चेहरा पहचानने वाली अमित शाह की टेक्नालॉजी को पछाड़ दे रही है वर्दी..

Sanjaya Kumar Singh
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वीडियो क्लिप में उत्पीड़कों को देखा जा सकता है पर केस ‘अज्ञात लोगों’ के खिलाफ है..

-संजय कुमार सिंह।।
आज द टेलीग्राफ में प्रकाशित इमरान अहमद सिद्दीक की खबर – 23 साल के फैजान की हत्या के लिए पुलिस ने ‘अज्ञात लोगों’ के खिलाफ मामला दर्ज किया है। वीडियो क्लिप में दिल्ली की सड़क पर फैजान की पिटाई करते पुलिस वाले देखे जा सकते हैं। उसके परिवार के लोगों का कहना है कि रिहा करने और अस्पताल में मौत होने से पहले उसे हिरासत में यातना दी गई थी। वीडियो की पुष्टि अल्टन्यूज ने भी की है। इसमें फैजान और अन्य युवा सड़क पर पड़े हुए हैं और पुलिस वाले उन्हें पीटते व लात मारते हैं तथा राष्ट्रगान गाने का आदेश देते हैं। यह दिल्ली में गए महीने हुए दंगे का वीडियो है और इसमें पुलिस वाले घायलों को आजादी देने का तंज भी कसते हैं।


फैजान की मां किस्मातून ने कर्दमपुरी स्थित अपने घर में द टेलीग्राफ से बात करते हुए कहा, पुलिस वालों ने मेरे बेटे की पहले सड़क पर और फिर हिरासत में बर्बर पिटाई की और बगैर किसी कारण के उसकी जान ले ली। उसका खून बह रहा था और पूरा शरीर नीला पड़ गया था। अब जब उसकी मौत हो गई है तो पुलिस अज्ञात लोगों पर मेरे बेटे की हत्या का आरोप लगा रही है। क्या मुझे कभी न्याय मिलेगा? फैजान के बड़े भाई नईम के पास केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के लिए एक प्रश्न है। उन्होंने कहा है कि दंगाइयों की पहचान करने के लिए चेहरा पहचानने वाली टेक्नालॉजी का उपयोग किया जा रहा है। नईम ने कहा, इस बात के साफ सबूत हैं कि फैजान को पुलिस वालों ने बार बार मारा-पीटा। इस टेक्नालॉजी के उपयोग से दोषी पुलिसवालों की पहचान करने में पुलिस क्यों नाकाम रही है। वे हत्यारों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। ज्योति नगर थाने से जब फैजान को हिरासत से छोड़ा गया तो परिवार वालों को बताया गया था कि हिंसा के दौरान भीड़ ने उसकी पिटाई की थी और जांच चल रही है।


द टेलीग्राफ ने इस संबंध में पुलिस के ज्वायंट कमिश्नर आलोक कुमार से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि फैजान और चार अन्य को हिसां के केंद्र जाफराबाद में भीड़ ने पीटा था। पुलिस उसे अस्पताल ले गई थी। अपने बयान में पांचों ने कहा था कि उनपर भीड़ ने हमला किया। इसलिए अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है और हमलावरों को पहचानने के लिए जांच चल रही है। यह बताने पर कि वीडियो में दिखाई दे रहा है कि पुलिस वालों ने उन्हें लाठी से मारा और एक को लात मारी तथा फैजान के परिवार ने हिरासत में यंत्रणा देने का आरोप लगाया है तो कुमार ने कहा, उन्हें पुलिस वालों ने नहीं पीटा था। भीड़ की पिटाई के बाद वे सड़क पर पड़े हुए थे और पुलिस वाले उन्हें अस्पताल ले गए।
उन्होंने आगे कहा, पुलिस वालों ने एकमात्र गलती यह की कि उनसे राष्ट्रगान गाने को कहा जो परेशान करने वाली बात है। इन पुलिसवालों की पहचान करने के लिए जांच चल रही है। फैजान के परिवार का कहना है कि पांचों युवक पुलिस की पिटाई के कारण सड़क पर पड़े हुए थे और पुलिस उन्हें अस्पताल नहीं ले गई बल्कि पुलिस हिरासत में उनकी फिर पिटाई की गई। नईम ने कहा, मेरे भाई को लोहे के सरियों से पीटा गया। उसके पैर और बांह टूटे हुए थे। पहले उसे सड़क पर पीटा गया और फिर पुलिस हिरासत में। उन्होंने कहा कि 26 फरवरी को पुलिस द्वारा छोड़े जाने के बाद परिवार के लोग फैजान को एक स्थानीय डॉक्टर के पास ले गए थे।
डॉक्टर ने एनडीटीवी से कहा था कि फैजान का रक्तचाप और नब्ज कम था और लगा कि उसे सिर में तथा आंतरिक चोटें लगी थीं। फैजान की 27 फरवरी को गुरु तेग बहादुर अस्पताल में मौत हो गई थी। जेसीपी आलोक कुमार ने इस बात से इनकार किया कि फैजान और अन्य को पुलिस हिरासत में रखा गया था। नईम ने शक जताया कि पुलिस ने फैजान को हिरासत में रखा जाना दर्ज ही नहीं किया है। उन्होंने कहा कि पुलिस ने जब फैजान को रिहा किया तो ना ही किसी रजिस्टर पर दस्तखत करने के लिए कहा और ना ही कोई मेमो जारी किया। फैजान को फिर ऐसा नहीं करने की सामान्य चेतावनी दी गई जो आमतौर पर दी जाती है।
कई वीडियो आए हैं जिसमें दिल्ली के दंगाइयों को पुलिस वाले समर्थन देते लगते हैं। या तो वे चुपचाप खड़े हैं और भीड़ को हुड़दंग करते देख रहे हैं और कुछ मामलों में दंगाइयों के साथ गए जब वे मुसलिम मोहल्लों में हमला कर रहे हैं। करीब से लिए गए एक वीडियो में फैजान और चार अन्य जख्मी सड़क पर पड़े दिखते हैं। इनमें से एक का खून बह रहा है और वह राष्ट्रगान की लाइनें सुनाने की कोशिश कर रहा है। एक पुलिस वाले को कहते सुना जाता है, अच्छी तरह गा। पुलिस युवाओं को गाने के लिए कहती और अपने डंडों से पीटती तथा गाली देती दिखाई दे रही है।


अल्ट न्यूज ने कहा कि उसने इस वीडियो की पुष्टि एक अन्य वीडियो से की है जो किसी छत से बनाया गया है। दूसरे वीडियो में एक जगह एक पुलिसवाला जमीन पर पड़े घायलों में एक को लात मारता दिख रहा है। पृष्ठभूमि में एक व्यक्ति कहता सुना जाता है, यह दिल्ली पुलिस नहीं है, ये आरएसएस के गुंडे हैं। वीडियो में एक पुलिस वाला अपने मोबाइल फोन पर इस घटना को रिकार्ड करता दिखाई देता है। संसद में चर्चा के दौरान अमित शाह ने दिल्ली पुलिस की भूमिका का बचाव किया था और दावा किया कि दंगों पर 36 घंटे में नियंत्रण पा लिया गया था। दिल्ली के लोगों ने कहा है और पत्रकारों ने देखा है कि भाजपा नेता कपिल मिश्रा के एक भड़काने वाले भाषण के बाद 23 फरवरी की रात हिंसा की शुरुआत कैसे हुई और 26 फरवरी को दोपहर बाद कम से कम 60 घंटे तक चलती रही।


अखबार ने नहीं लिखा है पर दिल्ली हाईकोर्ट में तीसरे वरिष्ठतम जज जस्टिस एस मुरलीधर ने बुधवार, 26 फरवरी को दिल्ली हिंसा मामले पर सुनवाई करते हुए दिल्ली पुलिस को जमकर फटकार लगाई थी और नफरत भरा भाषण देने वाले भाजपा नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था। उन्होंने कहा था, “दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली से मैं हैरान हूं। शहर में बहुत हिंसा हो चुकी है। हम नहीं चाहते कि दिल्ली फिर से 1984 की तरह दंगों का गवाह बने।” उनका उसी रात पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में तबादला कर दिया गया है। जज साब का विदाई समारोह ऐसा था जैसा पिछले 30 साल में नहीं देखा गया पर इसकी खबर भी हिन्दी अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं के बराबर छपी थी।

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Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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