठीक सलाह है। थोड़ी देर के लिए तो संभव है। पर यह नहीं कहा गया है कि आपके लिए ऐसा करना संभव नहीं हो तो क्या करना है? जैसे कोई एक ही कमरे में रह रहा हो तो अलग कमरे में कैसे रहेगा। तौलिया साबुन शेयर नहीं करना भी साधारण नहीं है। अभी स्थिति गरीबों तक नहीं पहुंची हो पर जब पहुंच जाएगी तो वे क्या करें? या घर में न हो तो कैसे मंगाए। और भी सार्थक सलाह हैं पर सबके लिए इनका पालन संभव नहीं है। इनके साथ यह लिखा जाना चाहिए कि आपके लिए यह संभव नहीं हो तो किसी अस्पताल या क्वारंटाइन केंद्र में दाखिल हो जाएं। परिवार की जरूरतें कैसे पूरी हों इस बारे में भी विज्ञापन शांत है। ऐसे में लोग मजबूरी में सहायता नहीं मांगेगे, बीमारी छिपाएंगे। विज्ञापन को इस दिशा में भी जानकारी देनी चाहिए थी। संभव है, अभी सरकार की तैयारी नहीं हो इसलिए नहीं बताया गया है और आगे बताया जाएगा। पर यह काम जल्दी होना चाहिए।

दिल्ली सरकार यह सब कर दे तो बाकी राज्य सरकारों से उम्मीद की जाए। मुझे लगता है कि इस स्थिति में सरकार को यह पेशकश भी करनी चाहिए कि आपको पैसों की जरूरत हो तो वह भी बताइए। बिना मांगे देने से अच्छा है कि जो मांगे उसे दिया जाए। भले खाते में दिया जाए और जो सक्षम हैं उन्हें इस शर्त पर दिया जाए कि वे वापस कर देंगे। अभी बिलों की वसूली टालने के साथ यह पेशकश भी जरूरी है। गरीबों को जिनका खाता नहीं है उनके लिए भी नकद की बजाए आवश्यक सामन मुहैया कराने की व्यवस्था की जा सकती है। इसके बिना बीमारी फैलेगी और तब नियंत्रण मुश्किल होगा। खर्च ज्यादा होगा और प्रभावित ज्यादा होंगे। इसका नुकसान जीडीपी और अर्थव्यवस्था पर भी होगा।

दिल्ली सरकार ने बहुत सारे फोन नंबर लिखे हैं पर यह नहीं बताया है कि इन नंबरों पर किस लिए फोन करें। अगर कोई घर पर अकेला है या कोई ऐसा नहीं है जो उसे अस्पताल ले जा सके (जाना है यह तय होने के बाद) तो वह किससे सहायता मांगे? क्या करे। ऐसी और भी जरूरतें हैं जो व्यापक जनहित में पूरी की जानी चाहिए और यह सेवा कोरोना पीड़ित के लिए ही नहीं सबके लिए होगी।

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