मसाने की इस होली में कौन किसे दिगम्बर कहे!

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ज्योतिरादित्य सिंधिया के भारतीय जनता पार्टी में चले जाने का मामला पूरी तरह से उनके निर्णय लेने के अधिकार से संबंधित है। फिर, यह दलबदल का कोई पहला मामला तो नहीं है; और न ही वह अंतिम होने जा रहा है। भारत का लोकतांत्रिक व राजनैतिक इतिहास दलबदल के छोटे-बड़े अनगिन किस्सों का गवाह रहा है। किसी पार्टी से जीतकर किसी और का दामन थाम लेना, वह भी ऐलानिया तौर पर अब कोई बेजा बात नहीं रह गयी है। लोग धड़ल्ले से मंडी से बहुमत बनाने के लायक, सरकार गिराने और बनाने के लिए विधायकों-सांसदों-नेताओं की खरीद-फरोख़्त करते हैं।

खरीदारों को बहुत दोषी इसलिए नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि लोग खुशी-खुशी बिकने के लिए तैयार बैठे हैं। इसे व्यवहारिक राजनीति ऊर्फ ‘सब चलता है’ का नाम दिया जाता है। राजनीति शास्त्र या राजनीति विज्ञान स्कूल-कॉलेजों के पाठ्यक्रमों की किताबों में ही शुद्ध रूप में है। व्यवहारिकता की जमीन पर उतरने के बाद वह ऐसा कुआं बन गया है, जिसमें सर्वत्र भांग मिली हुई है। कहीं से भी पानी भरिये, बौरा जाना तय है।

पिछले कुछ अर्से से हमारा सार्वजनिक जीवन धन कमाने, कुर्सी की ललक, कुकृत्यों का लाईसेंस पाने और ताकत बटोरने का जरिया बन गया है। चूंकि सब इस खेल में ऐसे शामिल हो गये हैं कि किसी को गालियां खाने का डर ही नहीं रह गया है। ‘महाराजा’ ज्योतिरादित्य का मसला तो यही बताता है कि भारत की कोई भी सियासती पार्टी अब छूटी नहीं नहीं रह गयी है जो कि दलबदल के गंदे खेल में न लिथड़ चुकी हो। सारे दल निष्ठा के रातों-रात बदलाव के इस खेल में पूरी शिद्दत और फख्र से शामिल होते हैं। कभी वे शिकार करते हैं तो कभी शिकार होते हैं-बस इतना ही फर्क है। किसी ने भी इसे अपने स्तर पर नामंजूर नहीं किया है। हां, फायदा हो तो दलबदल नैतिक हो जाता है और नुकसान होने पर अनैतिक।

सिंधिया का मामला थोड़ा सा अलग इतना ही है कि वे भारत के युवा चेहरे हैं। हालांकि वे जिस पार्टी में थे, उसकी नुमाईंदगी चाहे राहुल गांधी-प्रियंका गांधी वाड्रा और कुछ युवा करते हैं, पर असलियत तो यही निकलकर आती है कि उसकी राजनीति की सोच परंपरागत, जड़ और बेजान है जिसका सोच की ताजगी से कोई संबंध नहीं है। इसलिए उसके प्रति जनता का आकर्षण खत्म होता जा रहा है। इस विषय पर पूर्णत: व्यक्ति केंद्रित विचार न करने के बाद भी अगर थोड़ा सा सोचा जाए तो सिंधिया उच्च शिक्षित हैं, उन्हें धन की कोई कमी नहीं, क्योंकि उनका घराना देश के सबसे समृद्ध राजपरिवारों में से एक है। अभी चाहे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री का पद उनसे छिन गया हो पर उनके पास लंबी पारी खेलने का वक्त है। उनके पार्टी छोड़ने को लेकर कई-कई तरह के कयास लगाये जाते हैं।

व्यवहारिक राजनीति के अनुसार तो वे ठीक चल रहे हैं, इस मायने में कि आखिर कोई बिना पद व शक्तिविहीन होकर क्यों रहे?  खरी बात तो यही है कि हमारे लोकतंत्र का यह ऐसा कालखंड है जब सार्वजनिक जीवन में रहने का एकमात्र प्रयोजन है अपनी शक्ति में इजाफा करते जाना। हालांकि ‘महाराजा साहेब’ का कहना है कि वे जनसेवा करने के लिए पार्टी बदल रहे हैं क्योंकि कांग्रेस में इसके लिए उन्हें अवसर नहीं मिल रहा है। यह इसलिए हास्यास्पद है कि अब खालिस जनसेवा करने से कोई प्रभावित नहीं होता और न ही किसी को भ्रम है कि जब कोई राजनेता जनसेवा की बात करता है तो उसके कहे का क्या अर्थ होता है। वैसे जनसेवा के लिए क्या कोई पद चाहिए होता है? कुछ सुविधाएं मिलती हैं पर जनसेवा तो सांसद-विधायक बने बिना भी की जा सकती है। सच तो यह है कि दुनिया के ज्यादातर बड़े काम राजनीति से बाहर रहकर ही हुए हैं। सरकार में रहकर आप जो काम करते हैं वह केवल शासकीय योजनाओं का क्रियान्वयन ही होता है, या फिर वह काम अपने लोगों को उपकृत करने के लिए किया जाता है। जो बात ज्योतिरादित्य के बारे में कही जा रही है, वह प्रकारांतर से राजनीति में संलग्न लगभग सारे सियासतदारों की पूरी जमात पर भी लागू होती है।

अपनी उपेक्षा का भी वे आरोप लगाते हैं। वे 18 साल की राजनीति में हमेशा पदों पर रहे हैं। डेढ़ ही साल से वे पदविहीन बैठे हुए हैं। तो कम से कम इस मामले में आप भाजपा को दोषी नहीं ठहरा सकते कि उसने षड़यंत्रपूर्वक मध्यप्रदेश सरकार को गिराने के लिए ज्योतिरादित्य को भाजपा में शामिल किया है। उसकी आतुरता नैसर्गिक रूप से कांग्रेस सरकार को गिराने की होगी पर यह सत्य स्वीकारना होगा कि इस बार तो कांग्रेस खेमे का यह सिपहसालार खुद अपना शिविर छोड़कर भाजपा के खेमे में चलकर शामिल हो रहा है। अपनी मर्जी से। यह भी सच है कि प्रवृत्ति और कांग्रेसमुक्त भारत की अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए बनाई गयी रणनीति के अनुसार उसने मप्र सरकार गिराने की पहले कोशिशें की रही होंगी पर अब कुछ समय से स्पष्ट हो चला था कि यह काम फिलहाल थोड़ा मुश्किल है। संख्या बल के आधार पर मुख्यमंत्री कमलनाथ किसी तरह से सरकार बनाये रखने और चलाने में सक्षम हैं। अब की सिंधिया ने यह काम खुद किया है तो उसके लिए न मोदी दोषी हैं न ही अमित शाह। …तो किसे माना जाए जिम्मेदार? बेशक, जनता। खासकर समर्थक। वे ही अपने नेतृत्व को कहें कि वह ऐसी हरकतों से बाज आए। सभी पार्टियों के नेतृत्व से सवाल करने का काम तो उनके समर्थक ही कर सकते हैं कि आखिर उन्हें जिंदगी भर कोसने वालों का इस तरह से खुले दरवाजे और उन्मुक्त बांहों से क्योंकर स्वागत किया जाता है। हमारे सार्वजनिक जीवन की शुद्धता बनाए रखनी है तो समर्थक खुद ही अपनी पार्टी के प्रमुखों से सवाल करना सीखें। अब  व्यवहारिक नहीं, सैद्धांतिक लोकतंत्र की आवश्यकता है तभी लोकतंत्र बचेगा; वरना हम तो अपनी राजनीति को मसाने की होली बना ही चुके हैं जहां दिगम्बर हुए बिना कोई होली नहीं खेल सकता।

(देशबंधु में आज)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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