बेवफाई का बहाना..

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कुछ तो मजबूरियां रहीं होंगी, यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता, शायर बशीर बद्र का यह शेर बहुत अच्छा है, लेकिन इसकी आड़ में बेवफाई को सही नहीं ठहराया जा सकता। वफादारी शर्तों से बंधी नहीं हो सकती। नैतिकता का यह तकाजा, निस्वार्थ, बिना किसी लोभ के निभाया जाना चाहिए। और यह बात ज्योतिरादित्य सिंधिया पर भी लागू होती है। बीते डेढ़ सालों में संसद से दूर रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया को इतना मीडिया कवरेज नहींमिला होगा, जितनी लाइम लाइट उन्होंने बीते दो दिनों में बटोर ली।

वे लगभग दो दशक से कांग्रेस के नेता रहे, सांसद बने, राजघराने की पारिवारिक पृषठभूमि और गांधी परिवार से नजदीकी के कारण उन्हें कांग्रेस में वह ओहदा हासिल हुआ, जो उसके साामान्य कार्यकर्ताओं को 3-4 दशकों की निस्वार्थ सेवा के बाद भी नहींमिलता। इस सबके बावजूद जब वे मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी या प्रदेश अध्यक्ष के पद से दूर रखे गए। फिर लोकसभा चुनाव भी हार गए। तो उनमें असंतोष बढऩे लगा या ऐसा भी कह सकते हैं कि सत्ता की भूख खुलकर दिखने लगी। और इस भूख को उन्होंने समय-समय पर जाहिर भी किया। अपनी ही सरकार के खिलाफ सड़क पर उतर कर आंदोलन करने की बात कही। उनके समर्थक विधायक बात-बात पर मुख्यमंत्री से अपनी नाराजगी जाहिर करने लगे।

कश्मीर मसले पर वे भाजपा के साथ खड़े नजर आए। अपने ट्विटर हैंडल से उन्होंने कांग्रेस नेता की जगह खुद को समाजसेवी बताया और अब इसी समाजसेवा के नााम पर वे भाजपा में शामिल हो गए हैं। कांग्रेस छोडऩे का ऐलान तो उन्होंने 10 मार्च को ही कर दिया था, लेकिन भाजपा से वे जुड़े 11 मार्च को। खबरें हैं कि राहु काल के कारण उन्होंने दो घंटे इंतजार किया।

ग्रह-नक्षत्रों का यह सहारा धर्मभीरूओं को शोभा देता है, समाजसेवा के लिए तो हर वक्त शुभ मुहूर्त ही होता है। बहरहाल, मुमकिन है यह तथाकथित शुभ मुहूर्त उनकी राजनीति के सितारे बुलंद करने में मदद करे, लेकिन इससे राजनीति में नैतिकता पर जो ग्रहण लगा है, वह पता नहींकभी दूर होगा या नहीं। बुधवाार को भाजपा प्रवेश के बाद उन्होंने कहा कि राजनीति जनसेवा का माध्यम है, जो कांग्रेस में रहते पूरा नहींहो सकता था। उन्होंने बार-बार खुद को देश का, प्रदेश का सेवक बताने की कोशिश की। इसके साथ ही उन्होंने कमलनाथ सरकार की खामियोंंको गिनाया, उस पर जनता से वादाखिलााफी का आरोप भी लगाया।

लोकतंत्र में जनसेवा का इच्छुक कोई भी व्यक्ति जनहित में ऐसा करने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया यहां जनसेवा से अधिक सत्ता के लिए लालायित अधिक नजर आए। इसलिए उन्होंने मोदी सरकार की तारीफों के पुल बांधे, प्रधानमंत्री की सोच, उनकी कार्यक्षमता, योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए उनकी प्रतिबद्धता की तारीफ की। पर क्या वाकई यह सच है? क्या वाकई मोदी सरकार ने अपने वादों को पूरा किया है? घोषणापत्र में हिंदुत्व के एजेंडे को पूरा करने की भाजपा की ललक तो साफ जाहिर है।

इसी का परिणाम है कि कश्मीर दो टुकड़ों में बंट कर, बंधक राज्य बन गया। अयोध्या में बाबरी मस्जिद तोडऩे के जिम्मेदार अब भव्य राम मंदिर बनाने में जुटे हैं। लेकिन इन वायदों के अलावा रोजगार, महंगाई, शिक्षा को लेकर मोदीजी ने जो वादे किए थे, क्या उन्हें वे पूरा कर पाए? क्या किसानों की हालत उनके शासन में और नहींबिगड़ी है? मंदसौर में किसानों पर गोली भाजपा की शिवराज सिंह चौहान की सरकार के वक्त चली थी, क्या सिंधियाजी अब भी इस मसले पर भाजपा से कड़े सवाल पूछ पाएंगे? ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कमलनाथ सरकार में पनपते ट्रांसफर उद्योग, रेत माफिया पर भी अपनी चिंता भाजपा के मंच से जाहिर की। पर क्या इससे भाजपा के सारे पाप गंगा ने साफ कर दिए हैं? क्या अब व्यापमं घोटाले में न्याय हो गया है?

क्या रेत माफिया शिवराज सिंह सरकार में अस्तित्व में ही नहींथा? कुल मिलाकर भाजपा परिवार में शामिल होने के जितने तर्क ज्योतिरादित्य सिंधिया ने दिए हैं, उनमें बेवफा होने की कोई मजबूरी नहींदिखी। अलबत्ता यही नजर आया कि वे पद के लालच में भाजपा में गए हैं। मुमकिन है, अब वे मध्यप्रदेश से राज्यसभा में भेज दिए जाएं, भाजपा उन्हें इनाम देने के लिए मोदी सरकार में कोई मंत्री पद भी दे सकती है। इन सबसे उनकी जनसेवा में कितनी धार आती है, यह तो भविषय बताएगा।

वैसे सवाल यह भी उठता है कि क्या वे भाजपा में शामिल होकर ही जनसेवा कर सकते थे? क्या बेहतर ये नहींहोता कि वे अपनी कोई पार्टी बनाते, या अपने पिता की बनाई पार्टी मध्यप्रदेश विकास कांग्रेस को पुुनर्जीवित करते? अगर ऐसा होता तो नैतिकता बची रहती। वैसे मोदी-शाह युग में राजनीति में नैतिकता विलुप्तप्राय होती जा रही है। मणिपुर, गोवा, कर्नाटक के बाद मध्यप्रदेश मेंंभी सत्ता हथियाने के लिए उसने चालें चली हैं। ऐसा करके वह सत्ता तो हासिल कर रही है, लेकिन जनादेश और लोकतंत्र का अपमान उसके हाथों हो रहा है। माननीय अदालत शायद राजनीति में चल रही ऐसी खरीद-फरोख्त पर रोक लगाने का कोई तरीका निकाले। बाकी लोकतंत्र बचाने का सारा दारोमदार तो जनता के ही हााथ में है। उसे याद रखना चाहिए कि उसने किसके लिए वोट किया था और बदले में उसे क्या मिला। रहा सवााल कांग्रेस का तो वह जितनी जल्दी अपने असमंजस को दूर कर, सही लोगों की परख करना शुरु करेगी, उसके लिए बेहतर होगा।

(देशबंधु में आज का संपादकीय)

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