जड़ से खत्म हो बीमारी..

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मध्यप्रदेश में कमलनाथ बने रहेंगे या कमल खिलेगा, ये सवाल इस वक्त सियासी गलियारों में जोर-शोर से गूंज रहा है। जबकि कायदे से सवाल यह उठना चाहिए था कि क्या देश में एक बार फिर संसदीय जनतंत्र का मखौल बनाने वाले कामयाब हो जाएंगे या संवैधानिक दायित्वों की थोड़ी बहुत मर्यादा बची रहेगी? शनिवार को पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ भाजपा का एक प्रतिनिधिमंडल राज्यपाल लालजी टंडन से मिला और महज 7 घंटे बाद आधी रात को राज्यपाल महोदय ने विधानसभा स्पीकर को पत्र लिखकर आदेश दिया है कि विधानसभा का सत्र 16 मार्च, 2020 को प्रात: 11 बजे प्रारंभ होगा और उनके अभिभाषण के तत्काल बाद एकमात्र कार्य विश्वास प्रस्ताव पर मतदान होगा।

विश्वासमत मत विभाजन के आधार पर बटन दबाकर ही होगा और अन्य किसी तरीके से नहीं किया जाएगा।  लेकिन उनके इस पत्र से दो सवाल खड़े हो गए हैं। पहला कि क्या राज्यपाल विधानसभा अध्यक्ष को निर्देश दे सकते हैं कि सदन की कार्यवाही किस तरह हो? वहीं दूसरा सवाल यह है कि राज्यपाल के पत्र में संविधान से ज्यादा भाजपा के लिए चिंता क्यों झलक रही है?

राज्यपाल के पत्र की भाषा देखकर ऐसा लगता है मानो भाजपा ने यह पत्र लिखा हो। वे मीडिया का हवाला देते हुए यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि शायद कांग्रेस सरकार ने बहुमत खो दिया है। इसलिए सोमवार को ही विश्वासमत हासिल करने कहा जा रहा है। जबकि कर्नाटक में जब ऐसे ही हालात बने थे तो येदियुरप्पा को पूरे 15 दिन का समय दिया गया था। मध्यप्रदेश के विस अध्यक्ष एनपी प्रजापति का यह हक बनता है कि वे विधायकों के इस्तीफे स्वेच्छा से हुए, या दबाव में दिए गए यह पता करते, लेकिन राज्यपाल महोदय ने उनके अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप किया। 

बहरहाल, कमलनाथ सरकार का भविष्य क्या होगा यह कल साफ हो जाएगा, क्योंकि आने वाले कुछ घंटों में अभी कई और चालें चली जाएंगी। देश दलबदल के इस खेल को देखने का आदी होते जा रहा है, जो खतरनाक है। दलबदल के इस खेल के लिए आयाराम-गयाराम का मुहावरा भी प्रचलित हो गया है। यह मुहावरा दलबदल के पर्याय के रूप में 1967 में उस वक्त मशहूर हुआ जब हरियाणा की हसनपुर (सुरक्षित) विधानसभा से निर्दलीय विधायक गयालाल  ने एक ही दिन में तीन बार पार्टी बदली। यह अपने आप में एक रिकार्ड था और अब उस रिकार्ड को तोड़ने की तैयारी की जा रही है।

1967 के बाद भाजपा और लोहियावादी नेताओं ने देश के कई राज्यों में कांग्रेस की सरकारों को गिराने के लिए दलबदल करवाए। उस समय मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र ने इंदिरा गांधी से अनुमति मांगी थी कि राज्यपाल से सिफारिश कर विधानसभा भंग करवाई जाए ताकि प्रदेश में दलबदल का खेल विफल हो जाए, लेकिन तब यशवंत राव चव्हाण की सलाह पर इंदिराजी ने यह अनुमति नहीं दी। श्री चव्हाण का मानना था कि हम किसी तरह सरकार बचा लेंगे। 

जाहिर है इसमें जोड़-तोड़ की भूमिका को बढ़ावा मिला। और एक गलत परिपाटी की शुरुआत हो गई। राजीव गांधी के शासनकाल में दलबदल कानून लाया गया। तब देशबन्धु ने अपने संपादकीय में आगाह किया था कि केवल कानून मात्र से कुछ नहीं होगा, क्योंकि इसके तोड़ निकाल लिए जाएंगे और आज हम यह अंदेशा सच होते देख रहे हैं। हमने तब कहा था कि विधानसभा भंग कराना ही एकमात्र उपाय है और हमारी आज भी सलाह यही है।

देश ने पिछले छह सालों में दलबदल और जोड़-तोड़ से सरकार बनाने के मोदी-शाह के खेल देखें हैं, अतीत में भी भाजपा ने इस तरह सत्ता पाई है और जब कांग्रेस को मौका मिला तो उसने भी इस खेल का हिस्सा बनने से गुरेज नहीं किया। इसमें बेशक राजनैतिक दलों को लाभ मिला हो, लेकिन संसदीय जनतंत्र, संवैधानिक मर्यादा और जनादेश का अपमान ही हुआ है। अगर लोकतंत्र बचाना है तो इसके लिए थोड़ी हिम्मत दिखानी होगी। मध्य प्रदेश से इसकी शुरुआत की जा सकती है।

मुख्यमंत्री कमलनाथ को अपने साथ के सारे विधायकों से इस्तीफा लेना चाहिए, ताकि सरकार भंग करने की सिफारिश हो और मध्यावधि चुनाव का मार्ग प्रशस्त हो। इसके बाद चाहे जीत मिले या हार, जनता की अदालत में दलबदल करने वाले विधायकों का फैसला हो जाएगा और लोकतंत्र को न्याय मिलेगा। अगर अभी कमलनाथ किसी तरह सरकार बचा लेते हैं या भाजपा अपने मंसूबों में कामयाब होती है, तो दोनों ही सूरतों में दलबदल की बीमारी का इलाज नहीं मिलेगा। इसके बाद राजस्थान, महाराष्ट्र, झारखंड, पंजाब कई और राज्यों में इसका प्रकोप शायद देखने मिले। बेहतर यही है कि इस बीमारी को जड़ से खत्म किया जाए।

(देशबन्धु में आज का संपादकीय)

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