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राज्यसभा में सीटें बढ़ाने के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों जोर आजमाईश कर रहे हैं, जिसके कारण देश में सियासी हलचल तेज हो गई है और अब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई का नाम राज्यसभा के लिए मनोनीत कर इस हलचल को और बढ़ा दिया है। सेवानिवृत्ति के बाद सरकार की ओर से किसी आयोग, समिति का मुखिया नियुक्त करना अनोखी बात नहीं है। राजनैतिक दलों ने सत्ता में आने के बाद अपने पसंदीदा पूर्व न्यायाधीशों, या नौकरशाहों को कई बार इस तरह उपकृत किया है। लेकिन इस बार सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि सेवानिवृत्ति के महज तीन महीने बाद रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया है। विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह राम मंदिर का प्रसाद है।

गौरतलब है कि पिछले साल नवंबर में ही राम मंदिर विवाद का फैसला हिंदू पक्ष के हक में आया था, तब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने ही पांच न्यायाधीशों की पीठ का नेतृत्व किया था।  उसी माह वे रिटायर भी हो गए थे। अयोध्या विवाद के अलावा रंजन गोगोई को अनुच्छेद 370, तीन तलाक पर अध्यादेश और केरल के सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर उनके फैसलों के लिए भी जाना जाता है।

मुख्य न्यायाधीश बनने से पहले रंजन गोगोई तब भी चर्चा में आए थे जब उन्होंने तीन अन्य वरिष्ठतम जजों के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। इसमें उन्होंने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के कामकाज पर सवाल उठाए थे। इन सभी जजों ने जनता से न्यायपालिका को बचाने की अपील की थी। पिछले साल एक मामले की सुनवाई के दौरान भी उन्होंने कहा था कि एक मजबूत धारणा है कि रिटायरमेंट के बाद होने वाली नियुक्तियां न्यायपालिका की आजादी पर धब्बा हैं। जिस न्यायपालिका की आजादी के बारे में जस्टिस गोगोई अपने कार्यकाल में फिक्रमंद दिखते रहे हैं, अब उन्हीं पर यह सवाल उठ रहा है।

रंजन गोगोई का कहना है कि शपथ ग्रहण के बाद वे विस्तार से मीडिया को बताएंगे कि उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता क्यों स्वीकार की। वे अपने मनोनयन के राष्ट्रपति के फैसले को चाहे जिन तर्कों से सही ठहराने की कोशिश करें, यह नजर आ रहा है कि यह फैसला राजनीति से प्रेरित है। कांग्रेस का आरोप भी यही है। जिस पर भाजपा ने उल्टा कांग्रेस को ही घेरने की कोशिश की कि उसने भी पूर्व जस्टिस रंगनाथ मिश्रा को राज्यसभा भेजा था। 

हालांकि भाजपा ने इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि रंगनाथ मिश्रा कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा गए थे, उन्हें राष्ट्रपति ने मनोनीत नहीं किया था। जस्टिस मिश्रा 1991 में रिटायर हुए थे और करीब 7 साल बाद कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए थे, वे 1998 में राज्यसभा पहुंचे और 2004 तक सांसद रहे। वैसे सुप्रीम कोर्ट के जज या पूर्व मुख्य न्यायाधीश का राजनीतिक कनेक्शन नया नहीं है,  इसकी शुरुआत 1969 में ही जनसंघ ने की थी, जब पूर्व राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन के निधन के बाद राष्ट्रपति का चुनाव होना था और वी.वी. गिरी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में खड़े थे। ऐसे में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के.सुब्बाराव- जिन्होंने तीन महीने पहले ही अपने पद से इस्तीफा दिया था, उनको जनसंघ ने अपने उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में उतारा था।

हालांकि जस्टिस सुब्बाराव हार गए थे। इसके बाद 1983 में जस्टिस बहारूल इस्लाम को राज्यसभा के लिए नामित किया गया था।  वे उसी साल जनवरी में रिटायर हुए थे। तब इंदिरा गांधी की सरकार थी। जज बनने से पहले भी बहारूल इस्लाम 1962 से 1972 तक राज्यसभा के सांसद रह चुके थे। इनके अलावा जस्टिस एम. हिदायतुल्लाह को 1970 में  रिटायर होने के बाद सभी पार्टियों की सहमति से 1979 में उपराष्ट्रपति बनाया गया था। इससे पहले 1958 में रिटायर हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एमसी छागला को जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने अमेरिका में भारत का राजदूत बनाया और फिर यूनाइटेड किंगडम के भी वे उच्चायुक्त बनाए गए, बाद में वे सरकार में मंत्री भी बने, पहले उन्होंने शिक्षा और फिर विदेश मंत्री की जिम्मेदारी संभाली।

भाजपा के प्रवक्ता चाहें तो इन उदाहरणों को कुतर्कों में बदलकर अपना पक्ष मजबूत कर सकते हैं या चाहें तो हमेशा की तरह जनता के प्रति अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ सकते हैं। जब जस्टिस पी. सदाशिवम को 26 अप्रैल 2014 को देश के मुख्य न्यायाधीश के पद से रिटायर होने के बाद 5 सितंबर 2014 को मोदी सरकार ने केरल का राज्यपाल नियुक्त कर दिया था, तब भी ऐसे ही सवाल उठे थे, जिनके जवाब देना मोदीजी ने जरूरी नहीं समझा था। हालांकि उन्हें अपने पूर्व सहयोगी अरुण जेटली की बात याद कर लेना चाहिए।

2012 में बतौर नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने कहा था,कि  ‘मेरा सुझाव यह है कि रिटायरमेंट के बाद किसी नियुक्ति से पहले दो साल का अंतराल होना चाहिए। नहीं तो सरकार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से अदालतों को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका का सपना कभी पूरा नहीं होगा।’ फिलहाल तो यही नजर आ रहा है कि सरकार अदालत को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में न्यायपालिका से ही यह अपेक्षा है कि वह खुद को सत्ता के दबाव से मुक्त रखने की कोशिश करे। जनता अब भी इंसाफ और अपने हितों की रक्षा के लिए अदालत को आखिरी उम्मीद मानती है। उसकी इस उम्मीद को हर हाल में जिंदा रहना चाहिए। अन्यथा उसकी निराशा लोकतंत्र को ले डूबेगी।

(देशबन्धु में आज का संपादकीय)

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By admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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