सिंधिया के भाजपा जाने के मायने, कांग्रेस के लिए, भाजपा के लिए भी..

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-सुनील कुमार।।
हाल के वक्त में देश में एक सबसे बड़ा दलबदल ज्योतिरादित्य सिंधिया का हुआ जो कि कांग्रेस छोड़कर भाजपा में चले गए। कांग्रेस छोडऩा एक अलग बात होती, कांग्रेस पार्टी तो शरद पवार और संगमा ने भी छोड़ी थी, ममता बैनर्जी ने भी छोड़ी थी, और जगन मोहन रेड्डी ने भी छोड़ी थी। लेकिन उन्होंने अपनी नई पार्टी खड़ी की, अपना दमखम दिखाया, और अलग-अलग राज्यों में सत्ता पर भी आए। खुद ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया ने एक वक्त कांग्रेस छोड़कर अलग पार्टी बनाई थी, और फिर वे कांग्रेस में लौट आए थे, लेकिन भाजपा में नहीं गए थे। दूसरी तरफ ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पिछले कुछ महीनों में लगातार भाजपा के साथ बातें तय करने का काम किया, और अब कांग्रेस छोड़ते ही अगले ही दिन वे भाजपा में आ गए, और उनके दलबदल की घोषणा के साथ-साथ ही उन्हें मध्यप्रदेश से भाजपा का राज्यसभा उम्मीदवार बनाया गया। यह सब इस घटनाक्रम के साथ हुआ है कि सिंधिया समर्थक करीब दो दर्जन कांग्रेस विधायक अपनी पार्टी से अलग होने के तेवर दिखाते हुए प्रदेश के बाहर जा बैठे हैं, और उनमें से शायद 20 ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा भेज दिया है। आंकड़ों के हिसाब से यह नौबत एमपी की कमलनाथ सरकार को गिराते हुए दिखती है, और इसी के एवज में ज्योतिरादित्य सिंधिया का भाजपा प्रवेश, उनका राज्यसभा निर्वाचन दिख रहा है, और केन्द्रीय मंत्रिमंडल में एक मंत्री पद की भी चर्चा कोरोना वायरस की चर्चा जितनी आम हैं। अब अपनी पार्टी की एक बड़े प्रदेश की सरकार को गिराकर वहां पर भाजपा की सरकार बनवाने के एवज में इतना तो बनता ही है।

यह एक अलग बात है कि इस मौके पर प्रियंका गांधी से लेकर दूसरे कांग्रेसियों तक ने खुलकर यह गिनाया है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया को कांग्रेस ने क्या-क्या दिया था, और पिछले 18 बरस कांग्रेस में रहते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया को लगातार किस तरह सांसद, केन्द्रीय मंत्री, कांग्रेस कार्यसमिति सदस्य, और जाने क्या-क्या बनाया गया था। दूसरी तरफ कांग्रेस के लोग यह भी गिना रहे हैं कि भाजपा के बड़े-बड़े नेता बीते बरसों में लगातार सिंधिया राजघराने की अंग्रेजों से यारी, और झांसी रानी लक्ष्मीबाई से गद्दारी के कैसे-कैसे बयान देते आए हैं। खुद मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह का पिछला विधानसभा का पूरा चुनाव अभियान महाराज के खिलाफ केन्द्रित था, और मध्यप्रदेश भाजपा के अधिकतर बड़े नेता सिंधिया घराने की गद्दारी पर लगातार बोलते आ रहे थे, और यह भी कह रहे थे कि अगर सिंधिया ने गद्दारी न की होती तो 1857 में ही आजादी की लड़ाई कामयाब हो जाती। ऐसे सार्वजनिक बयान उस वक्त दिए गए जब सिंधिया घराने की दो बेटियां भाजपा की सत्ता में थीं, वसुंधरा राजे राजस्थान की भाजपा-मुख्यमंत्री थीं, और यशोधरा राजे मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार में मंत्री थीं।
खैर, 1857 के इतिहास के लिए, और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की शहादत के लिए ज्योतिरादित्य को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, और उनका दलबदल 21वीं सदी की भारतीय राजनीतिक संस्कृति के हिसाब से है, उसे सही और गलत तो इतिहास लिखेगा, और जनता बताएगी। लेकिन यह बात तय है कि ज्योतिरादित्य का इस तरह से कांग्रेस छोडऩा कांग्रेस के आज के हाल का एक संकेत भी है, और उसने अगर अपना घर नहीं सुधारा, तो आगे जाने क्या होगा। लोगों की अटकलें हैं कि कांग्रेस के कुछ और बड़े-बड़े, वजनदार, दिग्गज, असंतुष्ट और नौजवान नेता भी पार्टी छोड़कर सत्ता सुख वाली भाजपा में जा सकते हैं। देश में एक ऐसी नौबत आ गई है कि चुनाव में ईवीएम मशीनों की बेईमानी की खबरें तो खारिज हो गई हैं कि कोई भी बटन दबाओ वोट भाजपा को जाता है। अब नौबत यह आ गई है कि किसी भी पार्टी का विधायक चुनो, सरकार भाजपा बना लेती है। एक के बाद एक कई प्रदेशों में विधायकों के ऐसे हृदय-परिवर्तन से सरकारें बदलीं, और भाजपा सत्ता में आ गई। लेकिन यह सिलसिला नया नहीं हैं, यह जुर्म करने वाली भाजपा पहली या अकेली पार्टी नहीं है। ऐसा दूसरी पार्टियां भी दूसरी जगहों पर किसी दूसरे वक्त कर चुकी हैं, लेकिन आज भाजपा जितने बड़े पैमाने पर ऐसी सरकारें गिराने, और फिर खुद की बनाने में महारत हासिल कर चुकी है, वह पैमाना डरावना है, और उसका ऐसा व्यापक इस्तेमाल सिर्फ यह सुझाता है कि इस देश में विधायकों और सांसदों के दलबदल पर, अपनी पार्टी की सरकारें गिराने पर एक नए किस्म के कानून की जरूरत है, क्योंकि मौजूदा कानून आधी सदी पहले के पेनिसिलिन की तरह का बेअसर हो चुका है, और अब छठवीं पीढ़ी के एंटीबायोटिक की जरूरत है। भाजपा अगर इस सिलसिले को इतने बड़े पैमाने पर न ले गई होती, तो शायद नए कानून की चर्चा शुरू नहीं हुई रहती। लेकिन आज हिन्दुस्तानी केन्द्र और राज्य सरकारों में जिस तरह भाजपा का एकाधिकार हो रहा है, और जायज-नाजायज सभी तरीकों से हो रहा है, तो वैसे में कम से कम नाजायज वाले हिस्से को रोकने के लिए एक नए कानून की जरूरत है, ठीक उसी तरह जिस तरह की आज कोरोना वायरस को रोकने के लिए नए किस्म की सरकारी रोकथाम की जरूरत है, नई सावधानी की जरूरत है।

ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस से जाने के बाद अब मध्यप्रदेश में पिछली करीब आधी सदी से स्थापित सिंधिया-खेमा कांग्रेस पार्टी के भीतर खत्म हुआ, और अब सरकार बचाने का जिम्मा प्रदेश कांग्रेस में बाकी बचे बस दो खेमों, दिग्विजय-कमलनाथ पर आया है, और आने वाले दिन इन्हीं दो नेताओं के कामयाबी या नाकामयाबी के होंगे।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 12 मार्च 2020)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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