यह कडवा सच है..

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-पंकज चतुर्वेदी।।


शाहीन बाग़ आन्दोलन पहले जैसा रहा नहीं . इसमें लोगों की आमद भी कम है , जो लोग पहले एक बड़े जन आन्दोलन का हिस्सा बनने शामिल हो रहे थे, उनकी सलाहों को अपनी जिद से कुचलने और उन्हें संघी तक कहने से बड़ी संख्या में लोग आहत हैं
अभी वे चेहरे सामने नहीं आ रहे जो इस आन्दोलन के कथित संचालक है , वे यह नहीं समझ रहे कि अकेले दिल्ली ही नहीं सारे देश में यह आन्दोलन अब ठीठक गया है , यही नहीं इसके चलते जे एन यु का सस्ती उच्च शिक्षा का आन्दोलन, जामिया छात्रों पर भयानक पुलिस अत्याचार की जाँच की मांग भी परदे के पीछे चली गयी । उस समय भी यह बात उठी थी कि जे एन यू के आंदोलन को मोथरा करने के लिए साजिशन जामिया में छात्रों को उकसाया गया था।

दुर्भाग्य यह है कि दिल्ली में दंगे हुए और खुरेजी में धरना संचालित कर रहे लोगो के पुलिस ने हाथ पैर तोड़ दिए, कल ही उन लोगों को पुलिस ने दिल्ली में दंगे का प्रमुख षड्यंत्रकारी बना कर पेश कर दिया . यह समय ऐसे बेगुनाहों के साथ खड़े होने का है लेकिन धरने के नाम पर इसकी कड़ी निंदा तक नहीं हो रही .
नोबल करोना के खतरे के बीच गैर वैज्ञानिक कुतर्क कर धरने पर बैठे लोग, वैज्ञानिक गौहर रजा तक की बात मान नहीं रहे।
जेल में रही और बुरी तरह पिटी सदफ जफर और एस आर दारापुरी को भी नहीं मान रहे । सबा नकवी और गज़ाला को सुनने को राजी नहीं।
फिर आखिर वे किसकी सलाह पर हैं?
क्या यह नहीं मान लिया जाए कि अब यह आन्दोलन ऐसे लोगों के हाथों में है जिनकी या तो बहुत बड़ी राजनितिक महत्वकांक्षाएं हैं या फिर वे मुस्लिम मंच जैसे संगठनो की शह पर हैं । यह आंदोलन अभी विधान सभा चुनाव में जिन मुस्लिम विधायकों की जीत का माध्यम बना, वे विधायक भी ताहिर हुसैन के साथ तो ठीक कपिल मिश्रा के खिलाफ नहीं खड़े हो रहे।

हमने आज से खुद को शाहीन बाग़ आन्दोलन से अलग कर लिया।
फ़िलहाल पुलिस द्वारा फर्जी मामलों ने फंसाए गए लोगों के लिए काम करना, दंगे में उजड़ गए लोगों को मदद करना ही जरुरी है . तर्कहीन जिद से इन्कलाब नहीं आते — इसके लिए जज्बा चाहिए और उसके लिए पीछे पलट कर देखना होता हैं।

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