कोरोना से समझें विज्ञान का महत्व..

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पूरी दुनिया में इस वक्त कोरोना वायरस का खौफ तारी हो चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे महामारी घोषित कर ही चुका है और अब दुनिया के तमाम देशों ने इसे गंभीरता से लेते हुए रोकथाम की कोशिशें शुरु कर दी हैं। वैसे अब जो उपाय किए जा रहे हैं, वह आग लगने के बाद कुआं खोदने जैसे हैं या फिर यह मानसिकता कि जो आग पड़ोस में लगी है, उसकी तपिश हम तक नहीं पहुंचेगी। तीन महीने पहले चीन में कोरोना वायरस से लोग बीमार होना शुरु हुए थे। तब वुहान के कुछ लोगों ने इस बारे में सरकार को सावधान करने के कोशिश की थी कि यह मामूली बीमारी नहीं है, इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं, लेकिन तब चीन की सरकार ने उनकी आवाज दबाने की कोशिश की। 34 बरस के डॉक्टर ली वेनलियांग भी इनमें से एक थे।

डॉ.वेनलियांग ने अपने साथी डॉक्टरों को भी बताया था कि स्थानीय सी फूड बाजार से आए सात मरीजों का सार्स जैसी बीमारी से इलाज किया जा रहा है। उन्होंने तब इससे सावधान रहने की चेतावनी दी थी, लेकिन बदले में उन्हें मिला पुलिस का उत्पीड़न। डॉ. वेनलियांग खुद कोरोना के मरीजों का इलाज करते-करते फरवरी में दुनिया से रुखसत हो गए। अगर तब चीन की सरकार ने उनकी बात सुनी होती तो दुनिया में लाखों लोगों के जीवन पर यूं संकट न आया होता। यह देखकर अफसोस होता है कि जो रवैया चीन का था, वही कमोबेश भारत का भी शुरु में रहा। हमारी सरकार शायद यह माने बैठी थी कि कोरोना का असर चीन में है, यहां तक वह नहीं पहुंचेगा। 12 फरवरी को कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने इस बारे में ट्वीट कर आगाह किया था कि हमारे लोगों और अर्थव्यवस्था के लिए कोरोना एक गंभीर खतरा है। सरकार इसे हल्के में ले रही है, समय रहते उपाय किया जाना जरूरी है।

राहुल गांधी का अक्सर मजाक बनाने वाली भाजपा ने इस ट्वीट को भी हल्के में ही लिया होगा, लिहाजा सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठे रही। मध्यप्रदेश जैसे कांग्रेस शासित राज्यों में सरकारों को अपदस्थ करने की तिकड़म भिड़ाती रही। उसका नतीजा आज पूरा देश भुगत रहा है। शेयर बाजार काला शुक्रवार देखने के बाद सोमवार को भी औंधे मुंह गिरा। कई राज्यों में कामबंदी जैसे हालात बने हैं। एहतियात के तौर पर सार्वजनिक स्थलों पर आवाजाही रोकी गई है। इसलिए सिनेमा हाल, रेस्तरां, पर्यटन स्थल, स्कूल, कालेज सब बंद हैं। बाजारों में सन्नाटा पसरा है। इन सबका असर पहले से लड़खड़ाई अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।

हिन्दी फिल्म उद्योग को आठ सौ करोड़ का नुकसान होने की आशंका है। यही हाल बाकी क्षेत्रों का भी होगा, जिनके बारे में आने वाले समय में पता चलेगा। अब सरकार इसे रोकने के उपाय कर रही है। जनजागरुकता अभियान चला रही है। छह साल से स्वच्छता अभियान में करोड़ों रुपए बहाने के बाद नए सिरे से साफ-सफाई की व्यवस्था हो रही है। मोदीजी का पीआर यह बताने में जुटा है कि कैसे विदेशों में फंसे भारतीयों को लाने का काम हमारी महान सरकार कर रही है। जबकि यह तो हर प्रधानमंत्री का दायित्व होता है। पहले भी खाड़ी युद्ध, अरब क्रांति आदि मौकों पर भारत सरकार ने ऐसा ही किया है।

मोदीजी ने कोरोना से मिलकर लड़ने के लिए सार्क देशों से वीडियो कांफ्रेंसिंग पर चर्चा भी की, हालांकि अपने देश के मुख्यमंत्रियों से इस मसले पर बात करने का वक्त उन्हें नहीं मिला है। इधर उनकी पार्टी के कुछ विधायक, सांसद और नेता कोरोना को अब भी शायद मजाक समझ रहे हैं या उन पर धर्म की पट्टी कुछ ऐसी बंधी है कि वे इसके इलाज को भी धर्म के जाल में उलझाना चाह रहे हैं।  

हाल ही में हिंदू महासभा ने गौमूत्र पार्टी रखी, जहां सबने गाय की पेशाब पीकर यह साबित करना चाहा कि कोरोना को इससे रोका जा सकता है। जिसे जो खाना-पीना है, वह खाए-पिए, हमारा संविधान इसकी इजाजत देता है, लेकिन यही संविधान वैज्ञानिक नजरिए को बढ़ाने की बात भी करता है। अब तक किसी डॉक्टर या वैज्ञानिक ने नहीं कहा कि हवन से, गौमूत्र पीने या उसके छिड़काव से या हनुमान चालीसा से कोरोना के संक्रमण को रोका जा सकता है। लेकिन भाजपा के कुछ नेता ऐसा कर चुके हैं या करने की सलाह दे रहे हैं। इधर अमेरिका, इजरायल जैसे देश कोरोना की दवा विकसित करने में लगे हैं। भारत में स्वास्थ्य मंत्रालय का कुछ दिनों पहले बयान आया था कि इसका टीका बनने में कम से कम डेढ़-दो साल का वक्त लगेगा। यानी वैज्ञानिक कोशिश कर रहे हैं, इसमें जितनी जल्दी कामयाबी मिलेगी, मानवता का उतना भला होगा। यही बात अब धर्मांध लोगों को समझनी है। जानलेवा बीमारियां धर्म देखकर नहीं फैलती हैं, न ही उनका इलाज ढूंढने वाले धर्म के आधार पर दवा ढूंढते हैं।

दुनिया भर में इस वक्त हिंदू, मुसलमान, ईसाई, सिख, पारसी, बौद्ध, जैन, किसी भी धर्म के वैज्ञानिक विज्ञान के आधार पर कोरोना का इलाज ढूंढने में लगे होंगे। जिसमें सफलता किसी भी धर्म के वैज्ञानिक को मिलेगी, लाभ सारी मानवता को होगा। जिन लोगों को वेदों में ही सारा विज्ञान नजर आता है और जो भगवान गणेश का सिर हाथी का होने को प्लास्टिक सर्जरी मानने का ज्ञान डॉक्टरों को देते हैं, हमारे ऐसे हुक्मरानों को अब विज्ञान आर वैज्ञानिक नजरिए का महत्व समझ लेना चाहिए।

(देशबन्धु में आज का सम्पादकीय)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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