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-विष्णु नागर।।

हम यानी हम भारतीय ही नहीं, लगभग पूरी दुनिया के लोग एक असाधारण समय में रह रहे हैं-कोरोना- समय में। आज तक यह होता आया है कि साधारण व्यक्ति ही हर आपदा से डरता था,अब असाधारण,साधारण से अधिक डरे हुए हैं।पहले बेहद ताकतवरों को बंदूक-बमों, मशीनगनों, विस्फोटकों से डर लगता था।उससे सुरक्षा के उन्होंने असाधारण से असाधारण प्रबंध कर रखे हैं, फिर भी इक्का- दुक्का कभी शिकार हो जाते हैं। कुछ दिनों पहले तक यही स्थिति थी।अभी भी वे सब सुरक्षाएँ उनके पास हैं मगर कोरोना एक ऐसा शत्रु है,जिससे निश्चित रूप से कोई सुरक्षित नहीं।सुरक्षाकर्मी तो इससे उन्हें सुरक्षा देने में बिल्कुल असमर्थ हैं क्योंकि वे इस शत्रु से अपनी रक्षा करने में स्वयं असमर्थ हैं। दुनिया के कुछ ताकतवरों के घरों के अंदर तक कोरोना घुसकर उन्हें भयभीत कर चुका है। आपने हमारे प्रधानमंत्री को इतना असुरक्षित, इतना भयभीत कभी नहीं देखा होगा, जितने वह आज हैं।खुद डरे हुए हैं मगर देशवासियों को भरोसा दिलाने की विडंबना उन्हें झेलनी पड़ रही है!

आज हर वह आदमी आपको संदिग्ध लगने लगा है,जो विदेश से आया है या विदेश से आए लोगों से मिल कर आया है। हमारा सम्माननीय पहली बार संदिग्ध लग रहा है।वह जो आपसे मिलने आना चाहता है, जो आपके पास से गुजर रहा है, जो किसी दूकान में आपकी तरह सामान खरीदने आया है, वह आपको और आप उसे संदिग्ध नजर आ रहे हैं। कुुछ लोग तो अपना सुख- आराम भूलकर अपने नौकर -चाकरों से भी डर रहे हैं कि कहीं वे कोरोना के किटाणु अनजाने में उनके घर न ले आएँ। उनकी जान के लिए खतरा न बन जाएँ। लोग सफर करना भूल चुके हैं, एकदूसरे से मिलना भूल चुके हैं,घरों में कैद रहना सीख रहे हैं। हाथ मिलाना अब अपराध सा हो गया है। सड़कें सूनी रहने लगी हैं। हवाई जहाज लगभग खाली जा रहे हैं।रेलें घाटे में चल रही हैं और कई मार्गों पर इन्हें बंद करने के लिए कह दिया गया है। सेंसेक्स महोदय डूबते हैं, फिर उबरते हैं, फिर डूब जाते हैं। कितनों की साँसें कोरोना सेे ज्यादा सेंसेक्स में अटकी हुई हैं। अंबानी टाइपों की हालत कभी इतनी खस्ता न रही होगी, जितनी आज है।कमाई से ज्यादा उन्हें घाटा हो रहा है।आगे चलकर सरकार हम पर टैक्स लगाकर, उन्हें छूट देकर उनके घाटे की पूर्ति करेगी।इसके लिए तैयार रहिए।मजदूर- किसान भूखा मर सकता है, मरने लगा है लेकिन एशिया का सबसे बड़ा पूँजीपति मुनाफा कमाए बगैर जिंदा नहीं रह सकता! उसे घाटे में जीने की आदत नहीं है।

मध्यवर्गीय तो फिर भी काफी हद तक बच जाएँगे। अगर खतरा और बढ़ा तो गरीब टपाटप मरेंगे और उनकी परवाह कौन करेगा?कब की है,जो अब करेगा?

मैंने अपनी स्मृति में इतना बुरा राजनीतिक समय भी पहले नहीं देखा था और इतना बुरा कोरोना- समय भी।1962,1965,1971 के युद्ध के समय भी शत्रु का ऐसा भय नहीं था,बल्कि लड़ने का संकल्प था।आगे भी भय का यह सिलसिला बना रह सकता है।न राजनीति हमें बख्शेगी, न प्रकृति।एक का शिकार वे और अधिक होंगे,जो आज तक होते आए हैं,दूसरे के शिकार ताकतवर भी हो सकते हैं,हालांकि ताकतवरों के तौरतरीके, उनका लालच,उनके स्वार्थ की दुनिया नहीं बदलेगी।वे दोतरफा बोलेंगे, एक तरफा करेंगे।

चलो फिर भी जियें, कुछ अच्छी बातें करें। बुरे और बुरे समय में जीने का अभ्यास करें।

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