बाकी भीड़ तो घट गई, लेकिन शराबी-धक्का-मुक्की का क्या?

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-सुनील कुमार।।
दुनिया भर में आज कोरोना को लेकर जिस तरह का खतरा खड़ा हुआ है, ऐसा इसके पहले किसी दूसरे मौके पर याद नहीं पड़ता। लेकिन इसके साथ-साथ इस वायरस को फैलने से रोकने के लिए जिस दर्जे की सावधानी बरती जा रही है, वैसी सावधानी भी पहले कभी याद नहीं पड़ती। दूसरे कई देशों पर कोरोना की मार अधिक बुरी हुई है, चीन, दक्षिण कोरिया, ईरान, और इटली में मौतें सैकड़ों में हैं, चीन में तो हजारों में हैं, और हिन्दुस्तान में मौत का खाता अभी खुला ही है। अमरीका में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने पहली बार किसी खतरे को गंभीरता से लिया है, और पूरे देश में इमरजेंसी लगा दी है। जिस न्यूयार्क में हर कदम पर कदम पड़ते दिखते थे, वहां सड़कें और सब-वे खाली पड़े हुए हैं। वहां के बड़े-बड़े स्टोर में लोग सामान अधिक से अधिक उठाते हुए एक-दूसरे से मारपीट भी कर रहे हैं। भारत चूंकि साफ-सफाई के मामले में लापरवाह देश है, इसलिए यहां पर न तो कोई तैयारी अधिक दिख रही है, न ही लोगों में उतनी दहशत दिख रही है। फिर भी भारत में सरकारों ने खतरे को गंभीरता से लिया है।

अलग-अलग प्रदेशों में कोरोना के फैलने को रोकने के लिए अलग-अलग किस्म की तैयारी दिखाई है, और कई बरस बाद शायद यह अकेला ऐसा मुद्दा है जिस पर केन्द्र और राज्यों के बीच कोई टकराव नहीं हुआ है, और राज्यों ने केन्द्र की सलाह को तुरंत ही मान लिया है। बहुत से राज्यों में इस पूरे महीने के लिए स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए गए हैं, हॉस्टल खाली करवा लिए गए हैं, मेले-ठेले पर रोक लगा दी गई है, कांफ्रेंस-सेमीनार, टूर्नामेंट-भर्ती कैंप सब पर इस महीने के लिए तो रोक लग ही गई है। जैसा कि हिन्दुस्तान में हर खतरे और समस्या के मामले में होता है, कोरोना से बचाने के लिए भी कहीं दस रूपए में झाड़ा उतारा जा रहा है, तो कहीं ताबीज बनाकर दी जा रही है। अब चीन से आए कोरोना को अगर हिन्दी, और बाकी हिन्दुस्तानी भाषाएं पढऩा आता होता, तो फिर डॉक्टरों की जरूरत ही नहीं रहती, और कोरोना खुद ही ऐसे इश्तहारों को पढ़कर हॅंसते-हॅंंसते मर गया होता। आज ही एक दिलचस्प तस्वीर मिली है जो कि ऐसे अंधविश्वासों से ठीक उल्टी है, और छत्तीसगढ़ के एक मंदिर में पुजारी भगवान की आरती उतारते हुए भी मास्क लगाए हुए हैं। हालत यह है कि हिन्दी-हिन्दुस्तान में भी मास्क, वायरस, और सेनेटाइजर जैसे अंग्रेजी शब्द अंग्रेजी में ही अधिक समझे जा रहे हैं, इनका हिन्दी ढूंढने की कोशिश भी भाषा के कट्टर लोगों ने नहीं की है।

केरल ने दूसरे राज्यों के मुकाबले कुछ अधिक तैयारी की है, और जाहिर है कि राज्य अधिक पढ़ा-लिखा होने से वहां पर ये बातें लागू भी करना आसान है। वहां की सरकार ने राज्य के जिन लोगों को मेडिकल जांच होने तक अपने घरों में रहने का आदेश दिया है, उन परिवारों को पका हुआ खाना पहुंचाया जा रहा है। इसके अलावा स्कूलें बंद की गई हैं, इसलिए स्कूली बच्चों को भी दोपहर का खाना घर पर पहुंचाया जा रहा है। हिन्दुस्तानी की जमीनी हकीकत यह है कि गरीब बच्चों में से अधिकतर ऐसे हैं जो स्कूल के दोपहर के भोजन की वजह से पेट भर खा पाते हैं, और अगर यह पूरा महीना स्कूल बंद रहती है, तो उनके खानपान पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। बिहार ने स्कूली बच्चों के भोजन का पैसा उनके बैंक खातों में डालना तय किया है ताकि परिवार अपना इंतजाम खुद कर सके। देश के बाकी राज्यों को भी अपने स्कूली बच्चों की फिक्र करते हुए उनका इंतजाम करना चाहिए, और जरूरत हो तो ऐसे हर परिवार को राशन दुकानों से अतिरिक्त राशन देना चाहिए ताकि गरीब चूल्हों पर अधिक बोझ न पड़े।

कुछ राज्यों में सिनेमाघरों को बंद करवा दिया गया है क्योंकि वहां सीमित और बंद जगह में अगर कोरोना वायरसग्रस्त लोग पहुंचें, तो वह एक बड़ी दिक्कत हो सकती है। कई राज्यों में अब तक ऐसा नहीं हुआ है, और उन्हें इस खतरे, और इस बचाव के बारे में सोचना चाहिए। इससे अलग, छत्तीसगढ़ में एक अजीब सी मांग सामने आई है कि सरकार स्कूल-कॉलेज, लाइब्रेरी-जिम के साथ-साथ शराब दुकानों को भी बंद करे क्योंकि वहां पर लोगों की भारी भीड़ लगती है। यह बात सही है क्योंकि लोग सीमित संख्या में रह गई दुकानों पर असीमित संख्या में भीड़ लगाते हैं, और आज छत्तीसगढ़ में ऐसे किसी वायरस के संक्रमण का एक बड़ा खतरा ऐसी शराबी-भीड़ को हो सकता है। अब रोज शराब पीने के आदी लोगों के लिए यह मुमकिन नहीं होगा कि वे पूरे महीने बिना शराब के रहें। वैसे भी राज्य में पड़ोसी राज्यों से आई हुई शराब गाडिय़ां भर-भरकर पकड़ा रही है, इसलिए दारू दुकानों को बंद करने का मतलब सरहद से तस्करी बढ़ाना भी होगा। इसलिए दिन में 11 घंटे खुलने वाली शराब दुकानों पर लगने वाली अंधाधुंध भीड़, धक्का-मुक्की, और मारपीट को घटाने के लिए सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि क्या दुकानों के खुलने के घंटे बढ़ाए जा सकते हैं, ताकि ऐसी बड़ी भीड़ न लगे? यह बात एक अलोकप्रिय राय लग सकती है, लेकिन लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए कई किस्म के कड़वे, अवांछित तरीके भी इस्तेमाल करने पड़ सकते हैं। अगर दुकानें सुबह और जल्दी खुलें, और देर रात तक चलती रहें, तो इन पर भीड़ घटेगी, और अधिक घंटों में फैल जाएगी।

फिलहाल न सिर्फ सरकार को, बल्कि समाज और परिवार को भी बहुत सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि कोरोना के इलाज का भी कोई बड़ा इंतजाम हिन्दुस्तान में नहीं है, न ही इसकी कोई अधिक दवाएं बनी हैं, और न ही साल-दो साल इससे बचाव के टीके आते दिख रहे हैं। ऐसे में सावधानी मेें ही समझदारी है, और वैसी समझदारी में ही जिंदगी है।
(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 14 मार्च 2020)

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