Home अखबारों ने थाली घंटा बजाने की अपील से ज्यादा महत्व जनता कर्फ्यू को दिया

अखबारों ने थाली घंटा बजाने की अपील से ज्यादा महत्व जनता कर्फ्यू को दिया

-संजय कुमार सिंह।।


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कल की घोषणा में क्या नहीं था से अलग, आज हिन्दी के ज्यादातर अखबारों ने रविवार को जनता कर्फ्यू की खबर को लीड बनाकर अपना काम पूरा कर लिया है। यह सबसे आसान था। सिर्फ नवोदय टाइम्स ने इसे अलग ढंग से प्रस्तुत किया है और उसका शीर्षक है, नवरात्र से पहले पीएम के नौ आग्रह। भले ही इस खबर में कहा नहीं गया है पर शीर्षक से ही स्पष्ट है कि कोरोना वायरस की तैयारी के रूप में प्रधानमंत्री की उम्मीद जनता से ही है और वह नौ आग्रह के रूप में सामने आया या रखा गया है। अगर किसी भाषण की सबसे महत्वपूर्ण बात को प्रमुखता देने और उसी को शीर्षक बनाने का रिवाज है तो जनता कर्फ्यू लगाने की अपील की तरह ये नौ आग्रह भी कम नहीं हैं। इन्हें पढ़ते ही लगता है कि सब कुछ जनता करे, सरकार क्या करेगी? वैसे तो जनता कर्फ्यू में भी यही बात है पर जब भाषण में कुछ था ही नहीं तो अखबार वाले भी क्या करते। और भाषण में कुछ नहीं था इसका पता केरल सरकार की घोषणाओं और योजनाओं से भी लगता है। अखबार वाले उसे भी प्रमुखता से छापते तो प्रधानमंत्री के हार्डवर्क का पता चलता लेकिन अब उसकी उम्मीद कोई नहीं करता है।
केरल की खबरें वैसे तो दिल्ली में पहले पन्ने पर छापने का कोई रिवाज नहीं है। पर केरल सरकार ने कोरोना से बचाव और निपटने के लिए जो तैयारियां की है वह निश्चित रूप से प्रशंसनीय है और भारत सरकार की आठ बजे की घोषणा की तुलना में केरल की तैयारियों की जानकारी भी पाठकों को होनी चाहिए ताकि वे सरकार के काम को जान तो सकें। अभी लोग यही समझते हैं कि सरकार बेचारी क्या करेगी। पर सरकार चाहे तो क्या कर सकती है यह नहीं बताया जाएगा तो पाठक अपने अधिकार भी नहीं जानेंगे। हिन्दी के हमारे अखबार इस तरह से काम करके और बिना किए भी सरकार की अच्छी सेवा कर रहे हैं। वैसे, हिन्दुस्तान ने भी आज प्रधानमंत्री के नौ आग्रहों को प्रमुखता से छापा है। ताली, थाली और घंटी बजाकर कृतज्ञता जताने की नरेन्द्र मोदी की अपील को सिर्फ राजस्थान पत्रिका ने प्रमुखता दी है। दैनिक भास्कर ने इस हिस्से का शीर्षक लगाया है, “इस रविवार शाम जरूरी सेवाओं में जुटे लोगों को सैल्यूट करें प्रधानमंत्री”। ताली, थाली और घंटी बजाने के पुरातन तरीकों के उपयोग की सलाह को लगभग किसी अखबार ने प्रमुखता नहीं दी है।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने शेम-शेम के नारों के बीच शपथ ली यह खबर भी नवोदय टाइम्स में ही पहले पन्ने पर पांच कॉलम में है। दैनिक जागरण में पहले पन्ने पर छह कॉलम में छपी इस खबर का शीर्षक है, “गोगोई की ‘शपथ’, एक दिन मेरा स्वागत करेंगे आप”। लगभग ऐसा ही शीर्षक दैनिक भास्कर में है। पर यहां यह खबर सिंगल कॉलम में है। दैनिक जागरण की खबर है, “विपक्ष के जबरदस्त विरोध, नारेबाजी व वाकआउट के बीच गोगोई ने गुरुवार को राज्यसभा सदस्य के तौर पर शपथ ली। कांग्रेस की अगुआई में कई विपक्षी दलों ने गोगोई के शीर्ष न्यायपालिका के पद के साथ समझौता करने का आरोप लगाया। संसदीय इतिहास में यह शायद पहला मौका था जब किसी सदस्य ने इतने विरोध के बीच शपथ ली हो। विरोध के सुर इतने तीखे और अप्रत्याशित थे कि विपक्षी सदस्यों ने उनके सामने ही शर्म-शर्म के नारे लगाए। सदन में असहज दिखने के बावजूद शांत बने रहे गोगोई ने बाहर यह कहते हुए विपक्ष को जवाब देने की कोशिश की कि ‘जल्द ही वे उनका स्वागत करेंगे और स्नेह भी करने लगेंगे।’”
राजस्थान पत्रिका में इस खबर का शीर्षक है, गोगोई ने ली शपथ, विपक्ष चिल्लाया शेम-शेम। ऐसे में इस खबर को पहले पन्ने पर नहीं छापने वाले अखबार हैं, हिन्दुस्तान, नवभारत टाइम्स। दोनों में पहले पन्ने पर ही नहीं, खबरों के पहले पन्ने पर भी आधे से ज्यादा विज्ञापन है। दैनिक भास्कर में थोड़ा विज्ञापन है और इस तरह कहा जा सकता है कि रंजन गोगोई की खबर अगर नहीं छपी है या छोटी छपी है तो कारण विज्ञापन ही है। पर वह अलग मुद्दा है। मुख्य मामला तो शीर्षक का है और देखिए वह कैसे रंग बदलता है। हिन्दी में अक्सर खबरें लचर लिखी हुई होती हैं और जब खबर ठीक हो तो शीर्षक लचर या चापलूसी वाला। आखिर पाठकों को कौन बताएगा कि सरकार से भी कुछ अपेक्षा होती है। और केंद्र सरकार या डबल इंजन की सरकारें कुछ करें या नहीं केरल सरकार कैसे काम कर रही है और कोरोना से निपटने की क्या तैयारी है। केंद्र सरकार की तैयारी जो है सो है। थाली घंटा बजवाने की भी है और अखबारों ने इसे प्रमुखता नहीं दी।

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