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उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार के तीन साल पूरे होने पर मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने अपनी सरकार की उपलब्धियों का लंबा-चौड़ा बखान किया और कहा कि प्रदेश में लोकतांत्रिक मूल्यों और आदर्शों पर आम जन का विश्वास खत्म हो रहा था, उसे बहाल करते हुए उसे सुशासन की तरफ ले जाने में सफलता मिली है। लेकिन योगीजी के ये दावे अपनी पोल खुद ही खोल रहे हैं। खासकर जब सवाल लोकतांत्रिक मूल्यों का हो। एक स्वस्थ लोकतंत्र में असहमति की आवाज के लिए हमेशा सम्मानजनक स्थान होता है। लेकिन माननीय योगी, मोदी, शाह सब इस कसौटी पर नाकाम दिख रहे हैं। जिस तरह केंद्र सरकार देश भर में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ उठ रही आवाज को दबाने में लगी है। विरोध करने वालों के खिलाफ तरह-तरह के पैंतरे आजमा रही है। वही सब उप्र  में होता नजर आ रहा है। यहां सीएए के विरोध में आवाज बुलंद करने वाले लोगों का योगी सरकार किसी भी तरह दमन करना चाहती है। सरकार ने इसे झूठे अहंकार का प्रश्न बना लिया है। पिछले साल 19 दिसंबर को लखनऊ में सीएए के खिलाफ हुई हिंसा के लिए कथित तौर पर दोषी लोगों से संपत्ति वसूली का ऐलान योगी सरकार ने किया था। 57 लोगों को सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान को लेकर 1.55 करोड़ रुपये की वसूली के नोटिस भेजे गए थे।  इन्हें 30 दिनों के भीतर जुर्माना और ऐसा नहीं करने पर उनकी संपत्ति जब्त करने को कहा गया था। और अब इनमें से 13 लोगों को रिकवरी नोटिस भेजा गया है, जिस में कहा गया है कि इन प्रदर्शनकारियों को हर्जाने से इतर अतिरिक्त 10 फीसदी की राशि एक सप्ताह के भीतर जमा करनी है। ऐसा नहीं करने पर जेल की सजा भुगतनी पड़ेगी। इससे पहले सरकार ने जिनसे संपत्ति वसूली का ऐलान किया था, उनके पोस्टर भी लगवा दिए थे, मानो ये शांतिपूर्ण धरना करने वाले लोग नहीं हैं, पेशेवर अपराधी हैं। प्रदर्शनकारियों के सरेराह पोस्टर लगाने के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार को फटकार लगाई थी, और 16 मार्च तक स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा था। 16 मार्च को सरकार की ओर से स्टेटस रिपोर्ट तो दाखिल की गई लेकिन इस दौरान राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को न सिर्फर्  सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी बल्कि पोस्टर लगाने संबंधी एक अध्यादेश भी पारित कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर स्टे लगाने की बजाय इसे बड़ी बेंच को सौंप दिया। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को बड़ी बेंच को भेजने से पहले राज्य सरकार से यह सवाल भी पूछा है कि उन्होंने किस कानून के तहत ये पोस्टर लगाए हैं। फिलहाल ऐसा कोई कानून नहीं है कि संपत्ति वसूली करने वाले लोगों की तस्वीरों और उनके नाम-पते के साथ पोस्टर लगाए जाएं, इसलिए सरकार आनन-फानन में एक अध्यादेश भी लेकर आ गई। यह जरूर है कि  सुप्रीम कोर्ट ने साल 2011 में एक फैसले में कहा था कि यदि किसी प्रदर्शन या विरोध के दौरान सरकारी या निजी संपत्ति को नुकसान होता है तो इसे रोकने के लिए कड़े नियम बनाए जाने चाहिए।  
यूपी  सरकार ने इस संबंध में एक शासनादेश जारी कर रखा था और उसी के तहत लोगों को वसूली से संबंधित नोटिस दिए गए थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह तो नहीं कहा था कि जिन से वसूली करनी हो उन्हें पेशेवर अपराधियों की तरह समाज में पेश किया जाए, सवाल ये भी है कि डेढ़ करोड़ रुपये की वसूली के लिए सरकार इतनी सख़्त और इतनी आक्रामक क्यों नजर आ रही है? बेशक एक आम आदमी के लिए डेढ़ करोड़ की रकम बहुत बड़ी होती है। लेकिन सरकारें तो अपने कामों का ढिंढोरा पीटने के लिए सैकड़ों करोड़ पानी की तरह बहा देती हैं। कई बार सरकारों की लापरवाही से जनता के पैसे की बर्बादी होती है। तो क्या उसका हर्जाना सरकार से नहीं वसूला जाना चाहिए? बहरहाल, फिलहाल योगी सरकार का यूं पोस्टर लगाना या अध्यादेश जारी करना, यही साबित करता है कि वह अपने विरोधियों को डराना चाहती है। यह संदेश देना चाहती है कि उसके खिलाफ आवाज उठाने वालों को तरह-तरह से परेशान करने की शक्ति उसमें है। लेकिन योगी सरकार को यह याद रखना चाहिए कि यह शक्ति उसे जनता से मिली है। जो समय आने पर वह वापस भी ले सकती है।

(देशबन्धु में आज का संपादकीय)

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