जनता कर्फ्यू के नाम पर सरकारी अत्याचार, वीडियो देखें..

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-कुमार सौवीर।।

अब तो सरकार ही बताये कि उसने कोरोना-संक्रमण को रोकने के लिए जनता में जान-जागरूकता के लिए जनता-कर्फ्यू का आह्वान किया था, या जनता-कर्फ्यू के नाम पर सरकारी-उत्पीड़न की कार्रवाई।

जनता कर्फ्यू के नाम पर जनता पर लाठियां बरसाती पुलिस


मत भूलिए कि इस महामारी को रोकने के लिए सरकार ने पिछले तीन महीनों तक नागरिकों को सिर्फ रिंगटोन ही सुनाई थी, कोई ठोस प्रयास नहीं। और अब लाठियां बरसाई जा रही हैं नागरिकों को। सच बात तो यही है कि समय रहते सरकार चेत जाती, तो हालत इतनी बदतर नहीं होती।


सरकार ! कोरोना को लेकर नागरिक खुद बहुत संवेदनशील है। सरकारी या प्रशासनिक कोशिशों से लाख गुना बेहतर तरीके से। जानलेवा भय, आशंका,और सुरक्षा को लेकर आम आदमी खुद ही बेहाल है। शनिवार से ही लखनऊ खामोश होने लगा था। जो भी इक्का-दुक्का बाहर निकले भी, वे बहुत मजबूरी में ही। चाहे वह राशन हो, बच्चों के लिए दूध या फिर दवाओं के लिये व्याकुल थे।


ऐसी हालत में अपने नागरिकों को लाठियों से मत अपमानित कीजिये। अपनी लापरवाहियों पर शर्म व्यक्त कीजिये, नागरिकों के घावों पर मलहम लगाइए, और ठोस रणनीति बना कर लागू कीजिये।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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