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-सुनील कुमार।।
हिन्दुस्तान में कई बरस से वरिष्ठ नागरिकों, 58 बरस से अधिक की महिला और 60 बरस से अधिक के पुरूष को रेल टिकट में रियायत मिलते आई है। अभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उसे स्थगित किया है क्योंकि इस उम्र और इससे अधिक के बुजुर्गों पर कोरोना का हमला अधिक हो रहा है। इस बात को लेकर मोदी का मजाक भी बनाया जा रहा है कि कोरोना के बहाने से उन्होंने सरकार की बचत कर ली, लेकिन क्या यह सचमुच अकेले सरकार की बचत है? 58-60 बरस या उससे अधिक के बुजुर्गों का तीर्थयात्रा, पारिवारिक समारोहों, या इलाज के लिए सफर से परे और कौन सा आना-जाना होता है? अब इसमें से इलाज के लिए जाने पर तो पूरा मामला ही खर्चीला रहता है इसलिए रेल टिकट की रियायत बहुत मायने नहीं रखती। लेकिन जो बुजुर्ग सैलानी घूमने के शौकीन हैं, या पारिवारिक समारोहों में जा रहे हैं, उन्हें अगर रियायत कुछ वक्त के लिए रोकी जा रही है, तो यह खुद उन्हीं की सेहत के लिए बेहतर है। आज जब इटली जैसे संपन्न और विकसित देश में बुजुर्गों का कोरोना का इलाज भी नहीं हो रहा है क्योंकि उनकी बाकी जिंदगी कम हैं, और अस्पतालों की क्षमता का बेहतर इस्तेमाल अधिक बाकी उम्र वाले जवानों के लिए किया जा रहा है, तो बाकी दुनिया के लोगों को भी जिम्मेदारी से सोचना चाहिए। आज जब खेलों के टूर्नामेंट रद्द हो रहे हैं, जब जवानों की ट्रेनिंग रद्द हो रही है, सरकारी और निजी दफ्तर सबको जबरिया छुट्टी दे रहे हैं, तो बुजुर्ग क्यों इस बात पर अड़े रहें कि वे रियायती सफर करेंगे ही। मोदी की आलोचना की सौ दूसरी वजहें मिल सकती हैं, लेकिन यह रियायत खत्म करना तो उन बुजुर्गों को, उनके परिवारों को, और कुल मिलाकर देश को कोरोना जैसी जानलेवा बीमारी से बचाना है, और इस बात का मखौल नहीं उड़ाना चाहिए।

दूसरी तरफ प्रधानमंत्री के भाषण को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। इनमें से अधिकतर बातें तो लोग अपने पूर्वाग्रह के मुताबिक कर रहे हैं जो कि भाषण का प्रसारण होने के पहले भी विशेषण तैयार लेकर बैठे थे, कुछ लोग तारीफ के विशेषण, और कुछ लोग निंदा के विशेषण। इन दोनों तबकों के तर्कों को छोड़ दें, तो कुछ बुनियादी बातें बचती हैं जो कि प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संदेश पर सवाल खड़े करती हैं। जब वे देश को भीड़ से बचने को कहते हैं, तब उन्हीं के चुनाव क्षेत्र वाले उत्तरप्रदेश में, उन्हीं के पार्टी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ रामनवमीं पर अयोध्या में दस लाख लोगों का मेला करवाने पर उतारू हैं। उन्हीं की पार्टी के नेता भोपाल में कमलनाथ सरकार गिराने की खुशी में जलसे की भीड़ लगा रहे हैं। जब उन्हीं के लोग उनकी बातों को अनसुना करते हैं, तो लोगों को लगता है कि उनकी बंदिशें क्या महज दूसरे लोगों के लिए हैं, या फिर उनकी पार्टी की कथनी और करनी के बीच रिश्ता कभी होता है कभी नहीं होता है? यह भी बेहतर होता कि प्रधानमंत्री उनकी पार्टी के बहुत से नेताओं के इन दावों पर कुछ बोलते कि गोमूत्र से कोरोना-चिकित्सा के इलाज के दावों पर जनता भरोसा न करें। प्रधानमंत्री की हैसियत से उनकी यह जिम्मेदारी बनती है कि वे अवैज्ञानिक बातों को रोकें, न कि उन्हें देखते हुए भी उन पर चुप रहें।

छत्तीसगढ़ में आम लोग लगातार शराब दुकानों के वीडियो पोस्ट कर रहे हैं कि वहां किस तरह की भीड़ लगी हुई है। जाहिर तौर पर जो गरीब हैं वे इस भीड़ में अधिक हैं, अधिक धक्का-मुक्की, छीनाझपटी कर रहे हैं, और शराबी-गरीब होने की वजह से उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता जाहिर तौर पर खासी कम होती है। कोरोना के लिए इस राज्य की शराब दुकानें, और वहां की अराजक भीड़ एक चुनौती है, और कोरोना वायरस खासा जिद्दी कहा जा रहा है। अब सरकार इस प्रदेश में होटल-चायठेले, फेरीवाले और सिनेमाघर सब कुछ बंद करवा चुकी है, वहां पर शराब को जिंदगी के लिए इतना अनिवार्य मानकर उसके लिए भीड़ का खतरा उठाकर कमाई कितनी जायज है? छत्तीसगढ़ सरकार की बाकी तमाम सावधानी शराब दुकानों पर धरी रह जा रही है, और राज्य सरकार को इस पर तुरंत फैसला लेना चाहिए, इन्हें बंद करना चाहिए। लेकिन इस राज्य में शराब दुकानें भी चल रही हैं, और शराबखाने भी चल रहे हैं। लोगों का रोजगार छूट गया है, रोजी-मजदूरी वालों के घर में खाने की दिक्कत है, और ऐसे में नशे के आदी लोगों के लिए शराब दुकान खोलना, कम से कम गरीब शराबियों के परिवारों पर तो बहुत बुरी मार है। छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जनता कफ्र्यू के आव्हान का खुला समर्थन किया है, और बयान दिया है कि कोरोना रोकने की उनकी तमाम कोशिशों का छत्तीसगढ़ साथ देगा। भूपेश बघेल को खुद होकर राज्य में कुछ वक्त के लिए शराबबंदी करनी चाहिए।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 21 मार्च 2020)

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